उन्नतशील जूट की खेती कर अच्छी आमदनी लें

जूट की खेती गर्म एवं नम मिट्टी वाली जलवायु आवश्यक है। यह एक रेशेदार पौधा है। इसका तना पतला और बेलनाकार होता है। इसका उपयोग कई वस्तुओं के तैयार करने में की जाती है। जैसें- बोरे, दरी, तम्बू, तिरपाल, टाट, रस्सियाँ, निम्नकोटि के कपड़े तथा कागज बनाने के काम आता है। इससे लगभग 38 लाख गाँठ एक गाँठ का भार 400 पाउंड, जूट पैदा होता है। जूट उत्पादन का लगभग 67 प्रतिशत भारत में ही खपता है। 7 प्रतिशत किसानों के पास रह जाता है और शेष ब्रिटेन, बेल्जियम, जर्मनी, फ्रांस, इटली और संयुक्त राज्य, अमरीका, को निर्यात होता है। 100 से 200 से०मी० वर्षा तथा 24 से 35 डिग्री सेंटीग्रेड तापक्रम उपयुक्त है। जूट के डंठल से चारकोल एवं गन पाउडर बनाया जाता है।

जूट की खेती – jute farming tips in Hindi

भूमि का चुनाव – Land for Jute cultivation in Hindi

ऐसी भूमि जो समतल हो जिसमें पानी का निकास अच्छा हो साथ की साथ पानी रोकने की पर्याप्त क्षमता वाली दोमट तथा मटियार दोमट भूमि इसकी खेती के लिए अधिक उपयुक्त रहती है।

भूमि की तैयारी – jute ki kheti kaise kare

मिट्टी पलटने वाले हल से एक जुताई तथा बाद में 2-3 जुताइयां देशी हल या कल्टीवेटर से करके पाटा लगाकर भूमि को भुरभुरा बनाकर खेत बुवाई के लिए तैयार किया जाता है। चूंकि जूट का बीज बहुत छोटा होता है इसलिए मिट्टी का भुरभुरा होना आवश्यक है ताकि बीज का जमाव अच्छा हो। भूमि में उपयुक्त नमी जमाव के लिए अच्छी समझी जाती है।

बुवाई –

जूट की दो प्रमुख किस्में होती हैं। प्रत्येक किस्म की प्रजातियां निम्नवत् हैं-

कैपसुलेरिस– इसको सफेद जूट या कहीं.कहीं ककिया बम्बई भी कहते हैं। इसकी पत्तियां स्वाद में कडुवी होती हैं। इसकी बुवाई फरवरी से मार्च में की जाती है। भूमि के आधार पर निम्न प्रजातियों की संस्तुति की गयी है।

जे०आर०सी०.321- यह शीघ्र पकने वाली जाति है। जल्दी वर्षा होने तथा निचली भूमि के लिए सर्वोत्तम पाई गई है। जूट के बाद लेट पैडी घान की खेती की जा सकती है। इसकी बुवाई फरवरी.-मार्च में करके जुलाई में इसकी कटाई की जा सकती है।

जे०आर०सी०.212- मध्य एवं उच्च भूमि में देर से बोई जाने वाली जगहों के लिए उपयुक्त है। बुवाई मार्च -अप्रैल में करके जुलाई के अन्त तक कटाई की जा सकती है।

यू०पी०सी०.94 रेशमा-निचली भूमि के लिए उपयुक्त बुवाई फरवरी के तीसरे सप्ताह से मध्य मार्च तक की जाए 120 से 140 दिन में कटाई योग्य हो जाती है।

जे०आर०सी०.698 -निचली भूमि के लिए उपयुक्त इस प्रजाति की बुवाई मार्च के अन्त में की जा सकती है। इसके पश्चात् धान की रोपाई की जा सकती है।
अंकित यएन०डी०सी०- निचली भूमि के लिए उपयुक्त इस प्रजाति की बुवाई 15 फरवरी से 15 मार्च तक की जा सकती है। सम्पूर्ण भारत के लिए संस्तुत।

ओलीटोरियस- इसको देव या टोसा जूट भी कहते हैं। इसकी पत्तियां स्वाद में मीठी होती हैं। इसका रेशा केपसुलेरिस से अच्छा होता है। उच्च भूमि हेतु अधिक उपयुक्त हैं। इसकी बुवाई अप्रैल के अन्त से मई तक की जाती है।

जे०आर०ओ०. 632 -यह देर से बुवाई और ऊची भूमि के लिए उपयुक्त है। अधिक पैदावार के साथ.साथ उत्तम किस्म को रेशा पैदा होता है। इसकी बुवाई अप्रैल से मई के अन्तिम सप्ताह तक की जा सकती है।

जे०आर०ओ०.878 -यह प्रजाति सभी भूमियों के लिए उपयुक्त है। बुवाई मध्य मार्च से मई तक की जाती है। यह समय से पहले फूल आने हेतु अवरोधी है।
जे०आर०ओ०.7835 -इस जाति में 878 के सभी गुण विद्यमान हैं। इसके अतिरिक्त अधिक उर्वरा शक्ति ग्रहण करने के कारण अच्छी पैदावार होती है।

जे०आर०ओ०.524 -उपरहार एवं मध्य भूमि के लिए उपयुक्त बुवाई मार्च तृतीय सप्ताह से अप्रैल तक की जाये। 120 से 140 दिन में कटाई योग्य हो जाती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *