जैविक शलजम की खेती कर अधिक मुनाफा लें

शलजम की खेती भारत के अधिकतर प्रदेशों में किया जाता है जैसे- बिहार, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु आदि प्रदेशों में किया जाता है। इसकी जडे़ का फल, सब्जी तथा सलाद के रूप में उपयोग में लाया जाता है। शलजम में विटामिन सी, प्रमुख स्रोत होता है। इनके पत्तियों में विटामिन सी, विटामिन के, तथा कैल्शियम का मुख्य स्रोत होता है। यह समशीतोष्ण, उष्णकटिबंधीय और साथ ही भारत के उप उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में उगाया जाता है। आमतौर पर यह इसका रंग सफेद होता है। इन पत्तियों का पौष्टिक भाग पशुओं के आहार में लाया जाता है।

शलजम की जैविक खेती कैसे करें -Shalgam (Turnip) Ki Kheti Kaise Kare

किस्में – Types of turnip in Hindi

पप्रल टॉप व्हाईट ग्लोब – जड़े लम्बी व गोल, ऊपर का भाग बैंगनी व लाल परन्तु निचला भाग सफेद, 50-60 दिन में तैयार, औसत उपज 310-375 कि्. प्रति हेक्.
स्नोबॉल – बहुत कुछ ऊपर की किस्म कि तरह परन्तु जड़े छोटी, गोल और हल्की पीली, 60 दिन में तैयार, औसत उपज  190-250 कि्. प्रति हेक्.
पूसा चन्द्रिमा – जड़े बड़े आकार की गोलाकार या चपटी, सफेद शिखर मध्यम परन्तु कम गहरे, अगेती फसल, अक्तूबर की बुवाई के लिये उपयुक्त, औसत उपज 310-375 कि्. प्रति हेक्.।
पूसा स्वर्णिमा – अगेती, शिखर मध्यम और गहरे, जडे़ चपटी और गोल, छिलका हल्का पीला, गूदा अच्छी बनावट वाला, गंधमी रंग का 70 दिन में तैयार, औसत उपज 310-375 कि्. प्रति हेक्.

बुवाई का समय

 सितम्बर-नवम्बर
बीज की मात्रा – 4.0-4.5 कि.ग्रा. प्रति हेक्.
अन्तर – 30 गुणा 10 से.मी.

खाद एवं उर्वरक –  Compost and fertiliser for Turnip farming in Hindi

शलगम की अच्छी पैदावार के लिये 80 किलोग्राम, नाइट्ररेजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस तथा पोटाश 40 कि.ग्रा की आवश्यकता पड़ती है। उपरोक्त तत्वों के पूर्ति के लिये 80-100 कुन्तल नादेप कम्पोस्ट खाद अथवा 150-200 कुन्तल सड़ी गोबर की खाद के साथ 2 कि.ग्रा. प्रति हेक्. की दर से जैव उर्वरक को अन्तिम जुताई के समय खेत में मिला देना चाहिए। निराई-गुड़ाई व मिट्टी चढ़ाने (बुवाई को 30-35 दिन बाद) समय 2 कि.ग्रा. जैव उर्वरक, एवं 2 किग्रा. गुड़ को 150-200 कि.ग्रा. अच्छी सड़ी कम्पोस्ट खाद के साथ छाया में सात से दस दिन तक सड़ाकर कर सिंचाई के समय खेत में बुरक दें। सूक्ष्म तत्वों की पूर्ति के लिये सिंचाई के पानी के साथ 3 बार जीवामृत का उपयोग करें।

बीजोत्पादन – Seed Production of Organic Turnip in Hindi

शीतोष्ण किस्मों के बीज मध्य ओर ऊँचे पर्वतीय क्षेंत्रो में तैयार किया जाता है। गुणवत्ता वाले बीज-उत्पादनके लिय जड़ से बीज प्राप्त करने की विधि अपनाएं।
शुष्क शीतोष्ण क्षेत्रों में जड़ों का शीत ऋतु में 3.0 गुणा 0.6 गुणा 0.6मी0 के आकार की नली में 3 से 5 तहों में रखा जाता है तथा ऊपर से लकड़ी के तख्ते रखकर उसके ऊपर 15 से0मी0 मोटी मिट्टी की तह बिछाये। वायु के आवागमन के लिये सुराख अवश्य रखें। बर्फ पिघल जाने पर इन नालियों को मार्च में खोला जाता है और जड़ों के खेत में रोप दिया जाता है। फसल को मध्यवर्ती क्षेत्रों में सितम्बर-अक्तूबर में तथा निचले पर्वतीय क्षेत्रों में जुलाई-अगस्त में लगाया जाता है। बीज की मात्रा 4.0 से 4.5 कि.ग्रा. प्रति हेक्. आवश्यक है तथा इससे निकली जड़ 4-5 हेक्. लगाये जाने के लिये पर्याप्त होती है। चुनी गई जड़ों में 60 गुणा 30 से.मी. में लगाये।

अवांछनीय पौध निष्कासन –

शुरू में अलग किस्म के पौधे उखाड़ दें। उखाड़ते वे रोपते जड़ के आकार, रंग बनावट और रेशे का निरीक्षण करें। फूल आने पर अवांछनीय रोगी पौधे और खरपतवारों को निकाल दें।

पृथकीकरण-

फसल को चाईनीज बंद गोभी तथा सरसों से पृथक रखने के लिये 1000-1600 मी. की दूरी रखें।

तुड़ाई और गहाई-

फसल मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में मई और ऊंची पर्वतीय क्षेंत्र जून में तैयार हो जाती है। बन्द गोभी की भांति ही कटाई और गहराई की जाती है।
बीज प्राप्ति – 5.5-6.0 कि्. प्रति हेक्.
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