ज्वार बीज की बुवाई कर अच्छा उत्पादन लें!

ज्वार की खेत मुख्यतः भारत के सभी जिलों में किया जाता है।तो चलिए जान लेते हैं कैसे करें ज्वार बीज की बुवाई जिससे किसानों को अच्छा उत्पादन मिले।

ज्वार बीजों की उन्न्त खेती कैसे करें – Jowar (Sorghum) seeds cultivation in Hindi

भूमि का चुनाव –

बलुई दोमट एवं ऐसी भूमि जहां जल निकासी की अच्छी व्यवस्था हो ज्वार के खेती के लिये उपयुक्त होती है।
बीज की दर – 10-12 कि.ग्रा. प्रति हेक्.

खेत की तैयारी –

पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा अन्य 2-3 जुताईया देशी हल अथवा कल्टीवेटर से करके खेत तैयार कर लेना चाहिए।
प्रजातियां –

प्रजातिगत विशेषताएं : Jowar beej ki buwai kaise kare
बुवाई का समय-

जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक का समय अधिक उयुक्त है।

बीजोपचार –

एक कि.लो. ग्राम बीज को थीरम 2.50 ग्राम से शोधित कर लेना चाहिए। दीमक के प्रकोप से बचने हेतु 25 मि.ली. प्रति किलो ग्राम बीज की दर से क्लोरीयापायरीफास से शोधित करें।

बुवाई के विधि –

ज्वार की बुवाई 45 से.मी. की दूरी पर हल की पीछे पौधे से पौधे की दूरी 15-20 से.मी. रखते हुये करना चाहिए।

उर्वरक –

संकर प्रजातियों के लिये 80:40: 20: कि.ग्रा. एवं अन्य प्रजातियों कि लिये 40:20:20 कि.ग्रा नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश प्रति हेक्. प्रयोग करे। नत्रजन की आधी मात्रा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत में बुवाई के समय कूड़ों में बीज के नीचे डाल देना चाहिए। नत्रजन का शेष आधी मात्रा बुवाई लगभग 30 से 35 दिन के बाद खड़ी फसल में प्रयोग करना चाहिए।

पृथक्करण दूरी –

ज्वार प्रमाणित बीज उत्पादन हेतु 100 मी. एवं आधारीत बीज उत्पादन हेतु 200 मी. की पृथक्करण दूरी रखना चाहिए।

रोगिंग –

फसल की वानस्पतिक अवस्था से लेकर परिपक्वा अवस्था तक अवांछनीय पौधे का निष्कासन निरन्तर करते रहना चाहिए।

निराई एवं गुड़ाई –

बुवाई के 3 सप्ताह बाद फसल की निराई एवं गुड़ाई कर देनी चाहिए। यदि खेत में पौधे की संख्या अधिक हो तो थिनिंग कर दूरी निश्चित कर दी जाये।

सिंचाई –

फसल में बाली निकलते और दाना भरते समय यदि खेत में नमी कम हो तो सिंचाई अवश्यक कर दी जायें।

प्रमुख रोग – भूरा फफूंद
पहचान –

प्रारम्भिक अवस्था में बीमारी सफेद रंग की फफूंदी बालियों एवं वृंत पर दिखाई देती है। दाने भद्दे एवं उनका रंग हल्का गुलाबी भूरा या काला फफूंदी के अनुसार हो जाता है।

उपचार एवं नियंत्रण –

मैंकोजेब 2 कि.ग्रा. प्रति हेक्. की दर से छिड़काव करें।

प्रमुख कीट –
ज्वार की प्ररोह मक्खी –

यह घरेलू मक्खी से छोटे आकार की होती है। जिसके शिशु जमाव के प्रारम्भ होते ही फसल को हानी पहुचाते है।

उपचार एवं नियंत्रण –

इन्डोसल्फान 35 ई.सी. 1.25 ली./हेक्. बुवाई के 12-15 दिन बाद प्रयोग करें

तना छेदक कीट –

इस कीट की सूड़ियां तने के छेद करके अन्दर ही खाती रहती है। जिससे बीज का गोभ सूख जाता है।

उपचार एवं नियंत्रण –

इन्डोसल्फान 35 ई.सी. 1.5 ली./हेक् का प्रयोग करें

ईयर हेड मिज –

प्रोढ़ मिज लाल रंग की होती है। और यह पुष्प् पत्र पर अण्डे देती है। लाल मेगेटस दानों के अन्दर रहकर उसका रस चूसती है। जिससे दने सूख जाते है।

उपचार एवं नियंत्रण –

इन्डोसल्फान 35 ई.सी. 1.5 ली./हेक् का प्रयोग करें

ईयर हेड केटर पिलर –

इसकी गिडारे मुलायम दानों को खाकर नष्ट कर देती है। तथा भुट्टों में जाला बना देती है।

उपचार एवं नियंत्रण –

इन्डोसल्फान 35 ई.सी. 1.5 ली./हेक् का प्रयोग करें

ज्वार का माईट –

यह बहुत छोटा अष्टपदीय होता है। जो पत्तियों की निचली सतह पर जाले बुनकर उन्हीं के अन्दर रहकर पत्तियों से रस चूसता है। ग्रसित पत्ती लाल रंग की हो जाती है तथा सूख जाती है।

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