रबी मौसम में बरसीम चारा पशुओं के लिये कैसें उगायें

बरसीम की खेती, रबी के मौसम में पशुओं के दुग्ध उत्पादन लिये किये जाते है। यह पशुओं के दूध के लिये अत्यंत लाभकारी होता है। बरसीम का वानस्पतिक नाम ट्राइफोलियम एजे. है। बरसीम चारा में सबसे ज्यादा कैल्शियम, फास्फोरस पाया जाता है और साथ ही इसमें प्रचुर मात्रा में कैरोटिन भी पाया जाता है जिससे दुग्ध उत्पादन में काफी वृद्धि होती है।
बरसीम के चारे में उच्च किस्म का साइलेज बनाया जाता है, आमतौर पर इसकी तीन कटाई तक किया जा सकता है और अन्तिम कटाई के बाद बरसीम को खेतों में हरी खाद के रूप में भी उपयोग में लिया जा सकता है।
बरसीम की बुवाई कम वर्षा वाला क्षेत्र में भी किया जाता है। इसकी अच्छी वृद्धि के लिये 250 सेल्सियस का तापमान होना चाहिए। बीजोत्पादन हेतु बरसीम की फसल को कटाई के समय का तापमान 400 सेल्सियस तक रखना चाहिए। जिससे अच्छा बीज उत्पादन हो सकंे।

पशुओं के लिए बरसीम की खेती-Trifolium alexandrinum cultivation for animals in Hindi

भूमि का चुनाव – बरसीम के बुवाई के लिये मुख्य रूप से भारी टोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है। लेकिन यह सभी प्रकार की मृदा में उगायी जा सकती है जिसमें उचित पानी प्रबंधन का व्यवस्था हो।
उन्नत किस्में –

इसकी प्रजातियों का दो प्रकार की होती है

  •  डिप्लाइड
  •  टेट्राप्लाइड
डिप्लाइड की किस्में – इसमें मुख्य रूप से दो किस्में होती है।
मिस्काबी – इसकी प्रति हेक् उत्पादन 1000-1100 कुन्तल तक होता है। यह मुलायम तने वाली होती है। इसका चारा नवम्बर के अन्त से तथा दिसम्बर के प्रथम सप्ताह से मिलने लगता है।
बरसीम लुधियाना-1: बरसीम की इस प्रजाति से मिस्काबी से 25-30 प्रतिशत तक अधिक उत्पादन मिलता है। इसमें अधिक सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। इसका उत्पादन 1100-1200 कुन्तल प्रति हेक्. होता है, और यह मई माह तक चारा देता रहता है।

टेट्राप्लाइड किस्में:

पूसा जाइंट, टाईप 526, टाईप 678, जे.बी 1,2, बी.एल. 10, 22, 52, जे.एच.बी. 146, यू.पी. 52, बरदान बी.एल.

बरदान किस्मे:

 इसकी कटाई लगभग 4-5 बार की जा सकती है। यह 160-170 में काटने लायक हो जाता है।

भूमि की तैयारी:

बरसीम बुवाई खरीफ की खेती के बाद उगाया जाता है। इसलिये खेत की तैयारी हेतु सबसे पहले खेत की मिट्टी को पलटने वाले हल से जुताई करके हैरो चलाकर खेती को बराबर किया जा है, तदोपरान्त खेत की मिट्टी को अच्छी तहर से भुरभुरी कर लेते हैं तथा तैयार खेत को छोटी-छोटी क्यारियों में बांट देते है। जिससे खेत की सिंचाई अच्छी प्रकार से की जा सकती है।
बुवाई का समय – अधिक उत्पादन के लिए बरसीम को अक्टूबर के पहले पखवाड़े में बुवाई करना चाहिए। पहले और देर से बुवाई करने पर उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
बीज की मात्रा -समय से बुवाई करने पर 25 से 30 कि.ग्रा. प्रति हेक्. बीज की आवश्यकता पड़ती है। पहले और देर से बुवाई करने पर बीज दर 30 से 35 कि.गा प्रति हेक्. की आवश्यकता पड़ती है।

बीज का उपचार –

बीजोंउपचार हेतु सबसे पहले बरसीम के बीज को पानी में भिगोकर उसमें मिले हुये काॅसनी के बीज एवं अन्य खरपतवार को निकाल देते है। बरसीम का 5-6 प्रतिशत नमक के घोल में भिगोने पर बरसीम के पानी नीचे बैठ जाता है, और बाकी सभी खरपतवार ऊपर रह जाते है, इसे छानकर निकाल लेते हैं। तदोपरान्त बरसीम को दो-तीन बार पानी में धुलकर छायादार स्थान पर फैलाकर सुखा देते है। उसके बाद खेत में बरसीम को बोने से पूर्व राइजोबियम ट्राइकोलाआई नामक जीवांणु से बीज उपचारित करना अत्यंत आवश्यक होता है। इसके लिये 250 ग्रा गुड़ का 10 प्रतिशत का घोल बनाकर इसे ठंडा कर लेते हैं। फिर कल्चर को मिलाकर सूखे हुये बरसीम के बीज में मिला देते है। थोड़ी देर छाया में रखकर बुवाई करते है।

बुवाई की विधि –

बुवाई के समय अच्छी तरह से तैयार खेत में 5-7 से.मी. तक पानी अत्यंत आवश्यक होता है। जिससे बीज को चिडियों से बचाया जा सकता है और पानी में बीज के डूब जाने से उसके ऊपर मिट्टी की एक परत आ जाती है, जिससे पर्याप्त नमी बनी रहती है, जो बरसीम के अकुंरण के लिये बहुत अच्छा होता है।

खाद एवं उर्वरक –

बरसीम एक दलहन वर्गीय चारा की फसल होने के कारण इसमें वायुमण्डल से नाइट्रोजन ग्रहण करने की क्षमता होती है, जिसके कारण इसमें 20 से 30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन 10-15 टन गोबर की खाद एवं 50-60 कि.ग्रा. फास्फोरस की आवश्यकता प्रति हेक्. होती है।

चारे की कटाई –

बरसीम तेजी से बढ़ने कारण प्रथम कटाई 30 दिन तक करने से अच्छी बढ़वार मिलती है और प्रत्येक कटाई के पश्चात लगभग 20 कि.ग्रा नाइट्रोजन खेत में देना अनिवार्य होता है। चारे की कटाई सतह से 5 से 9 से.मी. की ऊंचाई से करना चाहिए।

सिंचाई –

इसका सिंचाई लगभग 12-18 करनी पड़ती है। बरसीम की अच्छे अंकुरण के लिये लगभग 8-10 दिन के अन्तराल पर हल्की-हल्की सिंचाई करना चाहिए। उसके बाद प्रत्येक 16 से 22 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए। जल जमाव बरसीम के फसल के लिये हानिकारक होता है। अतः पानी की निकास का उचित प्रबंध, अच्छे उत्पादन के लिये अनिवार्य होता है।
पैदावार – इसकी पैदावार कई बातों पर निर्भर करता है। जिसमें भूमि की उर्वराशक्ति, किस्म और फसल की देखभाल बरसीम की खेती इस तरीके से करने पर अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। जिससे पशुओं में दुग्ध का अच्छा उत्पादन होता है।
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