प्रतापधन संकर मुर्गी का व्यवसाय करके आमदनी दुगना करें !

प्रतापधन की विशेषताएं – देशी मुर्गी के तुलना में यह प्रजाति चार गुना अधिक अंडे देती है एवं वयस्क की 75 प्रतिशत से अधिक वनज होता है। मुर्गी का रंग बहुरंगीन होने कारण गांवो के लोग अधिक पसंद करते है। इसकी लम्बी टांग होने से ग्रामीण क्षेत्र में अपने को शत्रुओं से बचाती है। अंडे का रंग देशी जैसे हल्के भूरे रंग का होता है।
प्रतापधन का पालन – एक दिन से लेकर 45 दिन तक के चूजों को कृत्रिम उष्मा की आवश्यकता होती है इसके लिये किसान लकड़ी/धातु/टोकरी के बने ब्रुडर के नीचे एक बल्ब लगाकर 50-60 बच्चों को रख सकते है। बिछावन के लिये किसान गेहूं या चावल का भूसा, लकड़ी का बुरादा आदि प्रयोग कर सकते है।

आहार व्यवस्था –

किसान भाईयों को 4-6 सप्ताह के चूजे ही लेने चाहिए तथा संतुलित आहार में खनिज तत्वों, विटामिन, जीवांणुनाशक व कॉक्सीडियल दवाओं का समावेश होना चाहिए।

स्वास्थ – प्रतापधन का मुख्य बीमारियों से बचाव के लिये

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मुर्गी का प्रबंधन –

प्रतापधन के चूजे 4-6 सप्ताह के पश्चात किसान अपने घर के आगे या पीछे आराम से रख सकता है। इसमें दिनभर के लिये घर के बाहर छोड़ दिया जाता है और रात को सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है।

आहार –

मुर्गियों को आहार में मक्का, गेहूं, ज्वार, जौ, कटे हुये चावल आदि खिला सकते है। मुर्गियों का ज्यादा वनज होने से अंडा उत्पादन कम होता है इसके लिये मुर्गी का वनज 2.2-2.5 किलो ग्रा. 6-6.5 माह तक होना चाहिए। अंडे देने वाली मुर्गियों को हमेशा कैल्शियम की आवश्यकता पड़ती है जो की अंडे की कवच निर्माण में सहायक होता है। इसके लिये 3-4 ग्रा./मुर्गी/दिन के हिसाब से सगमरमर पत्थर के टुकड़े देने से कवच कठोर बनता है।

आवास –

एक मुर्गी को 1.5-2.0 वर्ग फीट जगह की आवश्यकता होती है। दड़बा जमीन से थोड़ा ऊपर ढलान पर छायादार स्थान पर हो तथा उसमें अच्छा वायु संचार व्यवस्था हो। दड़बे की लम्बाई पूर्व-पश्चिम में होनी चाहिए ताकि मुर्गियों को सीधी धूप व प्रकाश से बचाया जा सके। आवास में बिछावन के लिये चावल की भूसी, गेहूं का भूसा काम में लिया जाना चाहिए। ताकि मुर्गियां को गर्मी व फर्श सुखा बना रहे।

स्वास्थ प्रबंधन –

ग्रामीण क्षेत्रों में फैलने वाली मुर्गियों की मुख्य बीमारी रानीखेत है। इसके लिये 6 माह के अंतराल में आन्तरिक परजीवियों की दवा देना उचित रहता है। ग्रामीण परिवेश में इनकी मृत्युदर अधिक होने मुख्य कारण इनके शत्रु जैसे – कुत्ता, बिल्ली, नेवला व सांप है अगर इन शत्रुओं से इनकी रक्षा करें तो ग्रामीण परिवेश में मुर्गीपालन एक सफल व्यवसाय है।

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