जैविक कटहल की बुवाई कैसे करें

कटहल के पौधे जीवी, अधिक आय देने वाले, लम्बे समय तक रहने वाले होते है। यह देश के पूर्वी एवं दक्षिण भांगों में गरीबों के भोजन के रूप में प्रसद्धि हैं। कटहल के फलों में विटामिन-ए, विटामिन-सी तथा खनिज पदार्थों के साथ-साथ कार्बोहाइड्रेट भी पाया जाता है। कटहल भारत वर्ष के आर्द्र व गर्म जलवायु वाले क्षेत्र में सफलतापूर्वक उगाया जाता है। इसके पेड़ सदाबहार एवं उंचे होते है। इसके फल काफी बड़े होते है जिसका उयोग अधिकतर सब्जी के लिये करते है और अचार बनाकर एवं पके हुए फलों तथा बीजों को विभिन्न रूपों में प्रयोग किया जाता है। उत्पादक प्रायः कटहल में कम फलन तथा फल गिरने की शिकायत होता है। प्रदेश में सभी कृषि जलवायु क्षेत्र में उगाया जाता है। कटहल के बगीचे से कृषको को बहुत फायदा होता है। सामान्यतः कृषक कटहल के पौधों को मेंड़ पर ही लगाते है।

मिट्टी एवं जलवायु –

कटहल के पौधों को सभी प्रकार की भूमि में लगाया जा सकता है, परन्तु अच्छी बढ़वार एवं पैदावार की दृष्टि से गहरी उपजाऊ दोमट भूमि जिसका जल निकास अच्छा हो, उपयुक्त होता है। ऐसे स्थान जहां जल अचान बढ़ जाता है, ऐसे खेती के लिये उपयुक्त होता है।
कटहल को गर्म एव ंनग जलवायु की आवश्यकता होती है। कटहल के पौधे पाले एवं अधिक सहन नहीं कर पाते है। कटहल के पौधों की समुद्रतल से 1500 मी. की उंचाई तक लगाया जा सकता है। कटहल के पौधों को गर्म हवाओं से भी क्षति होती है। सूर्य का प्रकाश पर्याप्त मात्रा मिलने पर उत्पादन उच्छा होता है।

जैविक कटहल की बुवाई कैसे करें – How to cultivate jackfruit in Hindi

कटहल को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है-

कड़े गूदे वाली किस्में
मुलायम गूदे वाली किस्में

रूद्राक्षी – फल तथा छोटे कांटे वाले होते है। इनका भार लगभग 4-5 किलो तक होता है एवं फल गुच्छों में आते है। पूर्ण रूप से विकसित पेड़ो में फल लगभग 500 से अधिक प्राप्त होता है। फल के बीज बहुत छोटे होते है।

सिंगापुर – फल अकार में बड़े होते है। पेड़ो में अधिक समय तक फल लगे रहते है। फलों का औसतन वनज लगभग 7-10 किलो तक होता है। गूदा मीठा, कुरकुरा, सघन पीला होता है।

खाजा- यह सफेद कोये वाली किस्म है। फल भार में 25-30 कि.ग्रा. तक होता है। इसके काये पकने पर दूध की भांति सफेद, रसदार एवं कोमल होते है।

पौध प्रवर्धन-

कटहल के पौधों को सामान्यतः बीज द्वार ही तैयार करें। पके हुये फलों से बीजों को निकालने के तुरंत बाद बुवाई कर दें। क्योंकि भंडारण के दौरान बीजों की अंकुरण क्षमता शीघ्रता से हा्रस होता है। बीजों को बोने से पहले एन.एन.ए के 24 मि.ग्रा/ली. पानी के घोल 24 घंटे तक डुबा करे रखने के उपरांत बुवाई करने पर अच्छा अंकुरण प्राप्त होता है। पौधे तैयार करने के लिये जिन प्रवर्धन विधियों का प्रयोग करें उनमे उष्मा चढ़ाना एवं भेट कलम प्रमुख विधियां है।

पौध रोपण- कटहल का पौध लगाने के लिये चयनित स्थल पर मई माह में रेखांन कर 10 मी. गुणा 10 मी. कतार से कतार 10 मी. गुणा 10 मी. पौधे से पौधे की दूरी पर 1 मी. लंबे, 1 मी. चौड़े एवं 1 मी.़ गहरे आकार के गड्ढ़ों को खुदाई कर कम से कम 15-20 दिन के लिये खुला छोड़ दें। ऐसा करने से सूर्य की तेज धूप से हानिकारक कीट एवं रोगाणु नष्ट हो जाता है। मई के अन्तिम सप्ताह या जून के प्रथम सप्ताह में इन गड्ढों को खेत की मिट्टी एवं गोबर की पकी हुई खाद के बराबर मात्रा में मिश्रण के साथ 500 ग्रा. सुपर फास्फेट एवं 500 ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश, एव ग्रा. एल्ड्रेक्स चूर्ण मिलाकर भरे। प्रत्येक गड्ढे में 3 किलो नीम की खली डाल दें।

पौध रोपण का उत्तम समय वर्षा ऋतु का होता है अर्थात् जुलाई, अगस्त, सितम्बर महीने में रोपण करें। पौधों को वर्षा ऋतु के आरंभ में ही लगा दें। कटहल के पौधे प्रारंभिक अवस्था में अधिक मरते है क्योंकि स्थांतरण एवं रोपण के दौरान जड़ों की हुई क्षति को पूरा नहीं कर पाते है। अतः बीजों की सीधी कटाई करें। इसके लिये कटहल के बीजों को उचित स्थान पर तैयार किये गड्डों में बुवाई करे। जिससे 2-3 प्रारंभिक अवस्था मृत्यु दर कम हो जायेगा।

अंकुरण उपरांत पौधे के विकसित होने पर स्वस्थ पौधें को पॉलिथिन में तैयार कर रोपण करें। पौध रोपण के बाद मिट्टी को अच्छी तरह से दबा दें एवं वर्षा न होन कि स्थिति में रोपण के उपरोक्त सिंचाई करें। पौधों के रोपण के बाद नियमित देखभाल करें। यदि रोपण के दौरान मिट्टी चटकने से दरारें पड़ती हैं तो तो हल्की गुड़ाई कर इन दरारों को बंद कर दें।

खाद एवं उर्वरक

कटहल के पेड़ में अच्छी पैदावार के लिए पौधे को खाद एवं उर्वरक पर्याप्त मात्रा में देना चाहिए। प्रत्येक पौधे को 20-25 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी हुई खाद 100 ग्रा. यूरिया 200 ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 100 ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति वर्ष की दर से जुलाई माह में देना चाहिए। खाद एवं उर्वरक देने के लिए पौधे के क्षेत्र के नीचे मुख्य तने से लगभग 1.2 मी. दूरी पर गोलाई में 25-30 से.मी. गहरी खाई में खाद के मिश्रण को डालकर मिट्टी से ढक देना चाहिए।

 

पुष्पण एवं फलन –

कटहल पर नर एवं मादा पुष्पक्रम एक ही पेड़ पर परन्तु अलग.अलग स्थानों पर आते हैं। नर फूल जिसकी सतह अपेक्षाकृत चिकनी होती है। नवम्बर.दिसम्बर में पेड़ की पतली शाखाओं पर आते हैं। ये फूल कुछ समय बाद गिर जाते हैं। मादा फूल मुख्य तने एवं मोटी डालियों पर जनवरी.फरवरी में आते है। कटहल एक परपरागित फल है जिसमें परागण समकालीन नर पुष्प से ही होता है। यदि मादा फूल में समान परागण नहीं होता है तो फल विकास सामान्य नहीं होता है। परागण के पश्चात पुष्पक्रम का आधार एवं अंडाशय एक साथ विकसित होकर संयुक्त फल का विकास होता है। फल जनवरी.फरवरी से जून.जुलाई तक विकसित होते रहते हैं। इसी समय में फल के अंदर बीज का विकास होता है और अंतः जून.जुलाई में फल पकने लगते हैं।

 

परिपक्वता एवं उपज –

कटहल के फलों का मध्यम उम्र के फल जिसे सब्जी के लिए प्रयोग किया जाता है। उस समय तोड़ना चाहिए जब उसके डंठल का रंग गहरा हरा एवं गूदा कठोर और कोर मुलायम हो। इसके साथ.साथ बाजार में मांग के आधार पर तोड़ाई को नियंत्रित कर सकते हैं। कटहल के पूर्ण विकसित फल पेड़ पर एवं तोड़ने के बाद भी पकते हैं। अतः ताजा फल खाने के लिए फलों को पूर्ण परिपक्वता पर तोड़ना चाहिए। साधारणतः फल लगने के 100-120 दिनों बाद तोड़ने लायक हो जाते कटहल के कच्चे फल को छड़ी से मारने पर खट-खट एवं पके फल से धब-धब की आवाज आती है। फलों को किसी तेज चाकू से लगभग 10 सें.मी. डंठल के साथ तोड़ने से दूध का बहाव कम हो जाता है। तोड़ते समय फलों के सीधा जमीन पर गिरने से फल फट जाते है इसलिए फल के वृंत को रस्सी से बांध कर धीरे.धीरे नीचे सावधानीपूर्वक उतार कर किसी छायादार स्थान पर रखना चाहिए। फलों के आपस में रगड़ से छिलके के भूरे होने का भय रहता है जिससे फल की गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। कटहल के बीज पौधे में 7-8 वर्ष में फलन प्रारम्भ होता है जबकि कमली पौधों में 4-5 वर्ष में ही फल मिलने लगते है। रोपण के 15 वर्ष बाद पौधा पूर्ण विकसित हो जाता है।

कीट रोग एवं नियंत्रण-

तना छेदक- पिल्लू कीट कटहल के मोटे तने एवं डालियों में छेद बनाकर नुकसान पहुँचाते हैं। इस अवस्था में मोटी.मोटी शाखायें सूख जाती हैं एवं फसल को प्रभावित करती है। इसके नियंत्रण के लिए छिद्र को किसी पतले तार से साफ करके घोल को 10 मि.ली. अथवा पेट्रोल या किरोसिन तेल के चार.पाँच बूंद रुई में डालकर गीली चिकनी मिट्टी से बंद कर दें। इस प्रकार वाष्पीकृत गंध के प्रभाव से पिल्लू मर जातें हैं।
गुलाबी धब्बा-इस रोग के कारण पत्तियों को निचली सतह पर गुलाबी रंग का धब्बा बन जाता है जिससे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होती है और फल विकास सुचारू रूप से नहीं हो पाता।

फल सड़न रोग

डंठल के पास से धीरे.धीरे सड़ने लगते हैं। यह रोग राइजोपस आर्टोकार्पी नामक फफूंद के कारण होता है जिसमें नवजात फल कभी.कभी विकसित फल को भी सड़ते हुए देखा गया है। इसके नियंत्रण के लिए फल लगने के बाद लक्षण स्पष्ट होते। इसमें ब्लू कॉपर के 0.3 मि.मी’ घोल का दो छिड़काव 15-20 दिनों के अंतराल पर करें।

 

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