अब हल्दी की जैविक खेती से कमाएं अधिक मुनाफा

भारतवर्ष में हल्दी का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। भारतीय परिवार में दैनिक उपयोग के साथ-साथ प्रत्येक शुभ अवसरों पर भी इसका प्रयोग होता है। भारत वर्ष में हल्दी के इतने लोकप्रिय होने के कारण इसकी महत्वपूर्ण उपयोगिता ही है। इसका प्रयोग प्रत्येक भारतीय परिवार में मसाले तथा विभिन्न औषधियों के रूप में किया जाता है।

जैविक हल्दी की खेती करने के तरीके औ विधि – Haldi ki jaivik kheti karne ke tarike aur vidhi

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जलवायु- (Climate for Turmeric cultivation in Hindi)

हल्दी सम-शीतोष्ण देशों में उगाई जाने वाली फसल हैै। यह समुद्र तल से लेकर 1500 मीटर तक के ऊंचे स्थानों में उगायी जा सकती है। किन्तु, वातावरण के तापमान का इस पर काफी प्रभाव पड़ता है। जब तापमान सर्दी के प्रारम्भ में 70 डि.फा. हो जाता है तो पौधों की बढ़वार रूक जाती है।

भूमि- ( Haldi ke kheti ke liye bhoomi)

हल्दी के लिए जल-निकास युक्त बलुई दोमट तथा हल्की भूमि उपयुक्त होती है किन्तु मटियार तथा पठारी भूमि में भी यह उगाई जा सकती है। भारी भूमि में गांठे छोटी तथा चपटी हो जाती हैं। क्षारीय भूमि इसके लिये उपयुक्त नहीं होता है।
इसके लिए जमीन जितना भुरभुरी बनायी जायेगी हल्दी की पैदावार उतनी ही अच्छी होती है। प्रायः 6 से 7 जुताई पर्याप्त होता हैं।

खाद एवं उर्वरक- ( Manure and fertilizer for organic Turmeric cultivation in Hindi)

हल्दी भूमि से काफी पौष्टिक पदार्थ लेती है इसलिये इसके बोने से पहले भूमि का परीक्षण करा लेना चाहिए। परीक्षण के सुझाव के अनुसार खाद एवं उर्वरक का प्रयोग करना चाहिये। सामान्यतः हल्दी बोने के लिये खेत की तैयारी के समय 300 से 400 क्.ि गोबर, सड़ी खाद या 150 से 200 क्. नाडेप कम्पोस्ट या वर्मी कम्पोस्ट प्रति हेक्. के हिसाब से भली भांति देना चाहिए। इसके अतिरिक्त, 75 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 75 कि.ग्रा. फाॅस्फोरस, एवं 100 कि.ग्रा. पोटाश की पूर्ति करने हेतु निराई गुड़ाई करते समय बुवाई के लगभग 50-60 दिन बाद 2 कि.ग्राम जैविक खाद मिश्रण एवं 2 कि.ग्रा गुड़ को 150-200 कि.ग्रा. कम्पोस्ट खाद के साथ 7-10 दिन तक छाया में सड़ाकर खेत में बुरक कर सिंचाई कर दें।

बीज- ( Haldi ke beeJ)

हल्दी की गांठ जो वास्तव में भूमिगत तना है बोने के काम में लाई जाती है। यह गांठे दो प्रकार की होती है
1. अण्डाकार: जिसे मूल गांठ कहते है।
2. पूत्तियाँ: जिसे लम्बी गांठ कहते है।
ऐसा देखा गया है, कि पुत्तियों की अपेक्षा मूल गांठो में बोने से अच्छी उपज मिलती है।

बोने का समय-

हल्दी की बुवाई अप्रैल से लेकर जून तक की जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में अप्रैल-मई एवं मैदानी क्षेत्रों में इसकी बुवाई मई-जून में की जाती है।
किस्में- इसकी बहुत सी किस्में है जिनमें लोकल शिलांग लोक, मैसूर की गुडगा, एलचगा, बम्बई लीखन्डो, लीनो मद्रास की चिन्ना, पुपेरूम, नादाम तथा मद्रास मंजल आदि जातियां संकलित की गई है। इनमें से सी.एल.एस.  1,2,5,16,20 जातियां काफी अच्छी सिद्ध हुई हैं। इनसे उपज अन्य लोकल जातियों की अपेक्षा अधिक मिलती है।

बीज की मात्रा –

हल्दी की एक हेक्. बुवाई के लिए 10 से 15 क्टि. बीज पर्याप्त होती है।\

रोपाई-

हल्दी की रोपाई मुख्यतः चैरस क्यारियों या मेड़ो पर की जाती है। प्रत्येक विधि में पंक्ति की दूरी 50 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 30 से.मी. रखनी चाहिए। अधिक वर्षा तथा भारी मिट्टी तथा कम वर्षा वाले स्थान पर चैरस खेत में बुवाई करना अच्छा रहता है। हल्दी के कंद लगाने के लिए 7 से 10 से.मी. की गहराई पर लगा कर मिट्टी से ढ़क देते है।

अवरोध पत्ते-

इसकी बुवाई करने के तुरन्त बाद सूखी घास अथवा पत्तियों आदि से क्यारियों को ढ़क देने से पैदावार में वृद्धि होती है तथा निराई गुड़ाई एवं सिंचाई की भी कम आवश्यकता पड़ती है।

निराई गुड़ाई तथा अन्य क्रियायें-

प्रायः 3 से 5 निराई गुड़ाई की आवश्यकता पड़ती है। जब पौधों का विकास आरम्भ हो जाये तथा नये कंद बनने प्रारम्भ हो जाये तो पौधों पर मिट्टी चढ़ा देना चाहिए जिससे कंदो का विकास अच्छी तरह हो सके। समय-समय पर आवश्यतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए।

कीट एवं रोग नियंत्रण-

पत्ती छेदक या लपेटक एवं अन्य कीटों के नियंत्रण हेतु 2 ली. प्रति हेक्. नीम तेल या गौ मूत्र$ वनस्पति (बेसरम, आॅक, धतूरा, लेनटाना, केनर, नीम पत्त्ती आदि) से तैयार किया गया तरल कीटनाशी 10-15 दिन के अन्तराल पर छिड़कें।
पदगलन रोक की रोकथाम हेतु हल्दी की गाँठों को ट्राईकोडर्मा एवं सूडोमोनास (जैविक फफूंदनाशी) के मिश्रण के घोल से उपचारित करके ही बोये।

खुदाई-

हल्दी की पत्तियों जब पीली पड़कर सुख जाए तो समझना चाहिए कि हल्दी की खुदाई करने का समय हो गया है। हल्दी की खुदाई योग्य साधारणतया नवम्बर-दिसम्बर में हो जाती है। किन्तु, यदि खेत में अन्य कोई फसल न हो तो इसकी खुदाई फरवरी में भी की जा सकती है।

उपज-

इसकी उपज प्रति हेक्. 200 से 300 क्.ि प्राप्त हो जाती है।

कीट एवं व्याधि –

हल्दी को कोई खास बीमारी नहीं लगती है किन्तु कभी-कभी पत्तियों पर फफूंदीनुमा धब्बे पड़ जाते हंै।
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