यम, जिमीकंद (सूरन) की खेती कैसे करे जिससे हो ज्यादा मुनाफा

याम, जमीकंद, को पश्चिम अफ्रीका में सबसे महत्वपूर्ण खाद्य प्रधान माना जाता है जहां दुनिया भर में उत्पादित कुल यम का 70 प्रतिशत हिस्सा आता है।कृषि वैज्ञानिकों ने लगातार खोज के बाद इस की कई उन्नतिशील प्रजातियां भी विकसित की हैं। अब इसे बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रूप से भी उगाया जाने लगा है। देशी प्रजातियों में कड़वापन व चरपरापन ज्यादा पाया जाता हैए जबकि उन्नत प्रजातियों में चरपरापन व कड़वापन न के बराबर होता है। बाजार में जमींकंद की भारी मांग को देखते हुए इस की व्यावसायिक खेती बेहद लाभदायक साबित हो रही है। जमींकंद की खेती के लिए नमगरम व ठंडेसूखे दोनों मौसमों की जरूरत पड़ती है। बीजों को अंकुरण के लिए ऊंचे तापमान की जरूरत होती है। जबकि पौधों की बढ़वार के लिए समान रूप से अच्छी बारिश जरूरी होती है। स्थानीय रूप से बेचने के अलावा याम को संयुक्त राज्य अमेरिका, नीदरलैंड, फ्रांस, जर्मनी और यहां तक कि जापान में भी निर्यात किया जा सकता है। जबकि नाइजीरिया दुनिया में यम का प्रमुख उत्पादक है।

जिमीकंद (सूरन) की खेती

भूमि की तैयारी – yam ki kheti

जमींकंद को टुकडों में काट कर बुवाई की जाती है। यदि कंद छोटा है तो पूरा रोपण किया जा सकता है। यदि बड़ा है तो इसे 60 ग्रा. से 100 ग्राम के आकार में टुकड़ों में काटना चाहिए तथा जमींकंद की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी जाती है। क्योंकि इस तरह की मिट्टी में कंदों की बढ़ोतरी तेजी से होती है। यह ध्यान रखना चाहिए कि चिकनी व रेतीली जमीन में जमींकंद की फसल न ली जाये क्योंकि इस तरह की मिट्टी में कंदों का विकास रुक जाता है। जमीकंद की बुवाई से पहले खेत की कल्टीवेटर या रोटावेटर से जुताई करे। बाद में 20 टन प्रति हेक् की दर से गोबर की सड़ी हुई खाद का मिश्रण कर के खेत में बिखेर दें।

किस्में – Varieties of Oal in Hindi

गजेन्द्र 1, संतरा गंची, कोववयूर

कोववयूर –

इस किस्में की बुवाई कर के की औसत उपज 100-150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन ले सकते है।

संतरा गाची –

  • इस प्रजाति के पौधों की बढ़वार तेजी से होती है। इस की औसत उपज 60-.75 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पान लिया जा सकता है।
  • गजेंद्र 1- यह जमींकंद की सर्वाधिक उत्पादन देती है । इससे जीभ व गले में जलन नहीं होती है।
  • इसका बाजार भाव अन्य प्रजातियों के मुकाबले ज्यादा होता है। इस प्रजाति के गूदे का रंग हल्का गुलाबी होता है। इस के खाली खेत में गेहूं की बोआई समय से की जा सकती है। इसका औसत उपज 300 से 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से ले सकते है।
  • इस किस्मों की प्रजाजियां अधिकतर बुवाई का समय उत्तर भारत में फरवरी – मार्च के दौरान व दक्षिण भारत में मई में होता है।

बोआई विधि –

 

जमींकंद की रोपण बारिश की शुरुआत में लगाए जाते हैं। .अंकुरित जमींकंद के लिय लिए रोपण दूरी और गहराई का उपयोग किया जाता है। रोपण करते समय सेट को उन्मुख किया जाना चाहिए ताकि अंकुरित हो जाएं। बुवाई के लिए खेत में 3.3 फुट की दूरी पर 30 सेंटीमीटर गहरा लंबा व चौड़ा गड्ढा खोद लिया जाता है। इस प्रकार प्रति हेक्टेयर करीब 10 हजार गड्ढे तैयार हो जाते है। खेत में तैयार छोटे कंदों जिन का औसत भार 250-300 ग्राम का होता है या बड़े कंदों के 500 ग्राम तक के टुकड़े काट कर खोदे गए गड्ढों में रोप देते हैं।

बीज की मात्रा –

जमीकंदन के लिए 500 ग्राम तक के बीज के टुकड़े ठीक रहते हैं। 1 हेक्टेयर खेत के लिए 50 क्विंटल बीज की जरूरत पड़ती है। गर्मियों के मानसून से पहले 1 बार सिंचाई जरूरी होती है। कम बारिश की हालत में समयसमय पर सिंचाई करते रहना चाहिए। बुवाई करने के बाद खेत में भूसी की परत पुआल या सूखी पत्तियां बिछा देनी चाहिए। जिससे नमी बनी रहे।

खरपतवार –

जमीकंद की फसल के साथ खरपतवार आना आम बात है। जमीकंद के क्षेत्र में कीटनाशी का छिड़काव करना चाहिए। पूरी फसल के दौरान 2.3 बार निराई-गुड़ाई जरूर करनी चाहिए। पहली निराई-गुड़ाई 40-60 दिनों करनी चाहिए।

कीट-

जमींकंद की फसल में जुलाई से सितंबर महीनों के दौरान तंबाकू की सूंडी का प्रकोप देखा गया। यह पत्तियों को खा कर हानि पहुंचाती है। इस की रोकथाम के लिए मेथेमिल लिक्विड दवा का छिड़काव करना चाहिए।

रोग –

झुलसा रोग फाइटोफ्थोरा कोलोकेमी नामक फफूंद के कारण लगता है। जमींकंद की पत्तियां झुलस जाती हैं और तना गलने लगता है। इस के अलावा कंदों की बढ़वार भी रुक जाती है। दूसरा रोग पत्ती कंद विगलन का होता है। रोकथाम के लिए सिक्सर नाम के रसायन की 300-330 ग्राम मात्रा को 200-300 लीटर पानी में मिला कर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए।

खुदाई –

जमींकंद की फसल अक्तूबर महीने से खुदाई के लिए तैयार हो जाती है। इसे हर हाल में नवंबर खुदाई करवा लेनी चाहिए।

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