तुलसी की खेती अच्छा मुनाफा लें

तुलसी का वानस्पातिक नाम ओसिमम सैंकशम है। तुलसी एक घरेलू पौधा है और यह भारत में व्यापक स्तर पर उगाया जाता है। तुलसी का पौधा खास औषधीय महत्त्व वाला होता है इस के जड़, तना पत्ती समेत सभी भाग उपयोगी है। यही कारण है कि इस की मांग लगातार बढ़ती ही चली जा रही है मौजूदा समय में इसे तमाम मर्जों के घरेलू नुस्खों के साथ ही साथ आयुर्वेद, यूनानी, होमियोपैथी व एलोपैथी की तमाम दवाओं में अनिवार्य रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है। इस की पत्तियों में चमकीला वाष्पशील तेल पाया जाता है। इसको विभिन्न स्थानों पर विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे अंग्रेजी में होली बेसिल तमिल में थुलसी, पंजाबी में तुलसी और उर्दू में इमली आदि तुलसी की लोगो द्वारा पूजा भी की जाती है। तुलसी के औषधीय गुण जैसे कि जीवों और विषाणुओं के रोधक होने के कारण यह हवा को शुद्ध करने में सहायक है। तुलसी से बनी दवाइयों को तनाव बुखार, सूजन को कम करने और सहनशक्ति को बढ़ाने के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है।

तुलसी की खेती अच्छा मुनाफा लें – Tulsi cultivation make good profit in Hindi

भूमि –

तुलसी की खेती आमतौर पर सामान्य मिट्टी में आसानी से हो जाती है मोटेतौर पर कहें तो अच्छे जल निकास वाली भुरभुरी व समतल बलुई दोमट, क्षारीय और कम लवणीय मिट्टी में इस की खेती आसानी से की जा सकती है। यह कई तरह की मिट्टी में उगाई जाती है। इसकी पैदावार के लिए नमकीन, क्षारीय और पानी खड़ा होने वाली मिट्टी से बचाव करें। यह बढ़िया निकास वाली मिट्टी जिसमे बढ़िया जैविक तत्व मौजूद हो बढ़िया परिणाम देती है। इसके बढ़िया विकास के लिए मिट्टी का का पी.एच 5.5-7 होना चाहिए।
किस्में और पैदावार- यह मुख्य रूप से बंगाल, नेपाल, चटगांव और महाराष्ट्र क्षेत्रों में पाई जाती है। यह गले को सूखेपन से राहत देता है। यह हाथों, और पैरों और गठिया की सूजन से आराम देता है।

यह चीन, ब्राजील पूर्व नेपाल और साथ ही बंगाल, बिहार, चटगांव और भारत के दक्षिणी क्षेत्रों में पाई जाती है। इसका तना जामुनी और पत्ते हरे रंग के और बहुत ज्यादा सुगंधित होते है। इसमें उचित मात्रा में औषधीय गुण जैसे ऐजाडिरैकटिनए ऐंटीफंगल ए ऐंटीबैक्टीरियलए और पाचन तंत्र को ठीक रखती है। यह गर्म क्षेत्रों में बढ़िया उगता है।
बाबी तुलसी, यह पंजाब से त्रिवेंद्रम, बंगाल और बिहार में भी पाई जाती है। इसका पौधा 1-2 फीट लम्बा होता है। पत्ते 1-.2 इंच लम्बे अंडाकार और नुकीले होते है। इसके पत्तों का स्वाद लौंग की तरह और सब्जियों में स्वाद के लिए प्रयोग किया जाता है।

तुकाराम तुलसी –

यह भारत और ईरान के पश्चिमी क्षेत्रों में पाई जाती है। इसका प्रयोग गले की परेशानी, अम्लता और कोढ़ आदि के इलाज के लिए किया जाता है।
अमृता तुलसी – यह पूरे भारत में पाई जाती है। इसके पत्ते गहरे जामुनी और घनी झाड़ी वाले होते हैं। यह कैंसर दिल की बीमारिया, गठिया डायबिटीज और पागलपन के इलाज के लिए प्रयोग की जाती है।

वन तुलसी –

यह हिमालय और भारत के समतल प्रदेशों में पाई जाती है। यह किस्म का पौधा बाकी किस्मों के मुकाबले लम्बा होता है। यह सेहत के लिए लाभदायक होती है जैसे कि तनाव मुक्त करना पाचन तंत्र और पेट के छालों के इलाज में सहायक है। इसके पत्ते तीखे और सुगंध लौंग की तरह सुगंधित होती है।

कपूर तुलसी –

यह मुख्य रूप से विकसित होती है पर यह भारत में पुराने समय से उगाई जाती है। यह मुख्यतः जलवायु के तापमान में आसानी से विकास करती है। इसके सूखे पत्तों को चाय बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है।

जमीन की तैयारी-

तुलसी की खेती के लिए अच्छी तरह से शुष्क मिट्टी की मांग की जाती है मिट्टी के भुरभुरा होने तक हैरो के साथ खेत की जोताई करे फिर रूड़ी की खाद मिट्टी में मिलाए तुलसी की रोपाई सीड बैड पर करें।

बिजाई-

फरवरी के तीसरे महीने में नर्सरी बैड तैयार करें।

पौधे के विकास के अनुसार 4.5 गुण 1.0 गुण 0.2 मीटर के सीड बैड तैयार करें बीजों को 60 गुण 60 से.मी के फैसले पर बोये।
बीज की गहराई- बीजों को 2 से.मी की गहराई पर बोयें
बिजाई -बिजाई के 6-7 हफ्ते बाद फसल की रोपाई खेत में करें

बीज की मात्रा-

तुलसी की खेती के लिए 120 ग्राम बीजों का प्रयोग प्रति एकड़ में करें।
बीज का उपचार – फसल को मिट्टी से पैदा होने वाली बीमारीयों से रोकथाम के लिए बिजाई से पहले मैनकोजेब 5 ग्राम प्रति किलोग्राम से बीजों का उपचार करें।
रोपण विधि- फसल की बढ़िया पैदावार के लिए बिजाई से पहले 15 टन रूड़ी की खाद मिट्टी में डालें तुलसी के बीजों को तैयार बैडों के साथ उचित अंतराल पर बोयें। मानसून आने के 8 हफ्ते पहले बीजों को बैड पर बोये बीजों को 2 से.मी.की गहराई पर बोयें बिजाई के बाद रूड़ी की खाद और मिट्टी की पतली परत बीजों पर बना दें इसकी सिंचाई फुवारा विधि द्वारा की जाती है।

रोपाई-

नर्सरी और रोपाई का तरीका रू 1 हेक्टेयर खेत के लिए लगभग 200-300 ग्राम बीजों से तैयार पौध सही होते हैं बीजों को नर्सरी में मिट्टी के 2 सेंटीमीटर नीचे बोना चाहिए बीज अमूमन 8-12 दिनों में उग आते हैं इस के बाद रोपाई के लिए 4-5 पत्तियों वाले पौधे लगभग 6 हफ्ते में तैयार हो जाते हैं।
रोपाई के 15-20 दिनों के बाद नए पौधों को तंदरुस्त बनाने के लिए 2ः2 अनुपाते यूरिया का घोल डालें 6 हफ्ते पुराने और 4-5 पत्तों के अंकुरण होने पर अप्रैल के महीने में नये पौधे तैयार होते है तैयार बैडों को रोपाई 24 घंटे पहले पानी लगा ताकि पौधों को आसानी से उखाड़ा जा सकें ।
खाद और उर्वरक- तुलसी के पौधे के तमाम भागों को ज्यादातर औषधीय इस्तेमाल में लिया जाता है। इसलिए बेहतर होगा कि रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल न करें या बहुत कम करें् 1 हेक्टेयर खेत में 10-15 टन खूब सड़ी हुई गोबर की खाद या 5 टन वर्मी कंपोस्ट सही रहती है यदि रासायनिक उर्वरकों की जरूरत पड़ ही जाए तो मिट्टी की जांच के अनुसार ही इन का इस्तेमाल करना चाहिए् सिफारिश की गई फास्फोरस और पोटाश की मात्रा जुताई के समय व नाइट्रोजन की कुल मात्रा 3 भागों में बांट कर 3 बार में इस्तेमाल करनी चाहिए

खरपतवार नियंत्रण-

खेत को नदीनों से मुक्त करने के लिए कसी की मदद से गोड़ाई करे नदीनों की रोकथाम कम न होने पर यह फसल को नुकसान पहुंचाते है। रोपण के एक महीने बाद पहली गोड़ाई और पहली गोड़ाई के चार हफ्ते बाद दूसरी गोड़ाई करें रोपण के दो महीने बाद कसी से अनुकूल गोड़ाई करें।
सिंचाई- गर्मियों में एक महीने में 3 सिंचाइयां करें और बरसात के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है एक साल में 12-15 सिंचाइयां करनी चाहिए पहली सिंचाई रोपण के बाद करें और दूसरी सिंचाई नये पौधों के स्थिर होने पर करें। 2 सिंचाइयां करनी आवश्यक है और बाकी की सिंचाई मौसम के आधार पर करें।

पौधे की देखभाल- पत्ता लपेट सुंडी,

हानिकारक कीट और रोकथाम-

पत्ता लपेट सुंडी यह सुंडिया पत्तों कली और फसल को अपना भोजन बनाती है। यह पत्तों की सतह पर हमला करते है और उसे मरोड़ देती है।

इसकी रोकथाम के लिएए इसकी रोकथाम के लिएए 300 मि.ली. कुइनल्फोस को 150 लीटर .पानी में मिलाकर प्रति एकड़ पर स्प्रे करें।
तुलसी के पत्तों का कीट- तुलसी के पत्तों का कीट यह पत्तों को खाते है और अपना मल छोड़ते हैं जोकि पत्तों के लिए बहुत नुकसान-दायक है शुरुआत में पत्ते मुड़ जाते है और सूख जाते है।
इस कीट की रोकथाम के लिएए ऐजाडिरैकटिन 10000 पी पी एम कंसंट्रेशन 5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलकर स्प्रे करें।
पत्तों के धब्बे- बीमारीयां और रोकथाम- पत्तों के धब्बे इस बीमारी से फंगस जैसा पाउडर पत्तों और पौधे को प्रभावित करता है।
पौधों का झुलस रोग- पौधों का झुलस रोग यह फंगस की बीमारी है जो बीजों और नए पौधों को नष्ट कर देती है। इसकी रोकथाम के लिएए इसके लिए फाईटो सेनेटरी विधि का प्रयोग करें।
जड़ गलन- जड़ गलन घटिया निकास के कारण इस पौधे की जड़ें गल जाती है इसके लिए फाईटो सेनेटरी विधि का प्रयोग करें
जड़ गलन की रोकथाम के लिए बाविस्टिन 1प्रतिशत को नर्सरी बैडों के साथ.साथ डालें।

फसल की कटाई-

रोपण के तीन महीने के बाद पौधा पैदावार देनी शुरू कर देता है इसकी तुड़ाई पूरी तरह से फूल निकलने के समय की जाती है पौधे को 15 से.मी. जमीन से ऊपर रखकर शाखाओं को काटें ताकि इनका दोबारा प्रयोग किया जा सके भविष्य में प्रयोग करने के लिए इसके ताजे पत्तों को धूप में सूखाया जाता है।
कटाई के बाद- तुड़ाई के बाद पत्तों को सूखाया जाता है फिर तेल की प्राप्ति के लिए इसका अर्क निकाला जाता है इसको परिवहन के लिए हवादार बैग में पैक किया जाता है पत्तों को सूखे स्थान पर स्टोर किया जाता है इसकी जड़ों से कई तरह के उत्पाद जैसे तुलसी, अदरक तुलसी पाउडर तुलसी, चाय और तुलसी कैप्सूल आदि तैयार किये जाते है।

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