उन्नतशील लूसर्न चारा की खेती कैसे करें

इस फसल में बरसात के मौसम के अलावा हर समय हरा चारा प्राप्त किया जाता है और पशु इसे अधिक पसन्द करते हैं। यह मिट्टी की हालत को भी सुधारता है तथा मिट्टी की उर्वरा शक्ति को भी बढ़ाता है। लूसर्न चारा हरे रसदार एवं स्वादिष्ट चारे के लिए रबी ऋतु में सिंचित क्षेत्रों की महत्वपूर्ण फसलें हैं। ये पोषण की दृष्टि से उच्च गुणवत्ता वाली चारे की फसलें हैं। ये दुधारू पशुओं के लिए अत्यंत उपयोगी होती है। लूसर्न में प्रोटीनए खनिज पदार्थ मुख्यत कैल्सियम तथा फास्फोरस विटामिन आदि के महत्वपूर्ण स्त्रोत है। यह हरे चारे की प्रोटीन युक्त फसल है। इसे चारे की रानी भी कहा जाता है। यह एक सदाबहार किस्म है जो कि 3-4 वर्ष तक लगातार हरे चारे की पूर्ति करती है। इस हरे चारे की फसल में 16-25 प्रतिशत प्रोटीन और 20-30 प्रतिशत रेशा होता है। इसे पशुओं के चारे और सूखी घास के लिए आसानी से तैयार किया जा सकता है।
मिट्टी- इसे विभिन्न प्रकार की मिट्टी की किस्मों में उगाया जा सकता है पर यह गहरी और अच्छे जल निकास वाली दोमट मिट्टी में अच्छी पैदावार देती है। पानी रोकने वाली खारी और भारी मिट्टी में इसकी खेती करने से परहेज करें।

Alfalfa cultivation Fodder cultivation for animals in Hindi 


किस्में – टी- 9 यह एक तेजी से उगने वाली लंबी वार्षिक किस्म है जिसके गहरे चैड़े हरे रंग के पत्ते होते हैं और जामुनी फूल होते हैं। इस किस्म के बीज मोटे होते हैं यह पत्तों के धब्बे रोग की प्रतिरोधक है। इसकी औसतन पैदावार 280 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

हरे चारे की किस्म पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश राज्य इसकी खेती के लिए अनुकूल हैं। इसकी औसतन पैदावार 140-160 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
भूमि की तैयारी- खेत की पूरी तरह से तैयारी और बीज बैड समतल करें। खेत की एक बार तवियों से और तीन बार हल से जोताई करें। प्रत्येक जोताई के बाद सुहागे से खेत को समतल कर लें।

बिजाई- खरपतवार की रोकथाम फसल के प्रारम्भ से करनी चाहिए ताकि चारा उत्पादन अधिक मात्रा में हो। बीज राईजाबियम कल्चर से उपचारित किया होना चाहिए । बरसात के मौसम में चारे की कटाई लगातार करते रहना चाहिए उचित जल.निकासी का भी ध्यान रखना चाहिए। एक बार बोई गई फसल से लगातार 4-5 वर्ष तक चारा लिया जा सकता है इसलिए उचित खाद.पानी का ध्यान खासतौर पर अक्तूबर महीने में रखना चाहिए।
बिजाई का समय पंजाब में लूसर्न की बिजाई के लिए उचित समय मध्य अक्तूबर है।
बिजाई के समय पंक्ति से पंक्ति का फासला 30 से.मी रखें।
बीज की गहराई- बीज को 2-4 से.मी. गहरा बोयें।

बिजाई का ढंग-

इसकी बिजाई हाथ से छींटे द्वारा की जाती है। लूसर्न की बिजाई से पहले 15 किलो प्रति एकड़ जई का छींटा दें और हल की सहायता से इसे मिट्टी में अच्छे से मिला दें।
बीज का मात्रा- एक एकड़ खेत में 6 से 8 किलो बीजों का प्रयोग करें।
खाद- बिजाई के समय नाइट्रोजन 10 किलो यूरिया 22 किलो फासफोरस 32 किलो एस एस पी 200 किलो प्रति एकड़ डालें।
खरपतवार नियंत्रण- बिजाई के एक महीने तक खेत की गोडाई करते रहें। बरसात के मौसम में यदि नदीनों का हमला ज्यादा दिखे तो नदीन उगने की क्षमता के अनुसार खेत की दो बार गोडाई करें।

सिंचाई-

बिजाई के एक महीने बाद मिट्टी की किस्म और जलवायु के अनुसार पहली सिंचाई करें और बाकी की सिंचाई 15-30 दिनों के अंतराल पर करें। बरसात के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती।

पौधे की देखभाल-

अल्फा अल्फा चेपा हानिकारक कीट और रोकथाम के लिये मैलाथियॉन 50 ई सी 350 मि.ली को 150 लीटर पानी में डालकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
सुंडीए तेला और कीट- सुंडीए तेला और कीट यदि इसका हमला दिखे तो हैक्साविन 50 डब्लयु पी 450 ग्राम और मैलाथियॉन 50 ई सी 400 मि.ली को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ स्प्रे में करें।

बीमारियां और रोकथाम-

कुंगी इस रोग को यदि समय पर ना रोका जाए तो यह पैदावार का बहुत नुकसान कर सकती है। इससे पत्तों पर छोटे भूरे रंग के धब्बे और मध्य में काले और भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। यदि इसका हमला दिखे तो मैनकोजेब यडाइथेन एम 45- 25 ग्राम को 10 लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
पत्तों पर धब्बे-यह ज्यादातर उत्तर और केंद्रीय भारत में पाया जाता है। इससे प्रभावित पौधे पीले पड़ जाते हैं और पत्ते गिर जाते हैं। यदि इसका हमला दिखे तो मैनकोजेब यडाइथेन एम 45 या क्लोरोथैलोनिल 300 ग्राम को 150 लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।

फसल की कटाई-

बिजाई के 75-80 दिनों के बाद फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है और बाकी की कटाई 30-40 दिनों के अंतराल पर करें।
कटाई के बाद- बीज उत्पादन के लिए फसल की कटाई मार्च के मध्य में करनी चाहिए। जब फूल पूरी तरह विकसित हो जाएं तो सिंचाई बंद कर देनी चाहिए इससे अच्छी उपज में सहायता मिलती है।

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