उन्नतशील तरबूज की खेती कर के अपनी आमदनी बढ़ाये

तरबूज एक ककडी के नाम से जाना जाता है। भारत के कई हिस्सों में इसे कालिंदा और कालिंदी नाम से जाना जाता है। इसका का केंद्र दक्षिण अमरीका है। इसमें 92 प्रतिशत पानी के साथ साथ प्रोटीन, मिनरल और कार्बोहाइड्रेटस होते हैं। तरबूज की खेती महांराष्ट्र, कर्नाटका, तामिलनाड, पंजाब, राज्यस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में किया जाता है।
मिट्टी- तरबूज और खरबूजे के लिये उचित उपजाऊ और अच्छे निकास वाली जमीनों में आता है। बुलई टोमट, लाल रेतली और दरमियानी भूमि सर्वेत्तम मानी जाती है। प्रायः तरबूज और खरबूज को गड्डों में लगाया जाता है। गड्ढे बनाने से पूर्व खेत में दो बार हल एवं दो बार डिस्क हैरो चलाकर भूमि को अच्छी तरह से भुरभूरी बना लेना चाहिए। अच्छी पैदावार के लिए फसली चक्र अपनाना चाहिए। पी एच की मात्रा 6.7 में हो।

तरबूज की खेती – Watermelon cultivation or farming in Hindi// tarbuj ke kheti

किस्में –

पूसा वेदना- इस किस्म की सबसे बड़ी विशेषता यह की इसके फलों में बीज नहीं होते है फल में गुदा गुलाबी, रसदार व अधिक मीठा होता है यह किस्म 85 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है।

दुर्गापुर केसर –

यह फल का भार 6 से 7 किलोग्राम तक होता है फल हरे रंग का होता है जिस पर गहरे हरे रंग की धारियां होती है गुदा केसरी रंग का होता है इसमें चीनी की मात्रा 10 प्रतिशत तक होती है।

अर्का ज्योति –

यह फल का भार 6 से 9 किलोग्राम तक होता है इसका गुदा चमकीले लाल रंग का होता है इसका खाने योग्य गुदा अन्य किस्मों की तुलना में अधिक होता है फलों की भण्डारण क्षमता भी अधिक होती है इसकी 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार मिल जाती है।

शुगर बेबी –

इस किस्म के फल बीज बोने के 90 से 100 दिन बाद तोड़ाई के लिए तैयार हो जाती है जिनका औसत भार 4 से 6 किलो ग्राम होता है। यह प्रति हेक्टेयर 200- 250 क्विंटल तक उपज दे देती है।

इम्पूब सिपर –

इनका छिलका हरा और फल बड़े आकार का होता है। इसमें ज्यादातर 8.9 प्रतिशत मिठास होती है। इसकी औसतन पैदावार 70-80 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

स्पेशल -1-

इसका गुद्दा लाल गोल और फल छोटे आकार के होते हैं। यह अगेती पकने वाली किस्म है। इसकी मिठास से इम्पूब सिपर कम होती है।

जमीन की तैयारी-

गहरी जोताई के बाद खेत को सुहागे के साथ समतल करें। तरबूज की बिजाई सीधी भी की जा सकती है और पनीरी लगाकर भी की जा सकती है।

बिजाई-

बिजाई का समय उत्तर भारत में इसकी बिजाई मध्य जनवरी से मार्च और नवंबर-दिसंबर में की जाती है। इसका फासला बिजाई के अलग-अलग तरीकों पर निर्भर करता है। गड्ढा खोदकर बीजने के लिए कतार से कतार की दूरी 2.3-5 मी. और पौधे से पौधे में 60-70 से.मी की दूरी होनी चाहिए।
बीज की गहराई पौधे के बीज की गहराई 2-3 से.मी होनी चाहिए।

बिजाई का ढंग-

इसकी बिजाई के अलग अलग तरीके हैं जैसे क्यारियों पर लगाना, गड्ढा खोद के लगाना, मेड़ में मौसम और ऋतु के अनुसार लगाना ।

क्यारियों में लगाना –

बीज को क्यारी के एक ओर लगाएं। एक समय पर 3-4 बीज बोयें और जमाव के बाद एक सेहतमंद बूटा रखें। पौधों का आपस में फासला 60-90 से.मी रखें।

मेड़ पर लगाना –

यह तरीका गड्ढे खोदने वाले तरीके जैसा ही है इस में 30ग30ग30 से.मी गड्ढे 1-1.5 मीटर के फासले पर लगाएं। दो बीज एक मेड़ पर लगाएं।

बीज-

बीज की मात्रा एक एकड़ की बिजाई के लिए 1.5 से 2 किलो बीज की जरूरत होती है।

बीज का उपचार-

बीज को बीजने से पहले 2 ग्राम कार्बेनडाजिम प्रति किलो से उपचार करें । रासायनिक उपचार के बाद बीज को 4 ग्राम ट्राईकोडर्मा विराइड से उपचार करें । बीज को छांव में सुखाएं और बीज दें। 8-10 टन सड़ी खाद खेत में डालें । खेत में 25 किलो नाइट्रोजनए 16 किलो फासफोरस और 15 किलो पोटाश प्रति एकड़ डालें । 55 किलो यूरिया 100 किलो सुपरफासफेट और 25 किलो पोटाश पूरी फासफोरस पोटाश और एक तिहाई नाईट्रोजन बीज बीजने के बाद खेत में डालें ।

खरपतवार नियंत्रण-

शुरूआत में क्यारियों को खरपतवा से मुक्त रखें। खरपतवा की रोकथाम के बिना 30 प्रतिशत पैदावार कम हो जाती है। बीजने से 15-.20 दिनों के बाद गोडाई करनी चाहिए। खरपतवार की रोकथाम के लिए 2 या 3 गोडाई की जरूरत पड़ती है।

सिंचाई-

गर्मियों में सप्ताह बाद पानी लगाएं। फसल पकने पर जरूरत के अनुसार पानी लगाएं। फसल में पानी ना खडा होने दें। पानी लगाते समय मेंड़ों को गीला ना होने दे विशेष कर फूलों और फलों को पानी ना लगने दें। ज्यादा मिठास और अच्छे स्वाद के लिए फसल काटने पर 3-6 दिन पहले पानी लगाएं।

पौधे की देखभाल-

चेपा और कीड़ा – यह पत्तियों का रस चूसते हैं जिससे पत्ते पीले और मुरझा जाते हैं। थ्रिप से पत्ते ऊपर की तरफ मुड़ जाते हैं और कप के आकार के बन जाते हैं। यदि खेत में नुकसान दिखे तो 5 ग्राम थाईमैथोजम प्रति 15 लीटर पानी मिला कर स्प्रे करें। यदि रस चूसने वाले कीड़े और सफेद जंग का हमला दिखे तो 15 दिनों के फासले पर थाईमैथोक्स और डाईमैथोएट 250 मि.ली. टराइडमोफ 100 मि.ली 200 लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।

फल की मक्खी –

यह एक नुकसानदायक कीड़ा है। मादा अपने अंडे फल में देती है। सूण्डियां फल को खाने लग जाती हैं और फल गल जाता है। प्रभावित फल को तोड़ें और नष्ट कर दें । नुकसान के लक्षण दिखाई देने पर 50 ग्राम नीम की निंबोलियों का घोल प्रति लीटर पानी में मिला कर स्प्रे करें।

पत्तों पर सफेद धब्बे –

इस रोग से प्रभावित पौधे के पत्ते ऊपर सफेद धब्बे होते हैं। यह अपना भोजन पौधे से प्राप्त करते हैं। गंभीर हालतों में पत्ते झड़ जाते हैं और फल समय से पहले पक जाते हैं। नुकसान होने पर 20 ग्राम घुलनशील सल्फर प्रति 10 लीटर को पानी में मिलाकर 2-3 बार 10 दिनों के अंतर पर स्प्रे करें।

अचानक मुरझाना-

यह बीमारी फसल को किसी भी समय नुकसान कर सकती है। शुरूआत में पौधा कमजोर और पीला पड़ जाता हैए गंभीर हालातों में पौधा झुलस जाता है। खेत में पानी ना खड़ा होने दें। प्रभावित पौधे को नष्ट कर दें। ट्राइकोडरमा विराइड 1 किलोग्राम प्रति एकड़ 20 किलोग्राम रूड़ी की गली हुई खाद में मिलाकर प्रति एकड़ में डालें।

पत्ते का सुरंगी कीट-

ये कीड़े पत्ते पर हमला करते हैं और सुरंग बना लेते हैं। नुकसान होने पर 6 मि.ली एबामिकटीन प्रति 15 ली पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

फसल की कटाई-

जब तने के साथ वाले रेशे सूख जाएं और जमीन में लगा फल पीला हो जाए और फल सफेद होने लग जाए तब फल तोड़ लें। फल को थप-थपाने से भद्दी सी आवाज देना इसके पकने की निशानी है। फल को पूरा पकने के बाद ही तोड़ना चाहिए।

कटाई के बाद-

फल को आकार के अनुसार छांट लें और 14 दिनों के लिए 15 डि.से. तापमान पर रखें। तरबूज को सेब और केलों के साथ ना रखें । इससे इसकी सुगंध मर जाती है और फल गलना शुरू हो जाता है।

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