शतावरी की खेती कर अच्छा मुनाफा लें

 

शतावरी जिसमें मानव शरीर खास कर महिलाओं के लिए व्यापक श्रृंख्ला में लाभ होते हैं। सतावर जिसे शतावरी सतसुता इत्यादि नामों से जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम एस्येरेगस रेसिमोसा है। यह शक्ति वर्द्धक दूध वर्द्धक शारीरिक दर्द व पथरी निदान के रूप में होता है। वैज्ञानिकों ने इसमें ग्लूकोज की भरपूर मात्रा पाई है। इसकी खेती जल जमाव रहित बलुही दोमट मिट्टी में होती है। सतावर के बीच नर्सरी लगाकर पौधा तैयार कर 60 से 70 से.मी. की दूरी पर लगाया जाता है। फसल 20- 30 महीना का होता है। अतः इसके साथ कालमेघ अरहर आदि सह फसल लगायी जाती है। एक एकड़ में 25 टन तैयार सतावर प्राप्त होता है। लागत प्रति एकड़ 80 हजार से एक लाख रुपये मुनाफा प्राप्त होता है। यह एक औषधीय जड़ी बूटी है और इसकी 500 टन जड़ों का प्रयोग भारत में हर साल दवाइयों के उत्पादन में किया जाता है। शतावरी से तैयार दवाइयों का प्रयोग गैस्ट्रिक अल्सर अपच और तंत्रिका संबंधी विकारों के इलाज के लिए किया जाता है। यह एक झाड़ी वाला पौधा है जिसकी औसतन ऊंचाई 1.3 मीटर और इसकी जड़ें गुच्छे में होती है। इसके फूल शाखाओं में होते हैं और 3 से.मी लंबे होते हैं। इसके फूल सफेद रंग के और अच्छी सुगंध वाले होते हैं और 3 मि.ली. लंबे होते हैं। यह अफ्रीका, श्री लंका, चीन, भारत और हिमालय में पाई जाती है।

शतावरी की खेती कर अच्छा मुनाफा लें- satawar ki kheti

(satavar crop cultivation in Hindi)

मिट्टी-

यह मिट्टी की कई किस्मों जैसे अच्छे जल निकास वाली लाल दोमट से चिकनी मिट्टी काली मिट्टी से लैटेराइट मिट्टी में उगाई जाती है। यह चट्टानी मिट्टी और हल्की मिट्टी में भी उगाई जा सकती है मिट्टी की गहराई 20-30 से.मी. से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। यह रेतली दोमट से दरमियानी काली मिट्टी जो अच्छे जल निकास वाली हो में अच्छे परिणाम देती है। पौधे की वृद्धि के लिए मिट्टी 6-8 होना चाहिए।

किस्में –

सतवारी ऐसपरस रेसमस- यह किस्म अफ्रीका, चीन, श्री लंका, भारत और हिमालय में पायी जाती है। पौधे की ऊंचाई 1-3 मीटर होती है। फूल 3 से.मी लंबे होते और इसके फूल का बाहरी भाग 3 मि.ली लंबा होता है।

जमीन की तैयारी-

शतावरी की खेती के लिएए अच्छे जल निकास वाली रेतली दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है। मिट्टी को भुरभुरा बनाने के लिएए जमीन की अच्छे से जोताई करें और 15 से.मी की गहराई में गड्ढा खोदें। रोपाई तैयार बैडों पर की जाती है।

बिजाई- बिजाई का समय पौधों की रोपाई जून-जुलाई के महीने में की जाती है।
इसके विकास के अनुसार 4-5 से 1-2 मीटर फासले का प्रयोग करें और 20 से.मी गहराई में गड्ढा खोदें।
बीज की गहराई- जब पौधा 45 से.मी का हो जाये तब खेत में रोपाई की जाती है।
बीज की मात्रा- अधिक पैदावार के लिएए 400-600 ग्राम बीजों का प्रति एकड़ में प्रयोग करें।

बीज का उपचार-

फसल को मिट्टी से होने वाले कीटों और बीमारियों से बचाने के लिए बिजाई से पहले बीजों को गाय के मूत्र में 24 घंटे के लिए डाल कर उपचार करें। उपचार के बाद बीज नर्सरी बैड में बोये जाते हैं।

रोपण-

बिजाई से पहले मिट्टी का रासायनिक उपचार किया जाता है। अप्रैल के महीने में बीज बोये जाते हैं। शतावरी के बीजों को 30-40 से.मी की चैड़ाई वाले और आवश्यक लंबाई वाले बैडों पर बोया जाता है। बिजाई के बाद बैडों को नमी के लिए पतले कपड़े से ढक दिया जाता है। 8-10 दिनों में पौधों का अंकुरण शुरू हो जाता है। 45 से.मी ऊंचाई के होने पर पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं।
खेत की तैयारी के समय 80 क्विंटल प्रति एकड़ गली हुई खाद को मिट्टी में अच्छी तरह मिलायें। नाइट्रोजन 24 किलो यूरिया 52 किलो फासफोरस 32 किलो सिंगल सुपर फासफेट 52 किलो और पोटाश 40 किलो यम्यूरेट ऑफ पोटाश 66 किलो प्रति एकड़ में डालें।
मिट्टी से पैदा होने वाली बीमारियों से पौधे को बचाने के लिए जैविक कीट नाशी जैसे धतूरा, चित्रकमूल और गाय के मूत्र का प्रयोग करें।

खरपतवार नियंत्रण-

फसल के विकास के समय लगातार गोडाई की आवश्यकता होती है। खेत को नदीन मुक्त बनाने के लिए 6-8 हाथ से गोडाई की आवश्यकता होती है।
सिंचाई- पौधों को खेत में रोपण करने के बाद पहली सिंचाई तुरंत कर देनी चाहिए। इस फसल को ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं होती। इसलिए शुरूआत में 4-6 दिनों के फासले पर सिंचाई कर दें और फिर कुछ समय के बाद सप्ताह के फासले पर सिंचाई करें।

पौधे की देखभाल –

कुंगी यह बीमारी प्यूचीनिया एस्पारगी के कारण होती है। इस बीमारी से पत्तों पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप पत्ते सूख जाते हैं। इस बीमारी की रोकथाम के लिए बॉर्डीऑक्स घोल को 1 प्रतिशत डालें।

फसल की कटाई-

सतावर की फसल 24 से 40 माह में हो जाती है। इसके बाद हम जड़ों की खुदाई कर सकते है। किन सतावर की फसल के लिए सबसे सही समय अप्रैल से मई महीने को माना जाता है। क्योंकि जाड़े के दिनों के बाद जब पत्तियाँ झड़ जाती है। पौधों पर लगे हुए बीज भी पक जाते है। इस प्रक्रिया के बाद दवाइयां बनाने के लिए अच्छे से पके बीजों की आवश्यकता होती है।

कुटाई के बाद जड़ों को उबाल के इनका छिलका उतारा जाता है। छिल्का उतारने के बाद जड़ों को हवा में सुखाया जाता है। सूखी जड़ों का भंडारण और ज्यादा दूरी वाले स्थानों पर ले जाने के लिए हवा रहित बैग में रखें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *