नींबू की जैविक खेती करने के तरीके

नींबू से सब भालीभांति परिचित हैं, नींबू का आचार, नींबू की चटनी को सब लोग बड़े चाव से खाते हैं। नींबू की सबसे बड़ी विशेषता यह है जहाँ दूसरे फल पकने पर मीठे हो जाते हैं वहीं नींबू हर अवस्था में अम्लीय रहता है। यह विटामिंन “सी“ का मुख्य स्रोत है अतः इसमें स्कर्वी निवारक गुण पाया जाता है। दूसरी विशेषता इसमें यह है कि यह अम्लीय होने पर भी पित्तशामक है।

इसके कुछ औषधीय गुण है जो निम्नलिखित है-Nimbu ke fayde sehat ke liye

1. नींबू के रस को चेहरे पर मलने से कील मुंहासे ठीक हो जाते हैं
2. नींबू तुलसी और काली करौंदी का रस बराबर मिलाकर धूप में रखे जब वह गाढ़ा हो जाए तो मुंह पल मले यह मुंहासों को दूर कर देते है।
3. चेहरे की झुर्रियां मिटाने के लिये नींबू के रस में शहद मिला कर लगायें।
4. अण्डे की सफेदी में नींबू का रस मिलाकर मुंह पर रगड़ने से फिर गुनगुने पानी से धाने से चेहरे पर निखार आ जाता है।
5. सुबह-सुबह खाली पेट 200 ग्रा. गुनगुने पानी में 2 चम्मच नींबू रस व 1 चम्मच शहद डालकर पीने से मोटापा खत्म होता है।

जलवायु व मृदा –

नींबू की खेती उष्ण तथा उपोष्ण क्षत्रों में सफलापूर्वक की जाती है। यह 13-37 डि.से. तापमान में उगाया जा सकता है। पाला तथा लू से इस फसल को नुकसान होता है।
नींबू की खेती सभी प्रकार की मृदा में की जा सकती है। लेकिन अच्छी जल निकास युक्त बलूई, टोमट या एल्युवियल मृदा अच्छी मानी जाती है। उच्च कैल्शियम कार्बोनेट युक्त मृदा में इसकी पैदावार अच्छी होती है।
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पौध रोपण-

नींबू की खेती के लिये अच्छे जल निकास युक्त खेत में 3-4 बार गहरी जुताई करते है तथा खेत का ढाल बाहर की तरफ रखते हैं क्योंकि जल-जमाव का असर पौधे पर प्रतिकूल पड़ता है।
पौध रोपण हेतु जून से अगस्त माह सर्वोत्तम होता है। इसके लिए 0.75 गुणा 0.75 मीटर आकार का गढ्ढा की बनाकर उसमें 15-20 कि.ग्रा. गोबर की खाद प्रति गढ्ढा की दर से मिलाते है। पौधे के रोपण में 5-6 गुणा 5-6 मीटर दूरी रखते है। हल्की मृदाओं मे यह दूरी 4.5 -5  भी रखते हैं।

पोषक तत्वों –

नींबू की फसल में खाद का उपयोग बराबर मात्रा में फरवरी, जून तथा सितम्बर माह में किया जाता है। पोषक तत्वों की मात्रा नींबू की भरपूर फसल के लिए हर वर्ष बढ़ाई जाती है जो प्रथम से छठे वर्ष तक निम्न प्रकार है। नाइट्रोजन 100-500 ग्रा. फास्फोरस 50-200 ग्रा एवं पोटाश 25-100 ग्रा. प्रति पौधा। इन तत्वों की पूर्ति हेतु गोबर की खाद 200-250 क्टि, या नाडेप कम्पोस्ट 100-150 क्टि. या वर्मी-कम्पोस्ट 100-150 क्टि.प्रति हेक्. प्रति वर्ष उपयोग में लाये। आवश्यकतानुसार खादों की मात्रा को तीन भाागों में बराबर करके तीन बार उपयोग करें।
इसके अलावा, निराई गुड़ाई करते समय 2 कि.ग्रा. प्रति हेक्. जैविक खाद (बायोफर्टीलाइजर्स) मिश्रण एवं 2 कि. ग्रा. गुड़ को 150-200 कि.ग्रा. अच्छी सड़ी कम्पोस्ट खाद के साथ छाया में 7-10 दिन तक सड़ाकर सिंचाई के समय खेत में बुरक दें। सूक्ष्म तत्वों की पूर्ति के लिए सिंचाई के पानी के साथ 2-3 बार जीवामृत का उपयोग करें।

 सिंचाई- Lemon cultivation in Hindi

नींबू के बाग को प्रथम वर्ष सिंचाई पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि प्रारम्भिक अवस्था में इसका असर पौधों पर पड़ता है। अधिक पानी देने से जड़सड़न एवं कालर राट जैसी बीमारियां हो जाती हैं। फूल आने व फल बनते समय नमी का विशेष ध्यान रखते है।
निराई गुड़ाई- नींबू की फसल में मृदा में वायु संचरण व स्वास्थ्य के लिए समय-समय पर जुताई, थावलों की गुड़ाई तथा खरपतवार नियंत्रण आदि करते रहते है।

अन्तराशस्यन-

बागों में प्रथम एक से चार वर्षों तक अन्तराशस्यन करते है। अंतराशस्यन में दलहनी फसलें जैसे- सोयाबीन, चना, मूंगफली, लोबियां, राजमा, मटर की बुवाई कर सकते है।
कटाई व छटाई- मुख्य तनों को स्वस्थ रखने के लिए प्रारम्म्भिक अवस्था में 40-50 से.मी. मोटी, जमीनी स्तर पर के तनों की कटाई छंटाई करते है। फलने वाले पौधे में कम कटाई छंटाई करते है। समय-समय पर रोगग्रसित, कमजोरं तथा सूखे तनों को काट कर अलग कर देते है।

प्रमुख कीट व रोग- Tips to control pest and disease in Hindi

नींबू में प्रमुख कीट काी मक्खी, सफेद मक्खी, साइट्रस पाइला, थ्रिप्स, लीफ मानर, स्केल, तनाछेदक, फलमक्खी, मोथ, माइट आदि तथा प्रमुख रो कैंकर, पाउडरी मिल्डयु, एंथ्रक्नोज, गम्मोसिस, वाइरस आदि लगते है।
कीट एवं रोग नियन्त्रण – नींबू में कीटों की रोकथाम के लिए फसल पर जैविक कीटनाशी (बिबेरिया बेसियाना एवं मेटाराइजियम) 2 कि.ग्रा. प्रति हेक्. को 500 ग्रा. गुड़ के घोल में 1-2 दिन सड़ा कर शाम के समय छिड़काव करें। नीम तेल 2 ली. प्रति हेक्. या गौ मूत्र$गोबर$ वनस्पति (आकॅ, धतुरा, आइपोमिया, नीम पत्ति आदि) से तैयार किया तरल कीटनाशी का 10-15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें।
रोग की रोकथाम हेतु ट्राईकोडरर्मा एवं सुडोमोनास मिश्रण 2 कि.ग्रा. हेक्. को 500 ग्रा. गुड. के साथ 1-2 दिन तक सड़ा कर शाम के समय फसल पर छिड़काव करें।

तुड़ाई व उपज – ( lemon picking in Hindi)

पूर्ण परिपक्व फल जब पीले रंग के हो जाये तो 10-15 दिन के अन्तराल पर 2-3 तुड़ाई करते है। नींबू 150-160 दिन में तैयार होता है तथा साल में 2-3 फसल ली जाती है।
नींबू के वृक्ष से 50-80 फल प्रति पौधा तीन से आठ साल तक प्राप्त किया जाता है। औसतन 1000-15000 फल प्राप्त होते है।
तुड़ाई उपरान्त प्रौद्योगिकी- नींबू को जल्द पकने के लिए 6-7 डि.ग्री. से.टी. ग्रेड तापमान पर 90-95 प्रतिशत आर्द्रता पर रखते हैं। शीत भण्डारगृह में नींबू को लम्बे समय तक भण्डारित किया जा सकता है। इसे 30 गुणा 30 गुणा 30 गुणा से.मी वायु संवाहित गत्ते के डिब्बे में पैक करते हैं।
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