रामदाना की खेती कैसे करें अच्छी आमदनी के लिये

महत्व एवं उपयोग- रामदाना की खेती दाना प्राप्त करने के लिए की जाती है। दाने के साथ ही फसल से जानवरों के लिए चारा भी प्राप्त होता है। दाने का प्रयोग लड्डूए पट्टी एवं लइया के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसका प्रयोग व्रत में किया जाता है।

रामदाना में प्रोटीन- 12.15 प्रतिशत, वसा,6.7 प्रतिशत फीनाल्स 45.0-0.68 प्रतिशत एवं एन्टीआक्सीडेन्ट डी०पी०पी० एच 22.0-.27.0 प्रतिशत पाया जाता है।

रामदाना की खेती कैसे करें – Ramdana cultivation in Hindi

बुवाई का समय –

इसकी खेती खरीफ एवं रवी दोनों सीजन में की जाती है। भारत में जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, तमिलनाडु, बिहार, गुजरात, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल एवं हिमाचल प्रदेश इत्यादि।

जलवायु –

अच्छी उपज के लिए गर्म एवं नम जलवायु की आवश्यकता होती है उन सभी स्थानों पर जहाँ वर्षा कम होती है वहाँ पर इसकी खेती की जा सकती है।

उन्नतिशील प्रजातियां-

जी०ए०.1 यह किस्म 110-115 दिन में पक कर तैयार होती है। इसके पौधे की ऊँचाई 200-.210 सेमी. बाली का रंग हल्का हरा एवं पीला 1000 दाने का वजन 0.8 ग्राम उपज 20-23 कुन्तल प्रति हे० है।

जी०ए०.2- यह किस्म 98-102 दिन में पक कर तैयार होती है। पौधों की ऊँचाई 180-190 सेमी. बाली का रंग लाल 1000 दाने का वजन 0.8 ग्राम उपज 23.25 कुन्तल प्रति हे० है।
अन्नपूर्णा- यह किस्म 105-110 दिन में पक कर तैयार होती है। इसके पौधों की ऊँचाई 200-205 सेमी बाली का रंग हरा एवं पीला होता है। उपज 20.22 कुन्तल प्रति हे० है।

भूमि की तैयारी-

खेत की एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 जुताई देशी हल से या हैरो से करनी चाहिए। जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत को भुरभुरा कर लेना चाहिए।

बीज की दर एवं उपचार-

एक किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करते है। थीरम 2.25 ग्राम से 1 किलोग्राम बीज का उपचार करना चाहिए।
बोने का समय- खरीफ में जून के अन्तिम सप्ताह से जुलाई के मध्य तक बुवाई कर देनी चाहिए।
रामदाना की बुवाई छिटकवा विधि य बीज को खेत में छिड़ककर जुताई करके पता चला देते हैं।

बुवाई-

लाइन से लाइन की दूरी 45 सेमी एवं पौधे की दूरी 15 सेमी रखते है। कूड़ की गहराई 2 इंच की दूरी पर रखते है।

खाद एवं उर्वरक –

60 किग्रा नत्रजन, 40 किग्रा० फास्फोरस एवं 20 किग्रा० पोटाश प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता पड़ती है। बुआई के समय नत्रजन की आधी मात्रा फास्फोरस एवं पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा देनी चाहिएए नत्रजन की आधी मात्रा का दो बार में छिड़काव करना चाहिए।
सिंचाई- खरीफ ऋतु में सिंचाई वर्षा के आधार पर ही की जाती है।
निराई.गुड़ाई- बीज बोने के 20-25 दिन बाद खेत की निराई.गुड़ाई की जाती है। फसल की दो बार निराई गुड़ाई अवश्य करनी चाहिए।
कटाई.मड़ाई- फसल पीले पड़ने के बाद कटाई-मड़ाई कर लेनी चाहिए।
उपज- 20-25 कुन्तल प्रति हेक्टेयर पैदावार होती है।

कीट –

बिहार हेयरी कैटर पिलर इसकी सूंडी पत्तियों का हानि पहुँचाती है। कभी 2 तने पर भी आक्रमण करती है। फालीडाल 15-20 किग्रा० प्रति हे० की दर से प्रयोग करने पर नियन्त्रण हो जाता है।

बीमारियां एवं रोकथाम-

ब्लास्ट व सड़न आदि बीमारियों का आक्रमण होता है। खड़ी फसल में डाइथेन जेड 78 पर 0.05 प्रतिशत बेविस्टीन के घोल का छिड़काव से भी रोग का प्रभाव कम हो जाता है।

Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *