सोयाबीन की बुवाई कर अच्छा मुनाफा लें

सोयाबनी एक पौष्टिक दानों वाली फसल है इसके दानों में 40-42 प्रतिशत प्रोटीन एवं 20-22 प्रतिशत तेल पाया जाता है। धानों में लायसीन नामक अमीनोअम्ल की कमी होती है जबकि सोयाबीन में इस अमीनों अम्ल की काफी मात्रा पायी जाती है।

सोयाबीन की खेती और बुवाई कैसे करें – Soyabean Crop Cultivation in Hindi

खेत का चुनाव –

सोयाबीन की खेती हल्की दोमट से लेकर भारी दोमट मिट्टी में कर सकते है। इसका पी.एच. 6-8 के मध्य होना चाहिए। ऐसे खेत का चुनाव करें जिसमें गतवर्ष सोयाबीन फसल न बोयी गयी हो। यदि ऐसा संभव न हो तो उसी प्रजाति को बोयें जो गतवर्ष बोयी गयी हो।

बुवाई की विधि –

पर्वतीय क्षेंत्रों में बुवाई 10 जून तक कर देनी चाहिये तथा मैदानी क्षेत्रों में 25 जून तक कर देनी चाहिये। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 5-6 से.मी. रखनी चाहिए। बीज को 3-5 से.मी. गहराई पर बोना चाहिये। बोते समय पर्याप्त नमी आवश्यक है।

उर्वरक –

मिट्टी की जांच के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करें। पर्वतीय क्षेत्रों में 80 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हेक्. तथा मैदानी क्षेत्रों में 20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन एवं 60 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हेक्. की दर से बोते समय कूड़ो में बीज से 5-7 से.मी. दूर डालें।

पृथक्करण दूरी –

सोयाबीन बीज फसल उत्पादन हेतु 3 मी. पृथक्करण दूरी रखना चाहिए आवश्यक है।

खरपतवार नियंत्रण –

सोयाबीन दो दाल वाली फसल है इसमें निराई-गुड़ाई करने से खरपतवार नहीं नियंत्रित होते है बल्कि अच्छे वायु संचार से पौधे भी स्वस्थ होते है पहली निराई-बुवाई के 20-25 दिन बाद तथा दूसरी 40-50 दिन बाद करनी चाहिए।

रासायनिक नियंत्रण –

एलाक्लोरा 2 कि.ग्रा. अथवा फल्युक्लोरिलिन 1 कि.ग्रा. अथवा पेन्डीमिथाइलिन 1 कि.ग्रा. का 500-800 ली. पानी में घोल बनाकर बुवाई के तुंरत बाद 48 घंटे के भीतर छिड़काव करें।

रोग नियंत्रण –

राईजोक्टोनिया झुलसा रोग इस रोग में पत्तियां पर हल्के भूरे धब्बे बनते है बाद में पत्तियों झुलस जाती हैं। इसकी रोकथाम के लिये रोगरोधी प्रजाति पीके-1024, पीके 1029 बोये तथा रोग की रोकथाम के लिये खड़ी फसल पर डाइथेन एम 45 की 2 कि.ग्रा. या कार्बन्डिज्म 50 प्रतिशत डब्लू पी की
0.5 कि.ग्रा. मात्रा को 7000-800 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

पीला चित्रवर्ण –

इस रोग की रोकथाम के लिये उपरोक्त वर्णित प्रतिरोधी सोयाबीन प्रजातियां लगायें तथा मेटासिस्टाक्स 25 ई.सी. के 0.10 प्रतिशत घोल का दो छिड़काव फसल की बुवाई के 35-40 दिन बाद तथा दूसरा 50-55 दिन पर करें।

कीट प्रबंधन

बालदार कीट- इस कीट को छोटी सूडिंया प्रांरभ में पत्तियों को निचली सतह पर झुंड में चिपक कर पत्तियों को छलनी कर देती है। बड़ी अवस्था में पत्तियों को खाती है। इसकी रोकथाम के लिये मोनोक्रोटोफासल 30 ई.सी. का 0.004 प्रतिशत घोल का छिड़कवा पहली अवस्था पर पौधें पर करें।

हरा भूरा सेमीलूपर –

यह पत्तियों को खाता है। क्वीनालफास 25 ई.सी. का 0.05 प्रतिशत का छिड़काव करें।
गर्डिल बीटल – पौधों के तनों या डंठलों में दो बारीक रिंग बनाती है। जिससे रिंग का ऊपरी भाग सूख जाता है। इस की रोकथाम हेतु बुवाई के समय फोरेट 10 जी0 10 कि.ग्रा. प्रति हेक्. की दर से खेत की तैयारी के समय उपयोग किया जायें।

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