कोदो की खेती एक स्वास्थ्यवर्धक फसल है

कोदो (कुटकी) फसल से अच्छी पैदावार ज्यादातर उन क्षेत्रों से ली जा सकती है जहां पर बहुत कम वर्षा होती है। यह फसल शुगर फ्री चावल के तौर पर पहचानी जाने वाली मुख्य फसल है। कोदों-कुटकी, बजरीयुक्त, पथरीली एवं खराब जमीन में भी उगायी जाती है तथा बलुई एवं दोमट मिट्टी से अच्छी उपज प्राप्त होती है। लेकिन किसान इसको कुछ भूल सा गये हैं। देखा जाये तो आईयूसीएन रेड लिस्ट में शुमार कोदो (कुटकी) की रक्षा और लोकप्रिय बनाने के प्रयास जोर-शोर से शुरू सरकारों द्वारा कर दिये गये है।

यह असिंचित क्षेत्रों में बोये जाने वाले मोटे अनाजों मेें कोदों का महत्वपूर्ण स्थान है। क्योंकि यह एक ऐसी फसल है कि अकाल की स्थिति में भी असानी से उगायी जा सकती है। एक कहावत है कि – कोदो कुटकी के भात खाले, बीमारी भगा ले। यह जिंदगी हवे सुन्दर छाया है रे हाय, कोदो कुटकी के भात खाले चकोड़ा की भाजी सब दूर होवे रहे मन में राशि मधु मोह-मोह सपा होवे न रोगी। दरअसल इन पंक्तियों में लघु धान्य-अनाज कोदो-कुटकी के औषधीय गुणों कीे व्याख्यान किया गया। किया गया है।

बडे़-बडे़ शहरों, महानगरों की अज्ञानता एवं विभिन्न प्रकार के अस्वास्थ्य/स्वास्थ्य को खराब करने वाले खाद्यय पदार्थों के साथ हमारी दिन/प्रतिदिन दिनचर्या ऐसी घुलमिल गयी है कि हमारे पास पौष्टिक खाद्य पदार्थों के विकल्प अब सीमित हो चले है। कोदो (कुटकी) को अंगे्रजी कोदो मिलिट के नाम से जाना जाता है साथ ही काउ ग्रास आदि के नाम से भी पहचाना जाता है। कोदो के दानों को चावल के रूप में खाया जाता है और इसे स्थानीय इलाके में उपवास पर खाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोदो-कुटकी की बहुत माँग है। पिछले कुछ वर्षों से देखने में आया है कि कोदो-कुटकी की मांग दिन/प्रतिदिन बढ़ती जा यहां तक की अब तो बड़े-बडे़ होटलों, रेस्टोरेंटों में भी खाने के रूप में परोसा जाने लगा।

Paspalum scrobiculatum cultivation tips in Hindi

कोदों की बुवाई – kutki ki buwai in hindi

कोदों बुवाई का सही समय जून माह के प्रथम सप्ताह से मध्य जुलाई माह तक माना गया है। खेत में जब पर्याप्त नमी हो तुरन्त बुवाई कर देनी चाहिए। कोदों की बुवाई छिड़कवा विधि के अलावा लाईनों में करने से अधिक पैदावार प्राप्त की जा सकती है। लाईनों में बीज बोने की गहराई कम से कम 3 से.मी. एवं पंक्ति से पंक्ति की दूरी 40 से 50 से.मी. तथा बीज से बीज की दूरी 8 से 10 से.मी. रखनी चाहिए। बीज बुवाई हेतु 15-18 कि.ग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर की दर से पर्याप्त होता है।

कोदों की प्रमुख किस्में: types of kutki crops in Hindi

डिडोरी-73, पाली कोयम्बटूर-2, जे.के.-2, जे.के.-6,जे.के.-62, ए.पी.के.-1 एवं निवास-1 अच्छी किस्में है।

खाद एवं उर्वरक का प्रयोग एवं सिचाई: कोदों में जैविक खाद का प्रयोग बहुत ही लाभप्रद होता है क्योंकि यह खाद पानी संरक्षण क्षमता को बढ़ावा देता है। 6-10 टन खाद प्रति हेक्टेयर पहली जुताई के समय खेत में फैलाना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा खेत में बुवाई के समय कूडों में बीज के नीचे डाल देना चाहिए। नत्रजन की शेष मात्रा बुवाई के 30-40 दिन बाद खड़ी फसल में बुरकाव कर देना चाहिए। कोदों में सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है फिर भी जरूरी हो तो एक दो सिंचाई तक की जा सकती जब वर्षा लम्बे समय तक रूक गयी हो। वर्षा पानी की निकासी का प्रबंध किसान को पहले ही कर लेना चाहिए।

खरपतवार:

बुवाई के 35-40 दिन बाद समान्यतया दो निराई-गुड़ाई 15-15 दिन के अन्तराल पर करनी चाहिए।

फसल देखभाल –

कोदों में ज्यादातर अरगट बीज जनित रोग और फफूंद के कारण होती है। इसकी रोकथाम हेतु पौधों में फूल आने के समय एक चिपचिपा, हल्के गुलाबी रंग का स्त्राव निकलता है जो बाद में सूखकर एक पपड़ी से बन जाता है। इस रोग जनित कोदों का अनाज मनुष्य एवं पशओं दोनों के लिए हानिकारक होता है।

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