उन्नतशील खेती स्ट्रॉबेरी का कैसे करें जिससे हो अधिक कमाई

स्ट्रॉबेरी फल को लोग बहुत पसंद करते है। क्योकि यह हार्ट का अकार का होता है तथा इसका स्वाद खट्टा और मीठा होता है। यह भारत के कुछ मुख्य शहरो और बाजारों में इसकी मांग बनी रहती है। समान्यतः इसकी खेती खुले मैदान में कि जाती है। ग्रीन हाउस में स्ट्रॉबेरी की खेती बेहतर होता है क्योंकि ग्रीन हाउस में स्ट्रॉबेरी की खेती में फल की गुणवत्ता बनी रहती है।

अधिकतर स्ट्रॉबेरी फसल मैदानी क्षेत्र में खेती की जाती है आजकल स्ट्रॉबेरी की खेती ग्रीन हाउस में में की जाती है क्योंकि ऑफ-सीजन में स्ट्रॉबेरी की कीमत अधिक मिलता है। ग्रीनहाउ में स्ट्रॉबेरी पौधे वर्षों तक बढ़ते हैं। स्ट्राबेरी फल में विटामिन “सी“ आयरन, पोटेशियम और फाइबर प्रचुर मात्रा में होता है। जो मनुष्य जीवन के लिये बहुत ही लाभकारी है तथा इसे खाने से स्किन में चमक तथा गठिया और जोडो के दर्द में बहुत ही लाभकारी सिद्ध होता है। इससे सुपर- फुड के भी कहा जाता है। भारत में महाबलेश्वर,ऊटी, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और भारत के पूर्वोत्तर राज्य जैसे क्षेत्रों में स्ट्रॉबेरी खेती की जाती है।

स्ट्राबेरी से कुछ खाद्य पदार्थ बनाये जाते है जैसे- जैम, पेय, कैंडी इत्यादि बनाये जाने से इसकी खेती में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहा है।

उन्नतशील खेती स्ट्रॉबेरी का कैसे करें-How to cultivate strawberries in Hindi

जलवायु – Climate for Strawberries cultivation in Hindi 

स्ट्रॉबेरी को खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है हालांकि कुछ किस्मों उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में बढ़ सकती फूल गठन के दौरान उन्हें लगभग दस दिनों के लिए आठ से बारह घंटे की एक फोटोपॉयर्ड सूरज की रोशनी की आवश्यकता होती है। मैदानी क्षेत्रों में सिर्फ सर्दियों में ही इसकी एक फसल ली जा सकती है। पौधे अक्टूबर.नवम्बर में लगाए जाते है। जिन्हें शीतोष्ण क्षेत्रों से प्राप्त किया जाता है। यहाँ फल फरवरी-मार्च में तैयार हो जाते है। दिसम्बर से फरवरी माह तक स्ट्राबेरी की क्यारियाँ प्लास्टिक शीट से ढँक देने से फल एक माह पहले तैयार हो जाते हैं और उपज भी 20 प्रतिशत अधिक हो जाती है। अधिक वायु वेग वाले स्थान इसकी खेती के लिये उपयुक्त नहीं है।

भूमि का चुनाव तथा खेत की तैयारी – Selection of land and farm preparation for Strawberries in Hindi 

स्ट्रॉबेरी में एक रेशेदार जड़ प्रणाली है। इसलिए इसकी अधिकांश जड़ें शीर्ष मिट्टी में 15 सेमी की गहराई तक अधिकतम प्रवेश करती रहती हैं। इसलिये इसे खेती के लिए एक आर्द्र समृद्ध मिट्टी की आवश्यकता होती है। स्ट्रॉबेरी 5.0.-6.5 के पीएच के साथ थोड़ा अम्लीय मिट्टी में सबसे बढ़ता है। मिट्टी का पी.एच 4.5 और 5.5 के बीच मिट्टी में भी बढ़ सकता है। इसके लिये हल्की रेतीली से लेकर दोमट चिकनी मिट्टी में की जा सकती है लेकिन दोमट मिट्टी इसके लिये विशेष उपयुक्त मानी जाती है। अधिक लवणयुक्त तथा अपर्याप्त जल निकास वाली भूमि इसकी खेती के लिये अच्छा नहीं हैं।

इसकी खेती के लिए पहले हल चलाकर मिट्टी भुरभुरी बना ली जाती है। पहाड़ी ढलानों में सीढ़ीनुमा खेतों में क्यारियाँ 60 सेमी चौड़ी तथा खेत की लम्बाई स्थिति अनुसार तैयार की जाती है। सामान्यतः 150 सेमी लम्बे तथा 60 सेमी चौड़ी क्यारी में दस पौधे रोपे जाते हैं। खाद तथा उर्वरकों की मात्रा मिट्टी की उपजाऊ शक्ति व पैदावार पर निर्भर होती है। फिर भी क्यारियों में अच्छी तरह गली-सड़ी 10-15 किलोग्राम गोबर की खाद और 50 ग्राम उर्वरक मिश्रण जिसमें सुपर फास्फेट और म्युरेट ऑफ पोटाश 22.1 के अनुपात में देनी चाहिए। इस मिश्रण को मार्च तथा अगस्त माह में दिया जाता है। मैदानी क्षेत्रों में इसकी खेती 60.75 सेमी चौड़ाई वाली लम्बी क्यारियाँ बनाककर जिसमें दो कतारें लगाई जा सकें या मेढ़े बनाकर उसी प्रकार की जा सकती है जिस प्रकार टमाटर या अन्य सब्जियाँ उगाई जा सकती हैं।

पौधे लगाने की विधि

शरद ऋतु के दौरान स्ट्रॉबेरी की अधिकतम वृद्धि होती है। जब सर्दियों में प्रवेश होता है तो यह निष्क्रिय हो जाता है। सर्दियों के बाद यह वसंत ऋतु के दौरान फूलना शुरू कर देता है। इसलिएए स्ट्रॉबेरी आमतौर पर सितंबर से अक्टूबर महीने के दौरान लगाये जाते हैं। शुरुआती वृक्षारोपण के परिणामस्वरूप कम पैदावार होगी क्योंकि इस तरह के पौधों में ताकत नहीं है। पहाड़ी क्षेत्रों में पौधे अगस्त-सितम्बर तथा मैदानी क्षेत्रों में अक्टूबर से नवम्बर तक लगाए जाते हैं। पौधे किसी प्रमाणित व विश्वस्त नर्सरी से ही लिये जाने चाहिए जिससे इसकी जाति की जानकारी मिले और रोग रहित भी हों। पौधे लगाने से पहले पुराने पत्ते निकाल दिये जाने चाहिए और एक दो नए उगने वाले पत्ते ही रखने चाहिए। क्यारियों में कतार.से.कतार तथा पौधे.से.पौधे का अन्तर 30 सेमी रखना चाहिए है। पौधा लगाने के समय क्यारियों में लगभग 15 सेमी गहरा छोटा गड्ढा बनाकर पौधा लगाकर उपचारित जड़ों के इर्द.गिर्द को अच्छी तरह दबा दिया जाता है ताकि जड़ों तथा मिट्टी के बीच वायु न रहे। पौधे लगाने के बाद हल्की सिंचाई आवश्यक है।

उन्नत किस्में

स्ट्रॉबेरी की विभिन्न किस्में उपलब्ध हैं जो कीट और रोग प्रतिरोधी हैं। उन्हें विभिन्न जलवायु स्थितियों में आसानी से उगाया जा सकता है। उच्च उत्पादन और गुणवत्ता के लिये। जिसे अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है उन्नत किस्मों में मुख्य ट्योग, टोरी, एन आर राउंड हैड, सेल्वा, रैड कोट, कंटराई स्वीट आदि है। जो सामान्यतया छोटे आकार के फल देती है। इनमें अच्छा आकार टोरे तथा एन आर राउंड हैड का ही है जिसके फल का वजन 4.5 ग्राम होता है। आजकल बड़े आकार वाली जातियाँ देश में आयात की जा रही है जिनमें चाँडलर कनफ्यूचरा, डागलस, गारौला, पजारों, फर्न, ऐडी, सैलवा, ब्राईटन, बेलरूबी, दाना तथा ईटना आदि प्रमुख है। स्ट्राबेरी की उपज इसकी जाति और जलवायु पर निर्भर करती है।

सिंचाई और देखभाल
स्ट्रॉबेरी खेती में फसल रोटेशन

स्ट्रॉबेरी फसल के लिये मिट्टी में बहुत सारे पोषक तत्वों की जरूरत होती है। इसलिए इस फसल के बाद सेम फसलों चक्र का अपना चाहिए। स्ट्राबेरी के पौधों की जड़ें गहरी होती हैं इसलिये जड़ों के निकट नमी की कमी से पौधों को क्षति हो सकती है और पौधे मर भी सकते हैं। सिंचाई की थोड़ी सी कमी से भी फलों के आकार और गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ता है। स्ट्राबेरी की फसल को आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई चाहिए। सामान्य परिस्थितियों में शीत ऋतु में 10-15 दिन तथा ग्रीष्म में 5-7 दिन के अन्तराल में सिंचाई आवश्कता होती है।

स्ट्राबेरी की क्यारियों को सूखी घास या काले रंग की प्लास्टिक की चादर से ढँकने के विशेष लाभ है। सूखी घास की मोटाई 5.7 सेमी रखनी आवश्यक है क्योंकि इससे मिट्टी में अच्छी नमी रहती है और खरपतवार भी नियंत्रित रहते है। इसके साथ ही पाला लगना फलों का सड़न कम हो जाता है और पक्षियों द्वारा नुकसान की संभावना भी कम हो जाता है।
स्ट्राबेरी का पौधा पहले वर्ष से ही फल देने लग जाता है। शीतोष्ण क्षेत्रों में एक पौधे की लाभप्रद फसल तीन वर्ष तक ली जा सकती है परन्तु सबसे अधिक उपज दो वर्ष की आयु का पौधा देता है।

कीट व रोग नियंत्रण

स्ट्राबेरी की खेती को कई कीट व रोग क्षति पहुँचाते हैं जिनमें तेला, माइट, कटवर्म तथा सूत्रकृमि प्रमुख है। डीमैथोयेट, डिमैटोन, फौरेट का प्रयोग इन्हें नियंत्रण में रखता है। फलों पर भूरा फफूंद रोग तथा पत्तों पर धब्बों वाले रोगों का नियंत्रण डायाथयोकार्बामेट पर आधारित फफूंदनाशक रसायनों के छिड़काव से किया जा सकता है। फल लग जाने के बाद किसी भी फफूंद व कीटनाशक रसायनों का छिड़काव नहीं करना चाहिए। यदि किन्हीं आपातकालीन परिस्थितियों में करना भी पड़े तो छिड़काव विशेष सावधानी से किया जाना चाहिए। तीन वर्ष तक स्ट्राबेरी की खेती करने के बाद खेतों को कम.से.कम एक वर्ष तक खाली रखने या गेहूं, सरसों मक्का तथा दलहन फसलों का फसल चक्र अपनाने से कीट, सूत्र.कृमि तथा अन्य रोगों का प्रकोप कम हो जाता है।

तुड़ाई

फरवरी के आखिरी सप्ताह से मार्च माह तक मैदानी क्षेत्रों में फल पकने शुरू हो जाते हैं। पकने के समय फलों का रंग लाल होने लगता है। जब फल का आधा से भाग लाल रंग का हो जाए तो तुड़ाई कर लेनी चाहिए। फलों की तुड़ाई विशेष सावधानी तथा कम गहरी टोकरियों से ही करनी चाहिए। तुडाई करते समय रोग क्षति पौधों की छांटाई कर देनी चाहिए।

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