आलूबुखारा की खेती कैसे होती है इसे जाने जिससे आप की आय दुगनी हो जाये

आलूबुखारा उत्तराखण्ड, कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा में प्रमुख रूप से की जाती है इसे आलूबुखारा को प्लम और अलूचा प्लम की खेती के नाम से भी जानते है। कुछ प्रजातिया उप-पर्वतीय तथा उत्तरी पश्चिमी मैदानी भागों में भी पैदा की जाती है।

प्लम की खेती हमारे देश में यूरोपीय लोगो के आने के बाद प्रारम्भ हुई प्रमुख रूप से आलूबुखारा या प्लम दो प्रकार के होते है इसकी खेती यूरोप और जापान में भी किया जाता है। इनका प्रयोग आयुर्वेदिक तौर पर भी किया जाता है इससे तैयार तरल को पीलिये और गर्मियों में होने वाली ऐलर्जी से बचाने के लिए भी प्रयोग किया जाता है। आलूबुखारा एक स्वास्थवर्धक रसदार फल है इसमें मुख्य लवण, विटामिन, प्रोटीन, कार्वोहाडट्रेट आदि प्रचुर मात्रा में पाये जाते है इसमें विटामिन ए,बी, थाइआमीन, राइबोफ्लेविनक, साथ-साथ पौष्टिक तत्व जैसे कि कैल्शियम फास्फोरस और लोहे की भरपूर मात्रा होती है इसमें खट्टेपन और मीठे की मात्रा अच्छी तरह से मिली होने के कारण यह उत्पाद बनाने जैसे कि जैम, स्क्वेश भी बनाया जाता है। बीज में पाये जाने वाले 40 से 50 प्रतिशत तेल का उपयोग सौन्दर्य प्रसाधनों में दवा के रूप में प्रयुक्त होता है।

आलूबुखारा की खेती कैसे होती है- aloo bukhara ki kheti kaise kare

मिट्टी-

आलूबुखारा की खेती पर्वतीय आंचल और मैदानी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जाती है इसका पेड़ लगाने के दो वर्ष बाद ही फूलना-फलना आरम्भ कर देता है और अधिक परिपक्वता के साथ साथ इसके पौधे से काफी अधिक उपज मिलती है। इसको बहुत किस्म की मिट्टी जैसे कि घनी उपजाऊ बढ़िया निकास वाली दोमट मिट्टी जिसका पी.एच 5.5-6.5 हो में उगाया जा सकता है।

किस्में –

इसके फल बाकी की किस्मों से बढ़े होता है इस किस्म की पैदावार काला अमृतसरी किस्म से कम होती है इसके फलों का छिलका पीला होता है और बीच में लाल धब्बे होते हैं।

फंटीयर-

इसका छिलका गहरा लाल बैंगनी गूदा गहरे लाल रंग काए मीठा स्वादिष्ट, सख्त एक समान मीठा सुगन्धित गुठली से अलग होने वाला फल भण्डारण की अधिक क्षमता तथा जून के अन्तिम सप्ताह तक पककर तैयार हो जाता है।

टैरूल-

फल मध्यम से बड़े आकार के गोल पीले रंग के व लालिमा लिए हुए गूदा पीला पिघलने वाला समान रूप से मीठा अच्छी सुगन्ध वालाए गुठली से चिपका हुआ जुलाई के दूसरे सप्ताह में पकने वालाए पौधे अधिक पैदावार देने वाले होते है।

सतलुज परर्पिल-

इस किस्म के फलों का आकार बढ़ा और भार 25-30 ग्राम होता है इसकी बाहरी परत मोटी और बीच वाली परत पीली बिंदियों वाली होती हैं आम-तौर पर इसके ताजे फल खाये जाते है। यह मई के शुरू में पक जाती है और इसकी औसतन पैदावार 35-40 किलो प्रति वृक्ष होती है।

काला अमृतसरी –

यह इसके फल स्वाद में हल्के खट्टे होते है फल मई के दूसरे पखवाड़े में पक जाते है इस किस्म के फल जैम और स्क्वेश बनाने के लिए प्रयोग किये जाते है।

ट्रेटोन –

इस किस्म से छोटी होती है इसके फल गुद्दा पीले रंग का और हल्का रसीला होता है इसकी औसतन पैदावार 30-35 किलो प्रति वृक्ष होती है।

कटरउचका –

यह औसतन पैदावार 45-50 किलो प्रति वृक्ष होती है इसके फल जैम, स्क्वेश आदि तैयार करने के लिए बढ़िया होता है।

जमीन की तैयारी-

खेत की दो बार तिरछी जोताई करें और फिर समतल करें। खेत को इस तरह तैयार करें कि उसमें पानी ना खड़ा रहे।

बिजाई-

जनवरी के पहले पखवाड़े में की जाती है। पौधों के बीच उचित फासला 15 गुणा 30 से.मी होना चाहिए। पौधों और पंक्तियों के बीच फासला 6 गुणा 6 मीटर होना चाहिए। बिजाई का ढंग इसके पौधों की सीधी बिजाई की जाती है।

 

बीज की मात्रा-

एक एकड़ 110 पौधों की जरूरत होती है।

प्रजनन-

कलम लगाने के बिना काला अमृतसरी की काट कर बिजाई करना भी सहायक सिद्ध होता है इस तरह करने के लिए तने का काटने वाला भाग दिसंबर के पहले हफ्ते तैयार हो जाता है और 30 दिनों तक तना पक जाने के बाद इसको जनवरी में 15गुणा30 से.मी क्षेत्र में लगाया जाता है।

खाद-

जब पौधा 1-2 वर्ष का होता है तो अच्छी तरह से गली हुई सड़ी गोबर की खाद 6-12 किलो यूरिया 60-120 ग्राम एस एस पी 95-120 ग्राम और पोटाश 60-120 ग्राम प्रति पौधे डालें। जब वृक्ष 3-4 वर्ष का होता है। तो अच्छी तरह से गली हुई सड़ी हुई खाद 18-24 किलो यूरिया 180-240 ग्राम एस एस पी 95-120 ग्राम , पोटाश 180-240 ग्राम पाधो में डालें।

खरपतवार नियंत्रण-

खरपतवार की रोकथाम के लिए ग्लाइफोसेट 320 मि.ली. प्रति एकड़ डालें।

सिंचाई-

अप्रैल, मई और जून महीने में एक हफ्ते के फासले पर सिंचाई करें। बारिश के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है सितंबर, अक्तूबर और नवंबर महीने में 20 दिनों के फासले पर सिंचाई करें।

पौधे की देखभाल बीमारीयां और रोकथाम –

भूरे गलन रोगयफंगस यह बीमारी से फलों पर भूरे रंग के पाउडर जैसा पदार्थ बन जाता है फल सिकुड़ कर गल जाते है। रोकथाम हेतु पौधे को हवा लगने के लिए अच्छी तरह से कांट-छांट करें नीचे गिरे हुए फलों को हटा के नष्ट कर दें फल निकलने से पहले सल्फर की स्प्रे करें ।

काली गांठे –

इस बीमारी के साथ नई शाखाएं और किनारों पर 1 से 30 से.मी. के आकार की धुंए जैसे काली गांठे पड़ जाती है। इस बीमारी से बचन के लिये पौधो में गांठों को छांट दें।
भुंडी कीट और रोकथाम इसके हमले से फल पर चपटाकर धब्बे पड़ जाते है और फल जल्दी टूट कर गिर जाते है। गिरे हुए फलों को लगातार उठाते रहें जब पत्ते गिरने शुरू हो तो हर रोज पौधे के नीचे एक शीट बिछाये और वृक्ष के तने पर मोटे डंडे से मारे शीट पर गिरी हुई भुंडीयों को इक्क्ठा करके नष्ट कर दें ।

आलूचे का पत्ता मरोड़ चेपा इसके हमले से पत्ते और नई शाखाएं मुड़ जाती है और इनका विकास रुक जाता है इन पर छोटे और चिपकने वाले कीट मौजूद रहते है रोकथाम हेतु अंडे देने से पहले ही बागबानी तेल की स्प्रे या नीम अर्क डालें।

फसल की कटाई-

पके फलों को कई सारी तुड़ाइयां करके इक्क्ठा किया जा सकता है फिर उसके बाद पैक करे। बाजार में विपणन के लिये भेज दिया जाता है। कटाई के बाद यह फसल जल्दी खराब हो जाती है इसलिए इसको अच्छी तरह से पैक करके सही तापमान पर स्टोर कर देना चाहिए।

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