भेड़ पालन कर के अपनी आमदनी को बढ़ावा दें

भेड़ पालन व्यवसाय –

भेड़ पालन प्राचीन व्यवसायों में प्रमुख स्थान रखता है। भेड़ों से मांस, दूध, चमड़ा, ऊन एवं कृषि हेतु उपयोगी खाद प्राप्त होता है। भेड़ पालन मुख्यतः उष्ण एवं शीतोष्ण जलवायु में लाभकारी होता है। इसे पालना काफी सरल होता है। क्योंकि इनकों महंगी आवास की व्यवस्था की जरूरत नहीं होती है। भेंड़ बकरियों की भांति बड़े पेड़ो को नुकसान नहीं पहुंचाते है।

अच्छी नस्लों का चयन – Sheep farming tips in Hindi

ऽ मोटे ऊन टाइप की नस्लें – जालौनी, मुजफ्फरनगरी तथा अन्य अवर्णित नस्लें आदि।

ऽ कारपेट ऊन टाइप – नली वीकानेरी, मांगरा आदि।
ऽ मुलायलम महीन कारपेट ऊन टाइप – मोरिनो -नाली कास, रैम्बुले आदि।
ऽ मुलायम एवं महीन अप्रैल ऊन टाइप – शुद्ध नस्ल की मेरिनो, रैम्बुले आदि।
ऽ मांस एवं ऊन टाइप – जालौनी, मुजफ्फरनगरी, नाली, बीकानेरी आदि।

आवास –

 

प्रायः भेडे़ प्राकृतिक वातावरण में खुले में रखी जाती है क्योंकि भेडे अधिकांश समय चराई पर जाने की वजह से बाहर रहती है। मौसम से बचाने के लिये छप्पर या खपरैल के बाड़े बनाये जाते है। अच्छे आवास हेतु प्रति भेड़ 0.8 से 1.2 वर्ग मीटर स्थान की आवश्यकता होती है। फर्श कच्ची बनाये क्योकि ईट या सीमेंट की फर्श ऊन को खराब करती है।

आहार –

भेड़े अधिकांशतः चराई पर रखी जाती है। फिर भी दूध देने वाले एवं गाभिन भेड़ों को 250 ग्रा. से 400 ग्रा. तक अतिरिक्त संकेन्द्रित आहार दिया जाता है। प्रतिकूल मौसम में आहार हेतु 1 से 2 कि.ग्रा. भूसा या 2 से 2.5 कि.ग्रा. हरा चारा तथा 250 ग्रा’ से 400 ग्रा. संकेन्द्रित आहार दिया जाता है।

प्रजनन –

मादा भेड़ 9 से 14 माह की अवस्था पर प्रजनन योग्य हो जाती है। इनका औसत प्रजनन काल 7 वर्ष तक होता है। भेंड़ों का जीवन काल 10 से 12 वर्ष तक होता है। परंतु 6 से 7 वर्ष के बाद भेड़ों का झुंड से हटा देना लाभदायक होता है। मार्च-अप्रैल में 20-30 प्रतिशत भेडें, जून से अगस्त तक 50-60 प्रतिशत भेडे़ तथा अक्टूबर तक 10 से 15 प्रतिशत भेडें गर्भित हो जाती है। इनका गर्भकाल 150 दिन का होता है। भेड़े 17-18 दिन के ऋतु चक्र पर गर्मी आ आती है तथा बच्चा पैदा होने के 45-75 दिन पर पुनः गर्भित हो जाती है। यदि भेड़ो को उचित देखभाल की जाये तो भेड़ें 14 माह में दो बार बच्चे देती है। नर भेड़ 1 वर्ष की अवस्था में प्रजनन योग्य हो जाता है।

रोग नियंत्रण –

भेड़ को ऊन काटने के बाद औषधि स्नान कराये। भेडों को उदर कृमि से बचाने हेतु समय-समय पर औषधिपान करायें। प्रतिवर्ष इंटरोटाक्सीमिया, खुरपका-मुंहपका, शीप पाक्स एवं गलाघोंटू का टीकाकरण करायें।

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