कैसे क्षारीय तथा ऊसर भूमि की सुधार कर के पैदावार बढ़ायें

ऊसर मृदाओं का क्षेत्रफल भारत में लगभग 2.6 लाख हेक्. इन मिट्ीयों में अधिकांश मिट्टी लवणीय तथा क्षारीय है जिनका समुचित सुधार सतही मृदा से लवणों का निक्षालन ढलान के नीचे की ओर जल निकास नाली बनाकर किया जा सकता है इन मृदा में लवण सहिष्णु किस्मों का चयन कर फसलों की खेती करना अधिक लाभप्रद रहता है।
ऊसर भूमि का क्षेत्रफल करीबन 18 से 20 प्रतिशत है तथा ये मृदाऐं चूनायुक्त भी हैं इन मृदाओं के सुधार हेतु निम्न प्रक्रियाएं अपनानी चाहिए।

1. गर्मी यानि कि मई-जून माह में खेती की अच्छी जुताई करें।
2. खेत की सतह पर जिप्सम आवश्यकता की 50 प्रतिशत मात्रा या 15 टन प्रति हेक्. जिप्सम की आवश्यकता की एक चौथाई मात्रा बिखेर कर हल्की जुताई कर सतही मृदा में मिलावें।
3. खेत में मोटी डोलीयां बना कर उसे छोटी-छोटी क्यारियों में विभक्त करें।
4. जहाँ अच्छे पानी की सुविधा हो वहां उपचारित क्यारियों में सिंचाई द्वारा पानी भर कर मृदा कण से रासायनिक प्रक्रिया द्वारा विच्छेदित हुये सोडियम तत्व नीचे की सतह में निक्षाल करें। इस प्रक्रिया को एक बार फिर से सिंचाई कर क्यारियों में पानी भरकर दोहरायें। जहां पानी का सुविधा नहीं है वहां खेत में क्यारियां बनाकर वर्षा का पानी द्वारा प्राकृतिक रूप से सोडियम का निक्षालन करें।

5. वर्षा ऋतु में खेत में हरी खाद हेतु ढैंचा का बीज 80-100 कि.ग्रा. प्रति हेक्. की दर से बिखेर कर भूमि में मिला देंवे।
6. जब ढैंचा की फसल में 50 प्रतिशत फूल आ जाये तो इसे हल चलाकर खेत में मिला देवे। इस समय खेत में नमी का होना परम आवश्यक है ताकि हरी खाद अच्छी तरह से सड़ जायें। ढैंति5चा की हरी खाद देने से क्षारीय मृदा सुधार प्रक्रिया में गति मिलती है।
7. रबी में गेहूं किस्म राज. 3077 की बुवाई करें। इसमें बीज एवं उवर्रकों की सिफारिश की गई मात्रा से 10 प्रतिशत अधिक मात्रा को काम में लेना लाभप्रद रहता है। बुवाई के समय सिफारिश की गई नत्रजन की आधी मात्रा काम में लेवे तथा बकाया आधी मात्रा खड़ी फसल में दो बार करके देवें एवं सिंचाई करें।
8. चूंकि क्षारीय मृदाओं में जिंक की कमी होती है अतः गेहूं की फसल में 25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट प्रति हेक्. की दर से बुवाई के समय अन्य उर्वरकों के साथ देना चाहिए।
9. गेहूं की फसल में क्यारियों छोटी-छोटी बनावे तथा सिंचाई हल्की व बार-बार करें।

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