किसान भाई तिल का बीज (Sesame-Seed)उत्पादन कर अच्छा मुनाफा लें

तिल की खेती मुख्यतः राकड़ भूमि में शुद्व एवं मिश्रित रूप से की जाती है। तिलहन की खेती भारत के सबसे पुराने फसल में से एक है। भारत में करीब 5 हजार साल पुराना इतिहास है। इससे हमें वनस्पति तेल मिलता है। तिल से करीब 50 प्रतिशत तेल हमें मिलता है। तिल के उत्पादन 25 प्रतिशत हिस्सा केवल भारत का है।

तिल का बीज (Sesame-Seed)उत्पादन – sesame seeds cultivation in Hindi
भूमि का चुनाव –

बलुई दोमट अथवा ऐसी भूमि जहां जल निकासी की अच्छी व्यवस्था हो तथा राकड़ भूमि मे तिल की खेती के लिये उपयुक्त होती है।

बीज की दर –

3-4 कि.ग्रा. प्रति हेक्.

खेत की तैयारी –

पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 जुताईयां देशी हल से अथवा कल्टीवेटर से करके खेत तैयार कर लेना चाहिए।
प्रजातियां – टा-4, टा- 12, टा, 78, शेखर प्रजाति
पकने की अवधि- 90-100, 85-90, 80-85, 80-85, 85-90
उपज कु./हेक्. – 6-7, 5-6, 6-7, 6-7, 7-8

बुवाई का समय-

जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के दुसरा पखवाड़ा अधिक उपयुक्त है।

बीजोपचार –

बीज जनित रोगो से बचाव हेतु एक कि.ग्रा. बीज को थीरम 2.50 ग्राम से शोधित कर लेना चाहिए।

बुवाई की विधि –

इसकी बुवाई हल के पीछे लाइनो में 30-40 से.मी. की दूरी पर करें। बीज को कम गहराई पर बोये।

उर्वरक –

30 कि.ग्रा. नत्रजन तथा 15 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 25 कि.ग्रा. गंधक प्रति हेक्. की दर से प्रयोग करें। राकड़ तथा भूड़ भूमि में 15 कि.ग्रा. पोटाश तथा गंधक की पूरी मात्रा, बुवाई के समय बेसल ड्रेसिंग के रूप में तथा नत्रजन की शेष आधी मात्रा प्रथम निराई, गुड़ाई के समय प्रयोग करें।

पृथक्करण की दूरी –

तिल प्रमाणित बीज उत्पादन हेतु 50 मीटर एवं आधारीय बीज उत्पादन हेतु 100 मीटर की पृथक्करण की दूरी रखना आवश्यक है।
रोगिंग – फसल की वानस्पतिक अवस्था से लेकर परिपक्वा अवस्था तक अवांछित पौधों का निष्कासन निरंतर करते रहना चाहिए।

निराई एवं गुड़ाई –

प्रथम निराई, गुड़ाई, बुवाई के 15-20 दिनो बाद तथा द्वितीय निराई गुड़ाई 30-35 दिनो के बाद करें। यदि खेत में पौधों की संख्या अधिक हो तो थिनिंग करकें पौधे की दूरी 10-20 से.मी. निश्चित करें।
सिंचाई- जब पौधों में 50-60 प्रतिशत फली लग जाए उस समय वर्षा न हो तो सिंचाई करना आवश्यक है।

फसल सुरक्षा
प्रमुख रोग –

रोग – तिल की फाईलोडी

पहचान- यह रोग माइकोप्लाज्मा द्वारा होता है। इस रोग में पौधो का पुष्प् विन्यास पत्तियों के विकृत रूप में बदलकर गुच्छे दार हो जाता है। इस रोग का वाहक कीट फुदका है।
उपचार नियंत्रण – बुवाई के समय कूंड में फोरेट 10 जी 15 कि.ग्रा. प्रति हेक्. की दर से प्रयोग करें।

फाइटोफ्थोरा झुलसा –

इस रोग में पौधे के कोमल भाग व पत्तियों झुलस जाती है।

उपचार नियंत्रण-

इसकी रोकथाम हेतु 2.5 कि.ग्रा. मैकोजेब प्रति हेक्. की दर से आवश्यतानुसार छिड़काव 2-3 बार करना चाहिए।

प्रमुख कीट –
पत्ती व फल की सूंडी-

पहचान – इसकी सूड़िया कोमल पत्तियों तथा फलियों को खाती है एवं इन्हे जाला बनाकर बांध देती है।

उपचार नियंत्रण-

इन्डोसल्फान 35 ई.सी. 1.25 ली/हेक्. का प्रयोग करें

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