पुदीना (मेंथा) की खेती कैसे करें

पुदीना को ही मेंथा या मिन्ट के नाम से जाना जाता है। जिसमें पुदीना की कई किस्में सम्मिलित हैं। जैसे- जापानी पुदीना या पिपर मिन्ट इस प्रकार मेंथा के समूह में कई किस्में सम्मिलित हैं। जिनमें से एक किस्म जापानी पुदीना भी है। जापानी पुदीना के उत्पादन के क्षेत्र में भारत दूसरे स्थान पर हए जबकि प्रथम स्थान चीन को प्राप्त है। पुदीना मैंथा एक क्रियाशील जड़ी बूटी है। पुदीना मैथा, को तेल, टूथ पेस्ट, माउथ वॉश और कई व्यंजनों में स्वाद के लिए प्रयोग में लाया जाता है। इसके पत्ते कई तरह की दवाइयां बनाने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। पुदीने से तैयार दवाइयों को नाक, गठिया, एनाड़ियां, पेट में गैस और सोजिश आदि के इलाज के लिए प्रयोग में लाया जाता है। इसे व्यापक श्रेणी की दवाइयां बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है।

पुदीना (मेंथा) की खेती कैसे करें ! Pudina (mentha) ki kheti kaise kare

मिट्टी-

इसके लिये समतल अच्छे जल निकास वाली भूमि जो बलुई दोमट हो एवं जिसमें जीवांशों की प्रचुरता हो और जिसका पी एच मान 6.0 से 7.5 हो जापानी पुदीना की खेती के लिए अच्छी होती है। भारी और चिकनी मिटटी में पौधों के विकास में कठिनाइयाँ होती है। दरमियाने से गहरी उपजाऊ मिट्टी, जिसमें पानी को सोखने की क्षमता ज्यादा हो में उगाया जाता है। इसको जल-जमाव वाली मिट्टी में भी उगाया जा सकता है।

किस्में –

मैस-1 इसमें मैन्थोल की मात्रा 70-80 प्रतिशत होती है। इसकी पैदावार कम से कम 80 क्विंटल प्रति एकड़ जड़ी-बूटियां के तौर पर और 50-60 कि.लो. ग्रा. प्रति एकड़ तेल निकल जाता है।

गोमती-

यह किस्म रंग में हल्के लाल रंग की होती है। इसकी पैदावार बाकी किस्मों की पैदावार से कम होती है। इसमें मैन्थोल की मात्रा 78.80ः होती है।

हिमालया-

यह किस्म कुंगी, झुलस सफेद धब्बे और पत्तों पर धब्बे रोग की रोधक है। इसमें मैन्थोल की मात्रा 78.80 प्रतिशत होती है। इसकी औसतन पैदावार 160 क्विंटल प्रति एकड़ जड़ी-बूटियां के तौर पर और 80-100 किलोग्राम प्रति एकड़ तेल के तौर पर होती है।

हाईब्रीड -77-

इसकी ऊंचाई 50-60 से.मी होती है। यह किस्म पत्तों के धब्बा रोग और कुंगी के रोधक होती है और यह जल्दी पकने वाली किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 80 क्विंटल प्रति एकड़ जड़ी-बूटियां के तौर पर और 50-60 किलोग्राम प्रति एकड़ तेल के तौर पर होती है।

हिवलिक –

यह किस्म उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों और उत्तरांचल में अच्छी वृद्धि करती है। इसमें मैन्थोल की मात्रा 65-70 प्रतिशत होती है। इसकी औसतन पैदावार 120 क्विंटल प्रति एकड़ जड़ी-बूटियां के तौर पर और 72 किलोग्राम प्रति एकड़ तेल के तौर पर होती है।

कौशल –

यह 90-100 दिनों में पक जाती है। यह किस्म कीट और बीमारियों की रोधक होती है। यह किस्म अर्द्ध शुष्क उप उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में अच्छी पैदावार देती है और उत्तर प्रदेश और पंजाब में भी अच्छी उगती है। है। इसकी औसतन पैदावार 120-132 क्विंटल प्रति एकड़ जड़ी-बूटियां के तौर पर और 70-80 किलोग्राम प्रति एकड़ तेल के तौर पर होती है।

जमीन की तैयारी-

पुदीने की बिजाई के लिए सुविधाजनक आकार के बैड तैयार करें। खेत की तैयारी के समय खेत की अच्छी तरह जोताई करें। जैविक खाद जैसे सड़ी गोबर की खाद 100-120 क्विंटल प्रति एकड़ रूड़ी की खाद डालें।

इसकी बिजाई के लिए दिसंबर-जनवरी का समय अनुकूल होता है।

पौधे के भागों की बिजाई 40 से.मी के फासले पर और पंक्तियों के बीच का फासला 60 से.मी होना चाहिए।

बीज की गहराई-

बीज को 2-3 से.मी की गहराई में बोयें।
बिजाई का ढंग-पौधे के जड़ वाले भाग को मुख्य खेत में बोया जाता हैद्य
बीज की मात्रा- प्रजनन क्रिया जड़ के भाग या टहनियों द्वारा की जाती है अच्छी पैदावार के लिए 160 किलो भागों को प्रति एकड़ में प्रयोग करें। जड़ें पिछले पौधों से दिसंबर और जनवरी के महीने में प्राप्त की जाती है।

बीज का उपचार-

फसल को जड़ गलने से बचाने के लिए बिजाई से पहले बीजे जाने वाले उपचार कप्तान 0.25 प्रतिशत या आगालोल 0.3 प्रतिशत या बैनलेट 0.1 से 2.3 मिनट के लिए किया जाना चाहिए।
रोपण- बिजाई से पहले पौधे की बारीक जड़ 10-14 से.मी काटें। पुदीने की जड़ को आकार और जड़ के हिसाब से बोयें। रोपाई के बाद खरपतवार की रोकथाम के लिए सिनबार 400 ग्राम की प्रति एकड़ में स्प्रे करें। खरपतवार से बचाव के लिए एट्राजीन और सिमाजीन 400 ग्राम पैंडीमैथालीन 800 मि.ली और ऑक्सीफ्लूरोफेन 200 ग्राम की बूटीनाशक स्प्रे प्रति एकड़ में करें।
खाद- खेत की तैयारी के समय सडी गोबर की खाद 80-120 क्विंटल प्रति एकड़ में डालें और अच्छी तरह मिलायें। नाइट्रोजन 58 किलो यूरिया 130 किलो फासफोरस 32-40 किलो सुपर फासफेट 80-100 किलो पोटाशियम 20 किलो प्रति एकड़ में डालें।

खरपतवार नियंत्रण-

खरपतवार की रोकथाम के लिए सिनबार 400 ग्राम प्रति एकड़ में प्रयोग करें। खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए जैविक मल्च के साथ ऑक्सीफलोरफिन 200 ग्राम या पैंडीमैथालीन बूटीनाशक 800 मि.ली को प्रति एकड़ में प्रयोग करें। यदि खरपतवार ज्यादा हो तो डालापोन 1.6 किलोग्राम प्रति एकड़ या ग्रामाक्जोन 1 लीटर और डयूरॉन 800 ग्राम या टेरबेसिल 800 ग्राम की प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

सिंचाई-

गर्मियों में मॉनसून से पहले जलवायु और मिट्टी के आधार पर 6.9 सिंचाइयां जरूर की जानी चाहिए। मॉनसून के बाद 3 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई सितंबर महीने में दूसरी अक्तूबर में और तीसरी नवंबर महीने में की जानी चाहिए। सर्दियों में ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती लेकिन यदि सर्दियों में बारिश ना पड़े तो एक सिंचाई जरूर देनी चाहिए।

हानिकारक कीट और रोकथाम-

बालों वाली सुंडी यह डिकारसिया ओबलीकुआ के कारण होती है। यह हरे पत्तों को खाती है और पूरे पौधे को नष्ट कर देती है।
इस कीट की रोकथाम के लिए मैलाथियॉन या थायोडन 1.7 मि.ली को प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

कुतरा सुंडी- कुतरा सुंडी –

यह एगरोटिस फलेमैटरा के कारण होती है। यह बसंत ऋतु के दौरान पौधे की गर्दन को नुकसान पहुंचाती है।
इस कीट की रोकथाम के लिए रोपाई से पहले फॉरेट 10 ग्राम से मिट्टी का उपचार करें।

लाल भुंडी-

यह आउलोकोफोरा फोइवीकॉलिस के कारण होती है। यह ताजे हरे पत्तों और कलियों को खाती है।
इस कीट की रोकथाम के लिए थायोडैन 1 मि.ली को 1 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
पुदीने की पत्ता लपेट सुंडी-यह सिंगमिया अबरूपतालिस के कारण होती है। यह कीट पत्तों को लपेट देती है और अगस्त- सितंबर के महीने में अंदर से पत्तों को खाती है।
इस कीट से बचाव के लिए थायोडन 1.5 मि.ली को 1 लीटर पानी में मिलाकर सप्ताह के अंतराल में 2-3 बार छिड़काव करें।

तना गलन- बीमारियां और रोकथाम

तना गलन – यह मैकरोफोमिना फेजिओली के कारण होती है। यह पौधे के निचले भागों में हमला करती है जिससे पौधे पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं जो बाद में पौधे को खोखला कर देता है।
इस कीट की रोकथाम के लिए कप्तान 0.25 प्रतिशत या आगालोल घोल 0.3 या बैनलेट 0.1 प्रतिशत में 2.3 मिनट के लिए तने को रखें।

फुजारियम सूखा- यह फुजारियम ऑग्जीस्पोरियम के कारण होती है। इससे पत्ते पीले मुड़े हुए और सूख जाते हैं।
इस कीट की रोकथाम के लिए बवास्टिनए बैनलेट और टॉपसिन दें।
पत्ते का झुलस रोग-यह ऑल्टरनेरिया के कारण होती है। यह गर्मियों के मौसम में पत्तों को नुकसान पहुंचाती है।
इस बीमारी की रोकथाम के लिए कॉपर फंगसनाशी का प्रयोग करें।

फसल की कटाई-

पौधे 100-120 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं। जब निचले पत्ते पीले रंग के होने शुरू हो जायें तब कटाई करें। 80 दिनों के अंतराल पर करें। ताजी पत्तियों को उत्पाद बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है।

कटाई के बाद-

पुदीने के तेल को पैक करके बड़े स्टील के या एल्यूमीनियम के बक्सों में रखा जाता है।

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