सोयाबीन की खेती कैसे करे जिससे हो अधिक आमदनी

भारत में सोयाबीन की खेती कई राज्यों मे की जाती है। यह एक बहुगुण सम्पंन दलहनी एवं तिलहनी फसल है। इसमें 40 प्रतिशत प्रोटीन एवं 20 प्रतिशत तेल होता है। आहार की पौष्टिकता बढ़ाने के लिये सोयबीन का मिश्रण किया जा सकता है। सोयाबीन से दूध, दही, तथा मक्खन बनाया जा सकता है। इसका दूध रसायनिक विश्लेषण की दृष्टि से गाय के दूध के तुल्य होता है। यह भूमि की उर्वरा शक्ति को बढा़ती है। तेल निकालने के बाद इसकी खली में अच्छी मात्रा में प्रोटीन एवं खनिज तत्व रहते है। अतः भूमि में खाद देने और पशुओं को खिलाने के उपयोग में लाया जाता है। एंटीबायोटिक पैदा करने वाला जीवांणुओं के लिये सोयाबीन एक मंनपसंद भोजन है। वनस्पति घी बनाने के लिये इस तेल का उपयोग में लाया जाता है। इसका इस्तेमाल कई तरह की वस्तुओं को बनाने में लाया जाता है जैसें – सैन्ट, वार्निश, साबुन, स्याही, रबर, ग्लिसरीन आदि।

सोयाबीन की उन्नत खेती कैसे करें – Soyabean Ki Kheti Kaise Kare// soybean farming techniques in hindi

सोयाबीन की किस्में – Types of Soyabean in Hindi
जे.एस. 335 (1994) –

यह एक पीले दाने वाली वृहत अनुकूलता उत्तम अंकुरण क्षमता वाली किस्म है। यह 95 -100 दिन में पकने वाली किस्म, 25-30 क्टि. प्रति हेक्. की उपज देती है।

एन.आर.सी 37 (2001) –

पीले दाने वाली, मध्यम उंचाई की यह किस्म 90-95 दिन में पक्क कर तैयार हो जाती है। इसके 100 दानों का भार 10-13 ग्राम तथा औसत फलियों एवं पत्तियों पर हल्के सलेटी रंग के रोये, दाना हल्का पीला, भूरा हायलम, उत्तम अंकुरण क्षमता तथा मध्यम उंचाई मुख्य है। यह किस्म जीवांणु पत्ती धब्बा, अन्य वायरस रोगों एवं अन्य पत्ती खाने वाले कीड़ों एवं गर्डल बीटल कीट से मध्यम प्रतिरोधी है। इसका किस्म का तेल औसत मात्रा 17-18 प्रतिशत तक निकल जाता है।

जे.एस. 93-05 –

यह संकर पत्ती वाली किस्म है 85 दिन में पककर तैयार हो जाती है। मध्यम उंचाई यह किस्म जीवांणु पत्ती धब्बा नामक बीमारियों से सहनशीन है। इसके बैगनी पुष्प हल्के पीले रंग के बीज होते है। 100 दानों का भार 10-12 ग्रा. तथा औसत उपज 25-30 कि्ंट प्रति हेक् की दर से हो जाती है।

प्रताप सोया- (2007)

औसत उंचाई वाली यह किस्म 90-95 दिन में पककर तैयार होती है। इसके पुष्प बैंगनी रंग के होते है। 100 दानो का भार 10-12 ग्रा. तथा औसत उपज 25-30 क्टि. प्रति हेक् की दर से हो जाती है। इसका किस्म काभी अच्छा अंकुरण होता है। गर्डल बीटल के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी एवं तम्बाकू ईल्ली और अन्य रोगो से मध्यम प्रतिरोधी है। इसके 100 दानों का भार 11-14 ग्रा. है। दानों में तेल व प्रोटीन की मात्रा कमशः 18-20 तथा 40-42 प्रतिशत है। इसकी उपज 25-30 कि्ंट प्रति हेक्. तक प्राप्त कर सकते है।
इसके अल्वा अन्य किस्मे भी जैसे- आर.के एस.-18 प्रताप सोया-2 (2007), जे.एस. 71-05 (1985), प्रताप राजा सोया -24 (2011), जे.एस. 9560 (2007), आर.के.एस. 45 (2013) आदि है।

खेत की तैयारी –

सोयाबीन के खेती के लिये दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है। मटियार भूमि में जहां जल निकास की अच्छी व्यवस्था हो, वहां इसकी खेती की जा सकती है। लवणीय, क्षारीय तथा जल भराव वाले खेतों में इसकी खेती नहीं की जा सकती है। गर्मी में एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से तथा बाद में देशी हल से दो तीन बार खेत की जुताई कर लेनी चाहिए ताकि भूमि भुरभूरी हो जाये। इसके बाद पाटा चलाकर बुवाई के लिये खेत तैयार हो जाता है।

बीज उपचार –

बुवाई के लिये टी 49 किस्म का 50 किलो बीज पर्याप्त है, जबकि अन्य किस्मों में प्रति हेक्. 80 से 100 किलो बीज काफी रहता है। बोने से पूर्व बीज को 3 ग्रा. थाइरम या 2 ग्रा कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू पी. द्वारा प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें। बीज को सोयाबीन कल्चर से उपचारित करना आवश्यक है। अतः इसके पश्चात् सोयाबीन कल्चर से बीजोपचार करें।

बुवाई –

खेत में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो वहां सोयाबीन की बुवाई 15 जून से 30 जून तक कर दें। जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध न हो वहां वर्षा प्रारंभ हो बुवाई की जानी चाहिए। इसकी दूरी कतार से कतार 30 से.मी. रखें। शीघ्र पकने वाली किस्मों में पौधे से पौधे की दूरी 7.5 से.मी. मध्यम अवधि वाली किस्मों में 10 से.मी. तथा देर से पकने वाली किस्में 12.5 से.मी. रखनी चाहिए। कल्चर से उपचारित बीजों को डी.ए.पी के साथ कभी नहीं मिलाना चाहिए। इस इसके ऊपर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

निराई गुड़ाई –

बुवाई के 15-20 दिन के पश्चात अतिरिक्त पौधों को निकालकर पौधे से पौधे की दूरी किस्म के आधार पर कर दें। हल या कुल्फा चलाकर पहली निराई-गुड़ाई 25 से 30 दिन की अवस्था पर करें तथा आवश्कतानुसार दूसरी निराई -गुड़ाई 40-45 दिन की अवस्था पर करें। खरपतवार नाशी रसायन के द्वारा सोयाबीन फसल में खरपतवारों को नियंत्रण किया जा सकता है। इसके लिये प्रति हेक्. 750 ग्रा. फ्लूक्लोरेलिन सक्रिय तत्व बुवाई के एक दिन पहले 500-600 ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

सोयाबीन की खड़ी फसल खरपतवार नियंत्रण हेतु अंकुरण के 15-20 दिन के पश्चात् इमेजाथाइपर ग्रा. 600 ली. पानी में घोलकर प्रति हेक्. की से छिड़काव करें। सोयाबीन में घास वाले खरपतवारों के नियंत्रण हेतु क्विजांलफोप-एथिल 50 ग्रा. प्रति हेक्’ की बुवाई के 15 से 20 दिन के अंदर छिड़काव कर दें।

सिंचाई – Cultivation of Soyabean in Hindi

सोयाबीन की फसल को वैसे तो बिना सिंचाई के ही उगाया जाता है, किन्तु फूल व फलियां बनने के समय पानी की कमी बिल्कुल होने देना चहिये। अतः उस समय वर्षा न हो तो आवश्तानुसार एक या दो सिंचाई करनी चाहिए।

कीट एवं उनका नियंत्रण कैसे करे- (Diseases and Control)

फड़का कीट-

यह एक प्रकार फड़का कीट है जो सोयाबीन के खेत में उगते समय लगता है। सोयाबनी के खेत में 5-7 दिन में फड़के कीट प्रकोप शुरू हो जाता है। इसका प्रजनन खेतों की डोलियों पर उगने वाली घास से होता है। अतः यह जमीन की सतह से फुदकते हुए फसल की नई पत्तियों को काटने लगते है। इसके नियंत्रण के लिये मिथाइल पैराथिन 2 प्रतिशत या मैलाथिन 5 प्रतिशत 25 कि.लो. प्रति हेक्. की छिड़काव करना चाहिये। इसके बाद 7-15 दिन के उपरांत दुबारा से फिर छिड़काव कर दें।

तना छेदक कीट –

तना छेदक कीट इनके वयस्क एक विशेष प्रकार की छोटी मक्खी होती है। तना मक्खी पौधों के तनो कोमल टहनी के जोड़ ऊपरी छाल की सतह की नीचे अंडा देती है। इसमे से 3-5 दिन में में लटें निकलते ही कोमल टहनी के बीच का गूदा खाने लगती है, जिससे टहनी मुरझाकर सूख जाती है। इन कीटो के रोकथाम हेतु फेन्थियान या लेबासिड या क्यूनालाफॉस 500-700 मि.ली. मिथाइल पैराथियान 50 ई.सी. एक ली. पानी में घोल बनाकर फसल पर अच्छी प्रकार से छिड़काव करें। आवश्कतानुसार 2-3 सप्ताह बाद पुनः छिड़काव करना चाहिए।

फुदका कीट (जैसिड्स) सोयाबनी के फसल में फुदके अथवा तैला बहुत नुकसान करते है ये छोटे-छोटे कीट पत्तियों के रस चूसते है, जिससे पत्तियों पीली पड़कर सूख जाती हैं और पैदावार प्रभावित होती है। ये कीट विषाणु रोग को फेलने में मदद करते है। इनका प्रकोप फसल के पूरे समय में ही होता रहता है। इन कीटों के नियंत्रण हेतु कीटनाशी दवाई अधिक उपयोगी रहती है। डाइमेथोएट, 30 ई.सी. या मिथाइल डिमेटोन 25 ई.सी. अथवा फारमेथियान 400-600 मि.ली. दवा को 400-600 ली. पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। आवश्कता पड़ने पर 3 सप्ताह बाद दुबारा छिड़काव करते रहना चाहिए।

गर्डल बीटल-

यह एक प्रकार का मुख्य हानिकारक कीट है। भृंग अथवा बीटल प्रवर्ग की इस कीट का वयस्क करीबन 10-12 मि.मी. चौड़ा, लाल व काले रंग का कड़े पंख का होता है। अन्य भृंग की तुलना में यह कीट बहुत तेज उड़ता है जो 25-30 दिन की सोयाबीन या ढेंचा फसल पर देखे जा सकते है। गर्डल बीटल कीट 20-30 प्रतिशत तक पैदावार में कमी कर देती है। जल्दी बोई गई फसल में इसका प्रकोप ज्यादा होता है। इसके रोकथाम हेतु 30-35 दिन पर ही फसल पर फेन्थियांन अथवा डायमेथोएट 30 ई.सी. एक लीटर या मोनोक्रोटोफास 30 एस.एल. एक ली. ऐसिफेट 75 एस.पी. 500 ग्राम को पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए तथा सप्ताह में दुबारा छिड़काव करना चाहिए।

सोयाबीन पौधो की बीमारियां एवं उनका नियंत्रण –

पीलिया रोग –

यह रोग फसल में पीलापन दिखाई देता है। इसके नियंत्रण हेतु 0.5 प्रतिशत फैरस सल्फेट का छिड़काव करें।

जीवांणु रोग –

यह रोग पीली किस्म की जातियों में अधिक होता है इसमें पत्तियों पर हल्के भूरे रंग का पश्चूल्स बन जाते है। यह सामान्यतः 40 दिन की फसल पर आता है। रोग अधिक होने पर रोगाग्रस्त होकर पत्तिया गिरने लगती है। इसकी रोकथाम हेतु 2.5 ग्रा. स्ट्रोप्टोसाइक्लिन को 10 ली. पानी में घोलबनाकर छिड़काव करें।

विषाणु रोग –

सोयाबीन पर विभिन्न प्रकार के विषाणु रोग का प्रकोप होता है। जिसमें मूंग, मोजेक, चंवला, सोयाबीन मोजेक, बीन मोजेक, इत्यादि मुख्य है। इन रोग होने के कारण पौधो की बढ़वार कम हो जाती है। इसके रोकथाम हेतु यदि पौधे रोगग्रसित हो तो उन्हें उखाड़कर जलाना चाहिए। मिथाइल डिमेटोन 25 ई.सी. 500-600 मि.ली. दवा को 500 ली. पानी में घोलबनाकर छिड़काव करना चाहिए।

पत्ती धब्बा रोग-

यह पत्तियों पर हल्के भूरे से गहरे रंग के धब्बे 38-40 दिन बाद विभिन्न फुदों द्वारा जैसे सरकोस्पोरा, कोलेटोट्राईकम, फाइटोप्थोरा आदि है। इनकी रोकथाम हेतु मैंकोजेब 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए।

तना गलन –

यह रोग राइजोक्टोनिया नाम के फफूंद से होता है। इन तने पर भूरे व काले रंग के दाग जमीन से 10-15 से.मी. ऊपर बन जाते है। जिससे पौधे धीरे-धीरे सूखने लग जाते है। इसके रोकथाम हेतु डेढ़ से दो किलो दवा को 600-700 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

जड़गलन –

सोयाबीन फसल की प्रारंभिक अवस्था में जड़ गलन रोग की रोकथाम हेतु 6-8 ग्रा. ट्राईकोडर्मा प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करें।

कटाई –(Harvesting)

पत्तियों का रंग पीला होने पर फसल को काट लेना चाहिए।

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