लहसुन की खेती से अच्छा मुनाफा ले!!

भारत वर्ष में लहसुन की खेती का महत्वपूर्ण स्थान है। लहसुन मुख्यतः कलियां द्वारा उगाया जाता है। यह फसल सम्पूर्ण भारत वर्ष के लगभग हर प्रान्त में उगाई जाती है। विश्व में भारत का क्षेत्रफल एवं उत्पादन की दृष्टि से तीसरा स्थान है। लहसुन की खेती भारत के सभी भागों में की जाती है। लेकिन मुख्यतः इसकी खेती तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश बिहार, में बड़े पैमाने पर की जाती है। इसमें पोष्टिक तत्वों की मात्रा पर्याप्त होती है। इसका मुख्य उपयोग मसाले के रूप में होता है। इसका प्रयोग दवा के रूप में भी किया जाता है।

लहसुन की खेती के तरीके – Garlic organic cultivation in hindi

किस्में –

  • एग्रीफाउण्ड हवाईट,- इसकी अवधि 140-160 दिनों में 130-140 क्.िप्रति हेक्. उपज ले सकते है।
  • यमुना सफेद – इसकी अवधि 150-160 दिनों में 160-175 क्.ि प्रति हेक्. उपज ले सकते है।
  • यमुना सफेद- (जी.50) इसकी अवधि 165 -170 दिनों में 160-155 क्.ि प्रति हेक्. उपज ले सकते है।
  • यमुना सफेद- (जी. 282) इसकी अवधि 140-150 दिनों में 176-1100 प्रति हेक्. उपज ले सकते है।

खेत का चयन एवं तैयारी- लहसुन की खेती

दोमट मिट्टी इसकी पैदावार के लिये उपयुक्त है। वैसे बलुई दोमट से लेकल चिकनी मिट्टी में इसकी खेती की जा सकती है। जिसे मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा अधिक होने के साथ-साथ जल निकास की व्यवस्था अच्छी हो, इस फसल की खेती के लिए उपयुक्त होती है। दो-तीन जुताईयां करके खेत को अच्छी प्रकार समतल बनाकर क्यारियों एवं नलियों में बांट देते है।
प्रति हेक्. की दर से 60 टन सड़ी हुई गोबर की खाद क्यारियों में अच्छी तर मिला देते है। रोपाई के दो दिन पूर्व 200 कि.ग्रा. कैल्सियम अमोनियम नाइट्रेट या 100 कि.लो ग्रा. सुपर फास्फेट एवं 100 कि.लो ग्रा. प्यूरे आॅफ पोटाश प्रति हेक्. की दर से जमीन पर अच्छी प्रकार देते है। बुवाई के 4 सप्ताह बाद 200 कि.ग्रा. कैल्शियम आमोनियम नाइट्रेट या 100 कि.ग्रा. यूरिया प्रति हेक्. की दर से खेत में छिटकवा विधि से मिला देना चाहिए।

बीज की मात्रा –

क्लोब के आकार के अनुसार लगभग 500-900 कि.ग्रा. कलिया एक हेक्. रोपाई के लिए पर्याप्त होता है।

बुवाई की विधि-

लहसुन के कन्दों में कई कलियां होती है। इन्हीं कलियों को गांठो से अलग-अलग करके बुवाई की जाती है। बुवाई के समय कतारो की दूरी 12-15 से.मी. तथा कतारों में कलियों की दूरी 7.5 -10 से.मी. रखते है। बुवाई लगभग 5-6 से.मी. गहरी करते है। बुवाई करते समय यह ध्यान देना चाहिए कि कलियों का नुकीला भाग ऊपर ही रखा जाये। बुवाई के समय खेत में नमी होना आवश्यक है। करनाल सफेद जाति को 8-10 मि.मी आकार की कलियां 15-10 से.मी की दूरी पर लगाने से अधिक से अधिक निर्यात योग्य पैदावार मिलती है।

खरपतवार नियंत्रण-

लहसुन की जड़े अपेक्षाकृत कम गहराई तक जाती हैं अतः 2-3 बार उथली गुड़ाई करते हैं और खरपतवार निकाल देते है। सिंचाई के समय-समय पर आवश्यकतानुसार करते है। साधारणतः जाड़े मौसम में 10-15 दिनों के अन्तर से सिंचाई करते है परन्तु गर्मियों में सिंचाई प्रत्येक सप्ताह करना चाहिए। जिस समय गांठे बन रही हों, सिंचाई जल्दी-जल्दी करते रहना चाहिए। अधिक खरपतवार नाशक दवाईयां जैसे गोल 1 ली. प्रति हेक्. या स्टाॅम्प 3.5 ली. प्रति हेक्. की दर से प्रयोग करना चाहिए। आवश्यकतानुसार खरपतवार हाथ से निकालने पर अच्छी पैदावार की जा सकती है।

फसल सुरक्षा-रोग नियंत्रण-

बैंगनी धब्बों रोग लगने पर डायथेन एम-45 की 2.5 ग्राम प्रति ली. पानी की दर से 10-15 दिन के अन्तर से छिड़काव करें। दवा का छिड़काव करते समय चिपकने वाली दवा जैसें इन्डोट्रोन या साधरण गोंद 0.05 प्रतिशत की दर से अवश्य मिला दें।

कीट नियंत्रण –

फसलों को हानिकारक कीटों से बचाये। थ्रिप्स नामक कीट का प्रकोप होने पर मैलाथियान 1 मि.ली. प्रति ली. पानी में घोलकर कीट देखते ही छिड़काव करें।

खुदाई, सुखाई एवं भण्डारण-

जिस समय पौधों की पत्तियां पीली पड़ कर सूखने लग जायें, सिंचाई बंद कर देना चाहिए। इसके कुछ दिनों बाद लहसुन की खुदाई कर लेना चाहिए। इसके बाद गांठों की 3-4 दिनों तक छाया में सुखा लेते है। फिर 2 से 2.25 से.मी. छोड़कर पत्तियों को कंदो से अलग कर लेते है। कंदों को साधारण भण्डार में पतली तह में रखते है। ध्यान रखें कि फर्श नमी न हो।

लहसुन को बाजार या भण्डारण में रखने के लिए उनकी अच्छी प्रकार छटाई करके रखने से अधिकतम लाभ मिलता है तभी भण्डारण में कम हानि होती है। इसमें कटे, फटे रोग तथा कीड़ों से प्रभावित लहसुन छाँटकर अलग कर लेते है। अच्छी प्रकार से सुखाये गये लहसुन को उनकी छटाई करके साधारण हवादार घरों में रख सकते है। 4-6 महीने में भण्डारण से 15-25 प्रतिशत तक का नुकसान मुख्य रूप से सूखने से होता हैं पत्तियों सहित बण्डल बनाकर रखने से कम होती है।

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