लेमन ग्रास तथा नींबू घास की बुवाई कैसे करे अच्छे आमदनी के लिये

 

लेमन ग्रास की खेती करना बड़ा आसान है। इसके पौधें को जुलाई और अगस्त माह में लगाएं जाते है। जहां पर्याप्त मात्रा में पानी होता है। वहां फसल तेजी से बढ़ती है। पौधें से साल में तीन से चार बार फसल ले सकते है। बिना पानी वाले भाग में दो बार अच्छी फसल ले सकते हैं। ऐसे में किसानों के लिए लेमन ग्रास यानी नींबू घास वरदान साबित हो सकता है। यह किसी भी तरह की जलवायु और बंजर जमीन पर उग जाता है कम पानी में भी इसकी पैदावार अच्छी होती है। एक एकड़ जमीन में सालाना एक से डेढ़ लाख की कमाई हो जाती है। लैमन ग्रास को पशु व अन्य जंगली जानवर नहीं खाते है जिसके चलते इसकी रखवाली की आवश्यकता नहीं होती। इसे अपनी बंजर भूमि पर उगा जाया जा सकता है। लैमन घास से कई तरह के उत्पाद जैसे लैमन घास तेल और लैमन घास लोशन बनाए जाते हैं। लैमन घास में चिकित्सीय और रोगाणुरोधी होते है। इसकी पत्तियों का उपयोग मुख्य रूप से दवाइयां बनाने के लिए किया जाता है। दवाइयां का उपयोग सिर दर्द, दांत दर्द और बुखार जैसे विभिन्न समस्याओं का इलाज करने के लिए किया जाता है। यह एक सुगन्धित पौधा है। इसे भारत, कई देशो में उगाया जा रहा है। जैसे कटिबंधीय और उपउष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी उगाया जाता है।

मिट्टी-

लेमन ग्रास को 100 से 1200 मीटर कि ऊंचाई के बीच पर उगाया जाता है। इस फसल को पहाड़ी भागों में अच्छी तरह से उगाया जाता है। इसकी अच्छी पैदावार और गुणवत्ता से भरी हुई उपज लेने के इन मिट्टी की जरूरत होती है। जैसे चिकनी से रेतली जलोढ़ मिट्टी और अच्छे जल निकास वाली दोमट मिट्टी में उगाया जाता है। यदि इसे रेतली दोमट मिट्टी जो जैविक तत्वों से भरपूर हो में उगाया जाये तो अच्छे परिणाम देती है। इसे हल्की मिट्टी में भी उगाया जा सकता है।

किस्में –

प्रगति- इसके तेल की उपज 0.63 प्रतिशत और खट्टेपन की मात्रा 85-90 प्रतिशत होता है। इसे उप उष्णकटिबंधीय और उष्णकटिबंधीय या उत्तरी मैदानों में उगाया जाता है।
कृष्णा- इसमें बायोमास की मात्रा 8-11 मीटर प्रति एकड़ होती है और तेल की उपज 90-100 किलोग्राम प्रति एकड़ होती है। इसे भारतीय मैदानों में उगाया जाता है।
एन.एल. जी – यह किस्म लंबी होती हए इसके पत्ते 100-110 से.मी लंबे होते है जिसकी गहरी जामुनी रंग की परत होती है। इसमें तेल की मात्रा 0.4 और सिट्रल की मात्रा 84 होती है।

ओ.डी.-410 – इसकी ओलियोरेसिन की उपज 1050 किलोग्राम प्रति एकड़ और ओलियोरेसिन की मात्रा 18.6 प्रतिशत होती है।
ओडी-19 सुगंधी- इसमें 0.3-0.4 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। इसके तेल की उपज 40-50 किलो प्रति एकड़ होती है और खट्टेपन की मात्रा 84-86 प्रतिशत होती है।
निमा- पौधा लंबा और सिट्रल किस्म का होता है। इसके बायोमास की उपज 9.11 मिलियन टन प्रति एकड़ और तेल की उपज 95-105 किलो प्रति एकड़ होती है। मैदानों वाली भागों में उगाया जाता है।

कैवरी-

इस किस्म के पौधे लम्बे और तने सफेद रंग के होते है इसे नमी की स्थितियों में या नदी घाटी के निकट स्थित भारतीय मैदानों में उगाया जाता है।

जमीन की तैयारी-

खेत की तैयारी के दौरान दीमक के हमले से फसल को बचाने के लिए लिनडेन पाउडर 10 किलोग्राम प्रति एकड़ में मिलायें तथा लैमन घास की रोपाई के लिए उपजाऊ और सिंचित जमीन की आवश्यकता होती है। बार बार जोताई और हैरो की मदद से जोताई करें। लैमन घास की रोपाई बैडों पर की जानी चाहिए।
बिजाई बिजाई का समय मार्च-अप्रैल के महीने में नर्सरी बैड तैयार करें।

फासला नए पौधों की वृद्धि के अनुसार 60-60 से.मी रखें और ढाल बनाने के लिए फासला 90 गुणा 60
से.मी रखें। बीज की गहराई 2.3 से.मी. की गहराई में बोयें।

बिजाई का ढंग-

खेत में रोपाई के लिए दो महीने पुराने पौधों का प्रयोग किए जाते हैं।
बीज बीज की मात्रा बीज 1.6-2 किलोग्राम प्रति एकड़ में प्रयोग करें।

बीज का उपचार-

फसल को कांगियारी से बचाने के लिए बिजाई से पहले बीजों को सीरेसन 0.2 प्रतिशत या एमीसान 1 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें।
खरपतवार देख-रेख और रोपण- लैमन घास के बीजों को आवश्यक लंबाई और 1- 1.5 मीटर की चौड़ाई वाले तैयार बैडों पर बोयें। बीजने के बाद बैडों को कट घास सामग्री से ढक दें।

फिर इसे मिट्टी की पतली परत के साथ ढक दें। नए पौधे रोपाई के लिए 2 महीने में तैयार हो जाते हैं जब पौधा 12-15 से.मी ऊंचाई पर पहुंच जाता है। रोपाई से पहले खेत अच्छी तरह से तैयार होना चाहिए। रोपाई 15गुणा19 से.मी के फासले पर की जानी चाहिए। नए पौधों को मिट्टी में ज्यादा गहरा ना बोयें इससे बारिश के दिनों में जड़ गलन का खतरा बढ़ जाता है। नाइट्रोजन 24 किलो यूरिया 52 किलो फासफोरस 20 किलो एस एस पी 125 किलो पोटाशियम 14 किलो पोटाश 23 किलो प्रति एकड़ में डालें।
खरपतवार नियंत्रण- मिट्टी के तापमान को कम करने और नदीनों की रोकथाम के लिए मलचिंग भी एक अच्छा तरीका है। खेत को खरपतवार से मुक्त करने के लिए हाथों से गोडाई करें। जैविक मलच 1200 किलोग्राम प्रति एकड़ में डालें।

सिंचाई-

गर्मियों के मौसम में फरवरी से जून के महीने तक 5-7 अंतराल पर सिंचाइयां करें जब वर्षा नियमित रूप से नहीं होती तो पहले महीने में 3 दिनों के अंतराल पर सिंचाई दें और फिर 7-10 दिनों के अंतराल पर दें।

हानिकारक कीट और रोकथाम-

तना छेदक सुंडी यह सुंडी तने के नीचे छेद बना देती है और पौधे को अपना भोजन बनाती है। पत्ते का केंन्द्रीय भाग से सूखना इसका पहला लक्षण होता है। इसकी रोकथाम के लिए फोलीडोल 605 स्प्रे करें।

नीमाटोड-

ये कीट पूरे घास को संक्रमित करते हैं। इन कीटों से फसल को बचाने के लिए फेनामिफोस 4.5 किलोग्राम प्रति एकड़ में डालें।

बीमारियां और रोकथाम-

फूल क्रीम रंग में बदलना शुरू हो जाता है। बीमारी शिखर से फूल को संक्रमित करना शुरू कर देती है और फिर धीरे धीरे पूरे फूल पर पहुंच जाती है।
कां.गियारी से बचाव के लिए सीरीसन 0.2 या एमीसन.6 1 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें।

पत्तों पर लाल धब्बे-

इस बीमारी के कारण पत्तों के निचले भाग में भूरे रंग के गोल आकार में धब्बे बन जाते हैं। बाद में ये धब्बे बड़े हो जाते हैं और पूरा पत्ता सूख जाता है।
इस बीमारी की रोकथाम के लिए बाविस्टिन 0.1 की स्प्रे 20 दिनों के अंतराल पर और डाइथेन एम.45 0.2 की 3 स्प्रे 10.12 दिनों के अंतराल पर करें।

पत्ते का झुलस रोग-

पत्ते का झुलस रोग इस बीमारी के कारण पत्ते के शिखर और किनारों पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। इस बीमारी से पकने से पहले ही पत्ते मर जाते हैं।
इस बीमारी से बचाव के लिए 10-12 दिनों के अंतराल पर डाइथेर्न 2प्रतिशत की स्प्रे करें या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 0.3 प्रतिशत की स्प्रे करें।

कुंगी-

इस बीमारी के कारण पत्ते की निचली सतह पर भूरे रंग के धब्बे अच्छे से दिखाई देते हैं जिसके बीच में पीले रंग के धब्बे होते हैं।

पत्तों का छोटापन –

इसके कारण पौधे की ऊंचाई छोटी रह जाती है और पत्ते भी छोटे आकार के होते हैं।
इस बीमारी के खतरे को कम करने के लिए डाइथेर्न 78 की फूल आने से पहले 10-12 दिनों के अंतराल पर स्प्रे करें।

फसल की कटाई-

कटाई 60-70 दिनों के अंतराल पर करें। कटाई के लिए दराती का प्रयोग करें। कटाई मई के शुरू में और जनवरी के आखिर में करें। रोपाई के 4-6 महीने बाद पौधा उपज देना शुरू कर देता है। कटाई के बाद तेल निकालने की प्रक्रिया की जाती है।

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