जई की खेती मुनाफे का सौदा है, कैसे करे इसे जाने!

जई की खेती तथा इसे अंग्रेजी भाषा में ओट्स भी कहते है अनाज और चारे की फसल है। जई की खेती उप उष्ण कटबंधी क्षेत्रों में उगाई जाती है भारत में जई की खेती अधिकतर सिंचित दशा में की जाती है। इसकी पैदावार ज्यादा ऊंचाई वाले तटी क्षेत्रों में भी बढ़िया होती है। किंतु मध्य अक्टूबर तक भूमि पर्याप्त नमीं होने पर इसे असिंचित दशा में भी पैदा किया जा सकता है। यह सेहत संबंधी फायदों के कारण काफी अच्छा माना जाता है। इसमें प्रोटीन और रेशे की भरपूर मात्रा होती है। यह वजन घटाने, ब्लड प्रैशर को स्थिर करने मदद करता है।

जई की खेती मुनाफे का सौदा है – oats farming tips in Hindi

मिट्टी-

इसकी खेती सभी प्रकार के भूमि में की जा सकती है। चिकनी रेतली मिट्टी, जिस में जैविक तत्व हों जई की खेती के लिए उचित मानी जाती है। जई की खेती के लिए 5-6 से 6-7 पी एच वाली मिट्टी बढ़िया होती है।

किस्में –

जेई-1, जेई-2, जई- 03-91, कैट, ओ.एस-6 जे.एच.ओ 822 और 851 इत्यादि भी है।
ओल-9 इसके दानों की औसतन पैदावार 7 क्विंटल और चारे के तौर पर औसतन पैदावार 230 क्विंटल प्रति एकड़ है।
वेस्टन -11 इस किस्म के पौधों का कद 150 से.मी होता है। इसके दाने लंबे और सुनहरी रंग के जैसे होते हैं।
केन्ट- यह भारत के सभी इलाकों में उगाने योग्य किस्म है। इसके पौधे का औसतन कद 75-80 से.मी होता है। यह किस्म कुंगी भुरड़ और झुलस रोग की प्रतिरोधक है। इसकी चारे के तौर पर औसतन पैदावार 210 कि्. प्रति एकड़ है।
ओल-10 इसके बीज दरमियाने आकार के होते हैं। इसकी चारे के तौर पर औसतन पैदावार 270 क्विंटल प्रति एकड़ है।
ओल-11 इसकी औसतन पैदावार 245 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसके पौधे-पत्तेदार लंबे होते हैं और पत्ते चौड़े होते हैं।

जमीन की तैयारी-

चारे के लिये बोई गयी फसल में खरपतवार निकालना आवश्यक है। अच्छी तरह जोताई करें तथा अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए 6-8 बार जोताई करें। जई की फसल जौं और गेहूं की फसल के मुकाबले ज्यादा पी एच वाली मिट्टी को सहन कर सकती हैं।

बिजाई-

बिजाई का समय अक्तूबर के दूसरे से आखिरी सप्ताह का समय बिजाई के लिए उचित माना जाता है। इसे पंक्तियों में 25-30 से.मी का फासला रखें।
बीज की गहराई- बीज की गहराई 3-4 से.मी होनी चाहिए।

बिजाई का ढंग-

बीज की गहराई जीरो टिल्लर मशीन या बिजाई वाली मशीन से की जा सकती है।

बीज की मात्रा-

25-30 किलो बीज प्रति एकड़ का प्रयोग करें।

बीज का उपचार-

बीजों को बिजाई से पहले कप्तान या थीरम 3 ग्राम से प्रति किलो बीज से उपचार करें। इससे बीजों के फफूंदी वाली बीमारियों और बैक्टीरिया विषाणु से बचाया जा सकता है।

खाद-

जई अच्छी पैदावार के लिये 10 टन खेत में सड़ी हुई गोबर की खाद डालें। नत्रजन 80 किलो 66 किलो यूरिया और फासफोरस तथा 20 किलो पोटाश देना चाहिए। नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फासफोरस की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें। बाकी बची नाइट्रोजनए बिजाई के 30-40 दिन के बाद डालें।

खरपतवार नियंत्रण-

यदि पौधे सही ढंग से खड़े हों तो खरपतवार की रोकथाम की जरूरत नहीं होती है। जई की फसल में खरपतवार कम पाए जाते हैं। खरपतवार को निकालने के लिए कही से गोडाई करें।

सिंचाई-

बारानी क्षेत्रों की फसल के तौर पर उगाई जाती है पर यदि इसे सिंचाई वाले क्षेत्रों में उगाया जाये तो बिजाई के 26-28 दिनों के फासले पर दो बार सिंचाई करें।

हानिकारक कीट और रोकथाम –

चेपा यह जई की फसल का मुख्य कीट है। यह पौधे के सैलों का रस चूस लेता है। इससे पत्ते मुड़ जाते हैं और इन पर धब्बे पड़ जाते हैं। इन के हमले को रोकने के लिए डाइमैथोएट 30 ई सी 0.03 प्रतिशत का प्रयोग करें। स्प्रे करने के 10-15 दिनों के बाद जई की फसल को चारे के तौर पर पशुओं को ना डालें।

बीमारियां और रोकथाम-

पत्तों पर काले धब्बे यह फंगस भूरे रंग से काले रंग की हो जाती है। शुरूआती बीमारी पत्तों के शिखरों से आती है और दूसरी बार यह बीमारी हवा द्वारा सुराखों में फैलती है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए बीज का उपचार करना जरूरी है।

जड़ गलन-

यह जड़ों के विषाणुओं के कारण होता है बीजों को अच्छी तरह उपचार करने से इस बीमारी को रोका जा सकता है।
फसल की कटाई- बिजाई के 5-6 महीने बाद जई पूरी तरह पककर कटाई के लिए तैयार हो जाती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *