पपीते की खेती कर अच्छी आमदनी लें

पपीता जिसे पंजा के रूप में भी जाना जाता है इसमे विटामिन सी में समृद्ध एक स्वादिष्ट फल है। यह एक उष्णकटिबंधीय फल है और यह अत्यधिक मूल्यवान औषधीय घटक है। पपीते में कई महत्वपूर्ण पाचक एन्ज़ाइम तत्व मौजूद रहते है। मूल रूप इसकी खेती दुनिया भर में व्यापक रूप से की जाती है। वैश्विक स्तर पर भारत, ब्राजील, मेक्सिको, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, पेरू, चीन, थाईलैंड और फिलीपींस के बाद पपीता उत्पादन में दुनिया का नेतृत्व करता है। भारत देश में पपीता गृह वाटिका में उगाना प्रचलित है। लेकिन अब इसकी खेती व्यवसायक रूप में की जाती है. इसे एक बार लगा देने पर दो फसल ली जाती है इसकी कुल आयु पौने तीन साल होती है. प्रति हेक्टेयर पपीते का उत्पादन 40 से 50 टन हो जाता है

पपीते की खेती कर अच्छी आमदनी लें – Advance Technique of Papaya cultivation in Hindi

जलवायु और भूमि

पपीते की खेती सबसे अच्छा उष्णकटिबंधीय फसल होने के नाते पपीता फसलों को उच्च स्तर की आर्द्रता और तापमान की आवश्यकता होती है। यह ठंड में संवेदनशील है और भारी बारिश नुकसान पहुंचा सकती है। यह उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी बढ़ सकता है। तलहटी के पास के क्षेत्र भारत में पपीता की खेती के लिए एकदम सही जगह पाए गए हैं। यह समुद्री स्तर पर और समुद्र तल से 600 मीटर की ऊंचाई पर अच्छी तरह से बढ़ सकता है। 600 मीटर से ऊपर फल गुणवत्ता में कमी आती है। यद्यपि फसल विकास के लिए आर्द्रता के उच्च स्तर का होनी चाहिए। लेकिन इसे पकाने के लिए गर्म और शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। पपीते की खेती करने के लिए उपजाऊ जमींन की ज़रुरत होती है. जमींन का समतल होना जरूरी है. ताकि पपीते के पौधों में पानी की अत्याधिक रुकावट न हो. पौधों में पानी की रूकावट होने पर पपीते की खेती मे पानी भरे रहने से कॉलर रॉट नामक बीमारी लग जाती है और भारी नुकसान का समान करना पड़ सकता है।

पपीते की पौध की रोपाई जून-

जुलाई का महीना अच्छा माना जाता है। परंतु जिस जगह में सिंचाई की उचित व्यवस्था हो वह सितम्बर से अक्टूबर तथा फरवरी से मार्च लेकर पपीते के पौधे लगाये जा सकते हैं।

भूमि की तैयारी

पपीते की खेती विभिन्न प्रकार के मिट्टी में उगाया जा सकता है। हालांकि रेतीली तथा लोम मिट्टी पपीते के खेती के लिये उचित माना जाता है। पपीते की खेती को जुताई कर कर अच्छे से समतल बनाना चाहिये। जिससे भूमि को हल्का ढाल बनाने से उत्तम रहता है। 2 गुणा 2 मी. लम्बा तथा चौड़ा, गहरा गढ्ढा बनाना चाहिए। इसमे 20 किलो गोबर की खाद, 600 ग्राम सुपर फास्फेट एवं 300 ग्राम म्यूनरेट आफ पोटाश को मिट्टी में मिलाकर पौधा लगाने कर 10 दिन पूर्व भर देना चाहिए।

पी.एच आवश्यकता

पपीते की खेती के लिए तटस्थ मिट्टी के पास एक तटस्थ का उपयोग किया जा सकता है। पी.एच 5.5 और 7.5 के बीच हो सकता है।

पानी पपीता संयंत्र

पपीता के लिए पानी की आवश्यकता प्रकाश, तापमान, वर्षा, हवा, मिट्टी के प्रकार आदि जैसे क्षेत्र के पर्यावरणीय कारकों पर निर्भर करती है। पुराने पेड़ों की तुलना में एक युवा पपीता संयंत्र को अधिक नमी की आवश्यकता होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि पुराने पेड़ों में धीमी वृद्धि हुई है। इसलिए रोपण सप्ताह में एक या दो बार सिंचाई करना चाहिए। जबकि फल के पेड़ों को हर 15 दिनों में एक बार सिंचाई की आवश्यकता होती है। पुराने पेड़ पर्याप्त पानी की जरूरत है। यही कारण है कि पपीता वृक्षारोपण में ड्रिप सिंचाई एक अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए। सर्दियों के दौरानए पपीता को 10-12 दिनों के अंतराल पर सिंचित किया जाना चाहिएए जबकि गर्मियों में बारिश शुरू होने तक सप्ताह में एक बार पानी की आवश्यकता होती है।

प्रजातियाँ –

उन्नतशील प्रजातियाँ जैसे की पूसा डेलीसस 1-15, पूसा मैजिस्टी 22-3, पूसा जायंट 1-45-वी, पूसा ड्वार्फ1-45-डी, पूसा नन्हा या म्युटेंट डुवार्फ, सी.ओ.-1, सी.ओ.-2, सी.ओ.-3, सी.ओ.-4, कुर्ग हनी, रेड लेडी 786, वाशिंगटन, प्रजातियाँ उपलब्ध है।

बीज मात्रा

एक हेक्टेयर जमीन के लिए लगभग 600 ग्राम से लेकर एक किलो बीज की आवश्यकता पड़ती है. सर्वप्रथम पपीते के पौधें बीज से तैयार किये जाते है. एक हेक्टेयर जमीन में प्रति गड्ढ़े दो पौधें लगाने पर लगभग पांच हज़ार पौध संख्या लगेगी.

पौधशाला

पपीते की खेती में पौध तैयार करने के लिए पहले पौधे 3 मीटर लम्बी 1 मीटर चौड़ी तथा 10 सेमी. ऊँची क्यारी में या गमले या पालीथीन बैग में पौध तैयार करते है. बीज क़ी बुवाई से पहले क्यारी को फार्मेलड़ीहाईड के घोल का छिड़काव करके उपचारित करते है. इसके बाद बीज 1 सेमी. गहरे तथा 10 सेमी. क़ी दूरी पर बीज बोते हैं इन पौधों को रोपाई हेतु 60 दिन बाद जब 15-25 सेमी. ऊँचे हो जाये तब इनकी पौध की रोपाई करनी चाहिए।

नर्सरी में रोपा तैयार करना

इस विधि द्वारा बीज पहले भूमि की सतह से 15 से 20 सेमी. उंची क्यांरियों में कतार से कतार की दूरी 10 सेमी, तथा बीज की दूरी 3 से 4 सेमी. रखते हुए लगाते है, बीज को 1 से 3 सेमी. से अधिक गहराई पर नही बोना चाहिए, जब पौधे करीब 20 से 25 सेमी. उंचे हो तब प्रति गढ्ढा 2 पौधे लगाना चाहिए.

पौधे पालीथिन की थैली में तैयार करने की विधि

20 सेमी. चौडे मुंह वाली, 25 सेमी. लम्बी 5 तथा 150 सेमी. छेद वाले पालीथिन थैलियां लेवें इन थैलियों में गोबर की खाद, मिट्टी एवं रेत का समिश्रण करना चाहिए, थैली का उपरी 1 सेमी. भाग नही भरना चाहिए, प्रति थैली 2 से 3 बीज होना चाहिए, मिट्टी में हमेशा पर्याप्त नमी रखना चाहिए, जब पौधे 15 से 20 सेमी. उंचे हो जाये तब थैलियों के नीचे से धारदार ब्ले द्वारा सावधानी पूर्वक काट कर पहले तैयार किये गये गढ्ढों में लगाना चाहिए.

पोषण प्रबंधन

पपीता एक शीघ्र बढने एवं फल देने वाला पौधा है जिसके कारण आधिक तत्व क़ी आवश्यकता पड़ती है अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 250 ग्राम नत्रजन 150 ग्राम फास्फोरस तथा 250 ग्राम पोटाश प्रति पौधा के हिसाब से प्रति वर्ष देना चाहिए यह मात्रा पौधे के चारों ओर 2 से 4 बार में थोड़े-थोड़े समय के अन्तराल पर देनी चाहिए.

जल प्रबंधन

पपीता के लिए सिचाई का उचित प्रवंन्ध होना आवश्यक है गर्मियों में 6 से 7 दिन के अन्तराल पर तथा सर्दियों में 10-12 दिन के अन्तराल पर सिचाई करनी चाहिए वर्षा ऋतू में पानी न बरसने पर आवश्यकता अनुसार सिचाई करनी चाहिए सिचाई का पानी पौधे के सीधे संपर्क में नहीं आना चाहिए.
गर्मी के में 10 दिन व सर्दी के मौसम में 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए.पपीते की पौध को पाले से बचा कर रखना चाहिए. अगर पाला पड़ने की आशंका हो तो तो शाम के समय धुँआ करने के साथ हल्की सिंचाई भी कर देनी चाहिए.

पौधों की बीमारियां और प्रबंधन

पपीता फसल को प्रभावित करने वाली मुख्य बीमारियां एंथ्रेकनोस पाउडर फफूंदी स्टेम रोट और डंपिंग ऑफ हैं। जड़ों के चारों ओर पानी लॉगिंग रोट्स के मुख्य कारण है। वेटेबल सल्फर कार्बेन्डाजीम और मैनकोजेब इन बीमारियों को नियंत्रित करने का प्रमुख दवा है।

खरपतवार प्रबंधन

लगातार सिचाई करते रहने से खेत के गढ़ढ़ो क़ी मिट्टी बहुत कड़ी हो जाती है. जिससे पौधे क़ी वृद्धि पर कुप्रभाव पड़ता है अतः हर 2-3 सिचाई के बाद थालो क़ी हल्की निराई गुड़ाई करनी चाहिए, जिससे भूमि में हवा एवं पानी का अच्छा संचार बना रहे।

कीट प्रबंधन

पपीते के पौधों को कीटो से कम नुकसान पहुचता है फिर भी कुछ कीड़े लगते है जैसे माहू, रेड स्पाईडर माईट, निमेटोड आदि है. नियंत्रण के लिए डाईमेथोएट 30 ई. सी.1.5 मिली लीटर या फास्फोमिडान 0.5 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से माहू आदि का नियंत्रण होता है।

फसल कटाई

पौधे लगाने के ठीक 10 से 12 महीने के बाद फल तोड़ने लायक हो जाते है. कुछ ही दिनों में फलों का रंग हरे रंग से बदलकर पीला रंग का होने लगता है तथा फलों पर नाखुन लगने से दूध की जगह पानी तथा तरल निकलता हो तो समझना चाहिए कि फल पक गया होगा. इसके बाद फलों को तोड़ लेना चाहिये।

पैकिंग

फलो को सुरक्षित तोड़ने के बाद फलो पर कागज या अख़बार आदि से लपेट कर अलग अलग प्रति फल को किसी लकड़ी या गत्ते के बाक्स में मुलायम कागज क़ी कतरन आदि को बिछा कर फल रखने चाहिए और बाक्स को बन्द करके बाजार तक भेजना चाहिए ताकि फल ख़राब न हो और अच्छे भाव बाजार में मिल सके.

पैदावार

पैदावार मिट्टी किस्म, जलवायु और उचित देखभाल पर निर्भर करती है समुचित व्यवस्था पर प्रति पेड़ एक मौसम में औसत उपज में फल 35-50 किग्रा प्राप्त होते है तथा 25-30 टन प्रति हेक्टर उपज प्राप्त होती है

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