बेटर पंजाब वाइट मुर्गी का पालन कैसे करे जिससे अच्छा आमदनी हो

बेटर पंजाब वाइट मुर्गी यह नस्ल 5 सप्ताह के अंदर- अंदर लगभग 225 ग्राम भार प्राप्त कर लेती है। इसके अंडे का भार 12 ग्राम होता है इसे आचार बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है । इसे पंजाब वाइट क्यूनल के नाम से भी जाना जाता है। जिसे व्यापारिक स्तर पर तैयार किया गया है। मीट का स्वाद अच्छा होता है और कई बीमारियों के उपचार के लिए लाभदायक है।

 

चारा

तीतर, बटेर और टर्की के लिए 22-.24 प्रतिशत प्रोटीन आवश्यक होता है। प्रोटीन 0.10 सप्ताह के मुर्गी के बच्चों के आहार में 10-20 प्रतिशत प्रोटीन होना जरूरी है। प्रोटीन की उच्च मात्रा से मुर्गी के बच्चों को वृद्धि करने में मदद मिलती है। वृद्धि के लिए उनके आहार में लगभग 15-16 प्रतिशत प्रोटीन होना जरूरी है।
पानी – 1-4 कप चीनी और 1 चम्मच टैरामाइसिन् गैलोन शामिल होना चाहि पानी तथा दूसार 1 चम्मच टैरामाइसिन शामिल होना चाहिए और फिर उसके बाद सामान्य पानी दिया जाना चाहिए।

कार्बोहाइड्रेट्स –

इन्हे एनर्जी की जरूरत होती है जो कि कार्बोहाइड्रेट्स से आती है। इनके भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स की मात्रा 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसे पचाना उनके लिए मुश्किल होता है। शारीरिक फैट और तापमान को संतुलित बनाए रखने के लिए कार्बोहाइड्रेट्स जरूरी होते हैं।

नस्ल की देख रेख-

शैल्टर सड़क से कुछ ऊंचाई पर होना चाहिए ताकि बारिश का पानी आसानी से बाहर निकल जाये और इससे उनका बाढ़ से भी बचाव होगा। शैल्टर में ताजे पानी का प्रबंध भी होना चाहिए। 24 घंटे बिजली की आपूर्ति होनी चाहिए। मुर्गी पालन के लिए उपयुक्त जमीन का चयन किया जाना चाहिए जहां पर ज्यादा से ज्यादा बच्चे और अंडे विकसित हो सकें। मुर्गियों का आश्रय औद्योगिक और शहरी क्षेत्र से दूर होना चाहिए।

खनिज सामग्री –

खनिज सामग्री में कैल्शियम, मैगनीशियम, सोडियमए पोटेशियम, फास्फोरस, क्लोरीन, सल्फर, मैगनीज, आयरन, कॉपर, आयोडीन, जिंक, कोबाल्ट और सेलेनियम शामिल हैं। मुख्य रूप से इन सामग्रियों को फीड से प्राप्त किया जाता है।

नये जन्में बच्चों की देखभाल –

अंडों को उपयुक्त तापमान देकर 21 दिनों के लिए इनक्यूबेटर में रखा जाता है। अंडे सेने के बाद बच्चों को 48 घंटे बाद इनक्यूबेटर से निकाल लिया जाता है। इनक्यूबेटर से निकालने के दौरान बच्चों की संभाल बहुत सावधानी से की जानी चाहिए। इनक्यूबेटर से बच्चों को निकालने के बाद उन्हें ब्लडर में रखा जाता है। मुर्गियों के नन्हें बच्चों की वृद्धि के लिए उचित ध्यान और इनक्यूबेटर की आवश्यकता होती है। पहले सप्ताह के लिए ब्लडर का तापमान 95 डि.ग्री फार्नाहीट होना जरूरी है और प्रत्येक सप्ताह इसका तापमान 5 डि.ग्री फार्नाहीट कम करना जरूरी है।

टीकाकरण –

जब बच्चा एक दिन का हो तो उसे मार्कास बीमारी से बचाने के लिए एच.वी.टी. का टीका लगवाएं। इस टीके का प्रभाव 18 महीनों तक रहेगा।
ऽ जब बच्चा 18-21 दिन का हो तो उसे गुमबोरो बीमारी से बचाने के लिए आई.बी.डी. का टीका लगवाएं।
ऽ जब बच्चा 8-10 सप्ताह का हो तो उसे चिकन पॉक्स बीमारी से बचाने के लिए चिकन पॉक्स का टीका लगवाएं।
ऽ जब बच्चा 4-7 दिन का हो तो उसे रानीखेत बीमारी से बचाने के लिए रेड वैक्सीन एफ-1 स्ट्रेनद्ध का टीका लगवाएं इस टीके का प्रभाव 2-4 महीने तक रहेगा।
ऽ जब बच्चा 4-5 सप्ताह का हो तो उसे रानीखेत बीमारी से बचाने के लिए रेड एफ-1 स्ट्रेन का टीका लगवाएं।
ऽ जब बच्चा 6-8 सप्ताह का हो तो उसे रानीखेत बीमारी से बचाने के लिए रेड एफ-2 बी स्ट्रेन का टीका लगवाएं। बच्चे को 0.5 मि.ली दवाई दी जाती है।

बीमारियां और रोकथाम –

यह संक्रमण श्वास नाली आंसू और व्यर्थ पदाथों से आता है। यह बीमारी एक मुर्गी से दूसरी मुर्गी में बड़ी जल्दी फैलती है। बर्ड फ्लू, एविना यह इन्फ्लूएंजा के कारण होता है और यह 100 प्रतिशत मौत दर को बढ़ाता है। इस अस्वस्थ में खाना और पानी के बर्तन कपड़ों से भी फैल सकती है। इसके लक्षण हैं मुर्गियों का सुस्त हो जाना भूख कम लगनाए अंडों का कम उत्पादन और चोटी का पीले रंग में बदल जाना आदि है।

इलाज –

फार्म के चारों तरफ क्वालटिटोल की स्प्रे करके कीटाणुओं को नष्ट करें। चिकन फार्म से कुछ भी अंदर या बाहर ले जाना बंद कर दें। फार्म के अंदर प्रयोग किए जाने वाले जूते अलग रखें। गड्ढा बनाएं और उसमें दी गई मात्रा में दवाई डालें। ताकि फार्म में जाने से पहले अपने पैरों को इस उपचारित पानी में डुबोया जा सके। यह बीमारी इंसानों को प्रभावित करती है इसलिए बीमारी से प्रभावित मुर्गियों को उठाने से पहले उचित कपड़े और दस्ताने पहनें। मरी हुई और संक्रमित मुर्गियों को जला दें या मिट्टी में दबा दें। मीट को 70 डि.गी सेल्सियस पर बनायें इससे संक्रमण मरता है और इसे खाने के लिए प्रयेग किया जाता है।

विटामिन डी की कमी –

यह बीमारी मुख्यतः विटामिन बी 2 की कमी के कारण और शरीर में कैल्शियम और फास्फोरस के संतुलन बिगड़ने के कारण होती है।

इलाज- फीड में विटामिन डी 3 दें।

विटामिन ए की कमी –

इस बीमारी के लक्षण हैं चोंच और टांगों का पीला पड़ना और सिर चकराना।

इलाज –

खाने में विटामिन ए की मात्रा बढ़ाएं और हरी फीड दें।

पंजों का कमजोर होना –

यह बीमारी मुख्यतः विटामिन बी 2 की कमी के कारण होती है और यह मुख्यतः बढ़ते हुए पशुओं में देखी जाती है। इससे पंजे अंदर की तरफ मुड़ जाते हैं।
इलाज – फीड में विटामिन बी2 दें।

लूकोसिस और मार्कास –

यह एक संक्रामक बीमारी है जो कि दूसरे पशु से हवा, पंखो मिट्टी आदि द्वारा फैलती है। लूकोसिस हवा द्वारा नहीं फैलती और ना ही प्रदूषित वातावरण द्वारा फैलती है।

मार्कास के लक्षण-

यह मुख्यतः 1-4 महीने के मुर्गी के बच्चों में फैलती है और कई बार यह 30 दिन के बच्चों को भी हो जाती है। इसके लक्षण हैं टांगो, पंखों और गर्दन का कमजोर होना सलेटी रंग की आंखे होना और पक्षी का अपने आप अंधा हो जाना।

रानीखेत बीमारी –

यह हर उम्र के पक्षी में फैलती है। इसके लक्षण हैं मौत दर का बढ़ना, सांस लेने में समस्या टांगों और पंखों का कमजोर होना।

इलाज –

जब बच्चे 1-6 दिन के हों तो इन्हें रानीखेत दवाई का टीका लगवायें और 4 सप्ताह के अंतराल पर ब्रॉयलर को फिर दुबारा लगवायें।
चिकन पॉक्स – यह किसी भी उम्र के पक्षी में फैल सकती है। इसके लक्षण हैं चोटी, आंखों और कानों के आस.-पास फोड़ों बन जाते है।

इलाज –

चिकन पॉक्स से बचाव के लिए होमियोपैथिक दवाई एंटीमोनियम थ्रोटरेक्स 5 मि.ली. प्रति 100 पक्षियों को दें।

कोकसीडियोसिस –

कोकसीडियान प्रोटोजोआन के कारण होती है। यह बीमारी मुख्यतः मुर्गी के 3-10 सप्ताह के बच्चों में होती है। यह प्रौढ़ बच्चों को भी प्रभावित करती है।
इलाज – लगभग 12 सप्ताह के मुर्गी के बच्चों को फीड में कोकसीडियोस्टैट दें। बेफरान के अमरोल 50 ग्रा. कलोपीडोल 125 ग्रा. प्रति क्टि. स्टैनोरोल 50 ग्रा. प्रति टन फीड में दें। प्रत्येक 1-2 वर्ष बाद दवाई बदलते रहें। उचित साफ सफाई का ध्यान देना चाहिए।

फैटी लीवर सिन्ड्रोम एफ.एल.एस.- इस बिमारी से वजह से शरीर में फैट का जमाव हो जाता है। यह बीमारी मुख्यतः अंडा उत्पादित मुर्गी और ब्रॉयलर में पायी जाती है जिन्हें ज्यादा एनर्जी वाला भोजन दिया जाता है। इसके लक्षण हैं 50 प्रतिशत कम अंडों का उत्पादन 20-25 प्रतिशत भार का कम होना और लीवर और शरीर पर रक्त के धब्बे दिखना आदि।
इलाज – फीड में ऊर्जा की मात्रा कम कर दें। 1 क्विंटल फीड में 100 ग्राम चोलाईन क्लोराइड विटामिंस 1.2 मि.ली. ग्रा. विटामिंस 12 और 100 ग्राम इंसिटोल मिक्स करें।

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