वर्षा जल संचित्र करने हेतु फार्म पौंण्ड (तालाब) किसान अपने खेत पर ही बनाये

भौगोलिक परिस्थिति, वर्षा की अनियमता तथा अस्थिरता के साथ-साथ अल्प अवधि तथा दीर्धकालीन सूखे से किसानों का फसलोत्पादन प्रभावित होता रहा है। भू-जल की कमी तथा पानी के संचयन की कमी के कारण जायद या ग्रीष्मकालीन फसलें, सब्जियां, चारा आदि का उत्पादन नहीं हो पाता है। कुछ स्थानों में जहां कुंआ, तालाब, नदी व नहर का पानी उपलब्ध है वहां पर जायद की सब्जियां उगाई जा रही हंै।

आवश्यकता है कि वर्षा के जल का प्रबंधन किया जाए, इसके लिये तालाबों का निर्माण रबी फसल कटाई के बाद खाली समय मंे करना चाहिए तथा कर्षण क्रिया द्वारा कुछ जल संचयन/संग्रहण कार्य आगामी फसलों के लिए किया जा सकता है। रबी फसलों की कटाई के बाद खेत को मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करनी चाहिये, जिससे मिट्टी खूब तप जाती है और खेत में मौजूद कीट एवं खरपतवार के अंश ताप से नष्ट हो जाते हंै।

वर्षा होने पर मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता भी बढ़ जाती है। बारानी शोध केन्द्र की एक रिपोर्ट के अनुसार गर्मियों में 15-20 से.मी. की एक गहरी जुताई करने से मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता 20-30 प्रतिशत बढ़ जाती है। भूमि में नमी संचयन के लिए ढलान के विपरीत जुताई, बुआई के पश्चात डोलियां बनाना, कन्टूर तैयार करना तथा खेत को क्यारियों (5मी x 5मी.) में विभाजित कर अन्र्तसस्य, घास पट्टी, लूज स्ट्रोन, चेकडेम आदि तकनीकों को अपनाया जा सकता है।

समतल क्यारी बुआई की तुलना में मेड़बन्दी तथा ढलान के विपरीत बुआई करने से मक्का की उपज में क्रमशः 6.8 तथा 15.9 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी प्राप्त की जा सकती है। ऐसा करने से क्रमशः 1.92 तथा 0.96 टन मिट्टी प्रति हेक्. प्रति वर्ष खेत से बह कर जाने से बचाई जा सकती है। समतल क्यारी व बुवाई के बाद डोलियां बनाने की तकनीक से लगभग 40 प्रतिशत पानी को खेत से बहकर जाने से रोका जा सकता है।

सामान्यतः किसान वर्षा के पानी को एकत्र नही कर पाता है अब सरकार द्वारा फार्म पौंण्ड बनाने की योजना है जिसमें काफी छूट दी जा रही है। अतः किसान फार्म के निचले हिस्से में फार्म पौंण्ड बनाकर पानी का संरक्षण कर सकते हैं। फार्म पौंण्ड के लिए काली व भारी मिट्टी सर्वोत्तम है, क्योंकि इस प्रकार की मिट्टी में रिसाव कम होता है। इसके अतिरिक्त पोखर या नाडी मंे एकत्रित जल का उपयोग खरीफ की फसल में सूखे की स्थिति होने पर फसल की क्रान्तिक अवस्था म ें जीवनदायिनी सिचंाई के लिये किया जा सकता है।

खेत के पास या मध्य स्थित नाले में पानी के बहाव को कम करने के लिये प्रवाह के विरुद्ध निश्चित अन्तराल पर पत्थरों को जमा कर ‘लूज स्टोन चेकडेम‘ बनाना चाहिए। इससे खेत से मिट्टी का कटाव नहीं होगा तथा भूमि के जल स्तर में भी बढ़ोत्तरी होगी।

तालाब निर्माण को जल संरक्षण करें

तालाब का निर्माण खेत के सबसे निचले बिन्दु पर होना चाहिए जिससे खुदाई के लिए कम से कम मेहनत करनी पड़े और वर्षा का अधिकतम पानी इसमें बहकर एकत्र हो जाये। पौण्ड मंे ढलान 1-1 का तथा निकलने वाली मिट्टी 1-1 मीटर का गेप ;वर्तद्ध देकर मेड़बन्दी करनी चाहिए। किसान सुविधा के अनुसार विभिन्न आकार के फार्म पौण्ड बना सकते हंै। पौण्ड का आकार कम से कम 20x20x3 मीटर ;1200घन मीटरद्ध व इससे बड़ा होने पर ही विभिन्न आकार के फार्म पौण्डस् निर्माण पर लघु, सीमान्त, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं महिला कृषकों का लगत का 75 प्रतिशत अथवा अधिकतम रूपये 50,000/-जो भी कम हो, अनुदान देय होगा। सामान्य श्रेणी के कृषर्कों को लागत का 50 प्रतिशत अथवा अधिकतम रूपये 50,000 जो भी कम हो, अनुदान देय होगा।

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