राजमा की खेती करें अच्छी आमदनी के लिये

राजमा की खेती भारतवर्ष के कई राज्यों में किया जाता है। राजमा दोलों में से दलहनी फसल है। भारतवर्ष में राजमा का उत्पादन पहाड़ी क्षेत्रों के ठंडी जलवायु में होता है। जम्मू, कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश जैसे कई पर्वतीय और महाराष्ट्र के कुछ इलाको में राजमा की खेती के लिये जाना जाता है। पहाड़ी क्षेत्र एवं कम तापक्रम के क्षेत्रों में उगाया जा सकता है। रबी मौसम में मैदानी भागों में राजमा की खेती उपयुक्त रहता है।

राजमा की खेती कैसे करें – organic kidney beans farming tips in Hindi

राजमा की किस्में / Rajma ki kisme

एच यू आर 136 – यह किस्म को 105-107 दिन में पककर तैयार हो जाती है। सिंचिंत क्षेत्र तथा अच्छे फसल प्रबंधन में यह किस्म 14-16 कि्ंट. प्रति हेक्. की उपज देती है। इसके दानों का रंग गहरा लाल होता है तथा 100 दानो का वनज 44 से 46 ग्राम होता है।

राजमा की कीमत – Rajma ki kheti aur kimat

अगर बात की जाए राजमा की कीमत की तो यह बाजार में 100 से 160 रूपये तक होती है।

अगर बात की जाए राजमा चित्रा की तो इसकी कीमत 7,600 से लेकर 10,400 प्रति क्यन्टिल होती है।

पीडीआर -14 (उदय) –

यह मैदानी भागों में उगाने के लिये एक अच्छी किस्म है। इसकें पौधे झाड़ीनुमा होता है। फली का रंग हरा तथा फूलों का रंग सफेद होता हैं पौधों की उंचाई 40 से 50 से.मी. होती है। यह किस्म 115-120 दिन में पकती है। इसकी औसत उपज 12-15 क्टि. प्रति हेक्. तक हो जाती है। लेकिन सिंचित क्षेत्रो तथा अच्छे फसल प्रबंध में इसकी पैदावार 20-22 क्टि. प्रति हेक्. तक होती है। इसकी दानों का रंग चित्तीदार होता है एवं 100 दोनों का भार 38 से 40 ग्राम होता है।

वी एल 63 –

यह किस्म 110 -115 दिन में पककर तैयार हो जाती है। सिंचित क्षेत्र तथा अच्छे फसल प्रबंधन से यह किस्म 20 से 22 कि्ंट प्रति हेक्. उपज देती है। इसके दानों का रंग बादामी होता है तथा 100 दानों का वनज 35 से 38 ग्राम होता है।

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आर.एस.जे. 178 (2005) –

इसके पकने की अवधि 115-120 दिन है। यह 15-20 क्टि. की उपज देती है। समान्यतः एवं स्वर्ण पीत शिरा तथा तना गलन एवं शुष्क जड़ गलन रोगों हेतु प्रतिरोधी क्षमता रखती है। इसके दाने सुडौल गहरे लाल भूरे रंग के आकर्षक एवं चमकीले होते है। इसके 100 दानों का वनज 40-45 ग्राम होता है। इसमे फली छेदक कीटों का प्रकोप नगण्य होता है।

वी एल 63 –

यह किस्म 110-115 दिन में पककर तैयार हो जाती है। सिंचित क्षेत्र तथा अच्छे फसल प्रबंध में यह किस्म 20 से 22 क्टि. प्रति हेक्. उपज देती है। इसके दानों का रंग बदामी होता है। तथा 100 दानों का वनज 36 से 38 ग्रा. तक होता है।

भूमि की तैयारी –

राजमा की खेती सभी प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है। लेकिन मध्यम दोमट मिट्टी इसके लिये अधिक उपयुक्त होती है। अच्छे अंकुरण के लिये खेत की 3-4 जुताई उपयुक्त होता है ताकि भूमि भुरभूरी हो जाये । इसके बाद पाटा लगाकर खेत समतल कर ले। पानी के निकास के लिये समुचित प्रबंध करना चाहिए।

राजमा के बीज की दर एवं बीज उचार –

राजमा का बीज 100-120 कि.ग्रा. प्रति हेक्. की दर डालना चाहिए। प्रति कि.ग्रा. बीज को 1-2 ग्रा. कार्बेडाजिम या 3 ग्रा. थाइरम से बुवाई से पूर्व उपचारित करना चाहिए।

बुवाई का समय –

राजमा की फसल पर तापक्रम के उतार चढ़ाव का हानिकारक प्रभाव पड़ता है। फूलने के समय ठंड एवं पाले से बचाव करना चाहिए। अतः अक्टूबर मध्य से अक्टूबर के अंतिम सप्ताह तक राजमा की बुवाई आवश्यक है।

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बुवाई की विधि-

अच्छे अंकुरण के लिये बुवाई के समय भूमि में पर्याप्त नमी रहनी चाहिए। कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 से.मी. रखे प्रति हेक्. 3.3 लाख पौधे रखें।

खाद एवं उर्वरक –

ज्यादा उपज के लिये सड़ी हुई गोबर की खाद 7-8 टन प्रति हेक्. बुवाई से 2-3 सप्ताह भूमि में मिला दे। फसल में 100-120 कि.ग्रा. नत्रजन एवं 45-60 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हेक्. की दर से प्रयोग करें। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई के समय बीज के नीचे कतारों से कतारों में डाले। नत्रजन की शेष मात्रा बुवाई के 25-35 दिन बाद पहली सिंचाई के उपरांत दे सकते है।

राजमा का पौधा की सिचांई –

राजमा फसल के बुवाई के बाद 25 दिन के अंतर से चार सिंचाई की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई बुवाई के 25 दिन के बाद जरूर करें। फसल में गहरी सिंचाई कभी भी न करें। क्योंकि फूल एवं फलियों के दाने बनते समय मृदा में नमी हो जाने के कारण उपज कम प्राप्त होता है।

खरपतवार नियंत्रण –

सिंचाई के पहले 30-35 दिन की फसल में निराई-गुड़ाई कर खरपतवार निकालें। निराई-गुड़ाई करते समय पौधें के तने पर हल्की मिट्टी चढा दें। जिससे फली युक्त पौधो को सहारा मिल सके। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण हेतु पेंडीमिथेलिन 1 कि.ग्रा., मेटोलाक्लोर 1 कि.ग्रा. या एलाक्लोर दो कि.ग्रा प्रति हेक्. अंकुरण पूर्व छिड़काव करें।

पाले से फसल का बचाव –

दिसम्बर से जनवरी में पाले से फसल को बचाने के लिये फसल पर 0.1 प्रतिशत एक मिली ली. प्रति ली. पानी गंधक के तेजाब का छिड़काव करें। संभावित पाला पड़ने की अवधि में इसे दोहराये।

कीट नियंत्रण –

सफेद मक्खी, मोयला एवं तेला की रोकथाम हेतु डाईमिथोएट 30 ई.सी. 875 मिली. ली या मानोक्रोटोफॉस 36 एस-एल. एक ली. पानी में मिलाकर प्रति हेक् छिड़के। राजमा फली छेदक कीट की रोकथाम हेतु मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. एक ली. प्रति हेक्. की 600 ली.पानी में छिड़कें।

रोग नियंत्रण –

राजमा की फसल में विषाणु रोग का हानिकारक प्रभाव देखा गया है। इस रोग को फैलाने वाली मक्खी पर नियंत्रण रखने से रोग स्वतः ही नियंत्रण में रहता है। अतः 3-4 सप्ताह की फसल में सफेद मक्खी की रोकथाम हेतु ऊपर बाताय गया उपाय करें।

जड़ गलन एवं कालर रॉट –

यह स्कलेरोशियम नामक फंफूद के कारण होता है। इसके नियंत्रण हेतु बुवाई से पूर्व कार्बेडाजिम 1-2 ग्रा. या थाइरम 3 ग्रा. दवा प्रति हेक्. कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें।

सफेद तना गलन –

यह स्कलेरोशियम नामक फंफूद के कारण होता है। इसके नियंत्रण हेतु बीजोपचार कर बुवाई करने के अलावा फूल आने के समय कार्बेडाजिम 1 ग्रा. प्रति ली. पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें। रोग ग्रस्त खेत में 2-3 वर्ष तक राजमा, सरसों, मटर धनियां, चना तथा बरसीम न बोयें।

कटाई तथा गहाई –

फसल पकने के बाद कटाई में देरी होने से इसकी फलियां चटककर दाने जमीन पर गिर जाते है। अत : जैसे ही फलियों का रंग पीली पड़ जाये तथा दाने सख्त हो जाये तभी फसल की कटाई कर लेनी चाहिए। कटाई के बाद फसल को खलिहान में 15 से 20 दिन तक सुखाकर बैंलों से गहाई कर लें।

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