अंगूर खेती कर अधिक आमदनी लें!!

अंगूर की खेती उपोष्ण कटिबंध जगहों पर भी किया जा सकता है। भारत में लगभग 620 ई.र्पू. ही उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में अंगूर को व्यवसायिक खेती एक लाभकारी व्यवसाय के रूप में विकसित हो चुकी थी। लेकिन उत्तरी भारत में व्यवसायिक उत्पादन धीरे-धीरे बहुत देर से शुरू हुआ। उत्तर भारत में आज अंगूर एक महत्वपूर्ण फल के रूप में अपना स्थान बना लिया है और कई राज्यों में अंगूर की खेती बहुत तेजी से बढ़ता जा रहा है। जैसे- पंजाब, राजस्थान, दिल्ली, एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश आदि है तथा जिसके परिणाम स्वरूप भारत में अंगूर की खेती उत्पादन एवं उत्पादकता क्षेत्रफल में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि होती जा रही है।
अंगूर के फल का उपयोग – जैसें कि अंगूर एक स्वास्थवर्धक एवं स्वादिष्ट फल है। अंगूर को अधिकतर ताजा ही खाया जाता है और इसका कई उपयोग में लाया जाता है। जैसे- किशमिश, शराब आदि भी बनाया जाता है।

अंगूर खेती करने के जैविक तरीके – Grapes grapes farming and cultivation in Hindi

अंगूर की खेती के लिये मिट्टी तथा जलवायु कैसा हो –

अंगूर की खेती के लिये रेतीली, टोमट मिट्टी की आवश्यकता होता है तथा इसके खेत में जल का निकास अच्छे से होना चाहिए। ज्यादा चिकनी मिट्टी में अंगूर की खेती न करे तो अच्छा ही होगा। अंगूर लवणता के प्रति कुछ हद तक सहिष्णु है। इसकी जड़े काफी मजबूत होती है। इसकी खेती के लिये गर्म एवं शुष्क तथा दीर्घ ग्रीष्म ऋतु अनुकूल रहती है। यदि अंगूर के पकते समय वर्षा या बादल हो जाती है तो यह हानिकारक है तथा इसके कारण दाने फट जाते है और फलों की गुणवत्त पर बहुत बुरा असर डालते है।

अंगूर की खेती के लिये प्रजातियां-

पूसा सीडलेस- इस किस्म के अंगूर जून के तीसरे सप्ताह में पकना शुरू होता है। यह पकने पर हरे पीले और सुनहरे हो जाते है। फल खाने के अतिरिक्त अच्छी किशमिश के लिये उपयुक्त होता है। इनके फल छोटे तथा अंडाकार होता है।

पूसा नवरंग –

यह शीघ्र पकने वाली काफी उपज देने वाली किस्में है। इनके गुच्छे मध्यम आकार के होते है तथा फल बीज रहित होते है। यह मंदिरा बनाने के लिये उपयुक्त होता है।

परलेट –

परलेट अंगूर उत्तरी भारत में शीघ्र पकने वाली प्रजातियों में से एक है। इसके गुच्छे थोड़ा छोटे-छोटे अविकसित फलो का होना मुख्य समस्या है तथा इसकी फली गठीले होते है और यह सफेदी लिये गोलकार आकार के होते है। इसके फल अधिक फलदायी और ओजस्वी होते है।

ब्यूटी सीडलेस –

इस किस्मों के फल वर्षा शुरू होने से पहले मई के अंत तक पकने वाली होती है तथा यह गुच्छे में बड़े और लम्बे, गठीले वाले होते है। इसका फल मध्यम आकर का गोलाकर बीज रहित एवं काले रंग के होते है। इसमें लगभग 17-18 घुलनशील ठोस तत्व पाये जाते है।

अंगूर का कटिंग का कलम मुख्यतः

जनवरी महिने में किया जाता है। सदैव कलम परिपक्व टहनियों से लिये जाने चाहिए। मुख्यतः इसे 4-6 गांठों वाली 23-45 से.मी. लंबे कलमें ली जाती है। ध्यान रखनें वाली बात कलम का नीचे का कट गांठ के ठीक नीचे होना चाहिए एवं ऊपर का कट तिरछा होना चहिए। इन कलमों को अच्छी प्रकार से तैयार की गयी तथा सतह से उंची क्यारियों में लगा देते है तथा एक वर्ष पुरानी जड़युक्त कलमों को जनवरी माह में नर्सरी से निकल कर खेत में रोपित कर देते हैं।

बेल पौध की रोपाई –

रोपाई से पहले मिट्टी की जांच अवश्य करवाये तथा खेत को भलीभांति तैयार कर लें। इस प्रकार का सभी चीजों को ध्यान में रख कर 90 गुणा 90 से.मी. आकर के गढडे खोदने के बाद इन्हे 1-2 भाग मिट्टी, 1-2 भाग गोबर की सड़ी हुई खाद एवं 30 ग्रा. क्लोरिपाईरीफास 1 कि.ग्रा. सुपर फास्फेट एवं 500 ग्रा. पोटेशीयम सल्फेट आदि को अच्छी तहर मिलाकर भर दें। इसके बार तुरंत पानी दें।

बेलों की छंटाई –

अंगूर के बेल पौधों से अच्छी फसल लेने के लिये इसकी छांट एवं काट करना आवश्यक होता है। बेल के पौधो को उचित आकार देने के लिये इसके अनचाहे भाग को काटने के आवश्यक है। बेल में फल लगने वाली शाखाओं को सामान्य रूप से वितरण हेतु किसी भी हिस्से की छंटनी करनी चाहिए।

छंटाई –

कोंपले फूटने से पहले इसकी छटाई जनवरी माह में करना चाहिए। बेलो को लगातार अच्छी फसल लेने के लिये उचित समय पर कांट-छांट करना चाहिए।

सिंचाइ की व्यवस्था-

सिंचाई की आवश्यकता नवम्बर-दिसम्बर में खास नहीं होती है। क्यों कि इस मौसम में बेल सुसुप्ता अवस्था में होता है। सिंचाई की आवश्यक मार्च से मई में पड़ती है। इस अवस्था में फूल और फल आने लगते है। क्यों कि इस दौरान अगर पानी की कमी हो गई तो उत्पादन पर इसका बुरा असर पड़ता है। तापमान तथा पर्यावरण स्थितियों को ध्यान में रखते हुए 7-10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए तथा फल पकने की प्रक्रिया शुरू होते ही पानी बंद कर देना चाहिए यद्पि फल फट एवं सड़ सकते है। फलों की तुड़ाई के बाद भी एक सिंचाई अवश्य कर देना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक –

अंगूर की मिट्टी में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। अतः मिट्टी की उर्वरता बनाये रखने के लिये खाद एवं उर्वरकों की आवश्यकता होती है। अच्छी गुणवता वाले फसल लेने के लिये। 3 से 3 गुणा की दुरी पर फसल लगाई जाने चाहिए। अंगूर की फसल 5 वर्ष से ऊपर हो तो 5000 ग्रा. नाइट्रोजन 700 ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश 700 ग्रा. पोटाश सल्फेट तथा 50-60 कि.ग्रा. गोबर की खाद की आवश्यकता होती है।

खाद को कैसे दें –

जनवरी के अंतिम सप्ताह बाद छंटाई के तुरंत देना चाहिए। इसमें नाइट्रोजन एवं पोटाश तथा फास्फोरस की देना चाहिए और शेष मात्रा फल लगने के बाद दें। खाद एवं उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तंुरत सिंचाई करें। खाद को मुख्य तने से दूर 15-20 से.मी गहराई में डाले।

कैसे करें फल गुणवत्ता में सुधार –

अंगूर की अच्छी किस्में लगाने चाहिए। जिसमें गुच्छे मध्यम आकर से बड़े तथा बीज रहित एवं विशिष्ट रंग, खुशबू, स्वाद के होने चाहिए। यह सामान्यतः किस्म विशेष पर निर्भर करती है।

छल्ला विधि-

छाला विधि तकनीक में बेल के किसी भाग एवं शाखा तथा उपशाखा या तना से 0.5 से.मी. चैड़ाई की छाल छल्ले के रूप में उतार ली जाती है। अधिक फल लेने के लिये फूल खिलने के एक सप्ताह पहले फल के आकर में सुधार लाने के लिये फल लगने के तुरंत बाद और बेहतर आकर्षक रंग के लिये फल पकना शुरू होने के समय छाल उतारनी चाहिए। आमतौर पर छाल मुख्य पर 0.5 से.मी. चैडी फल लगते ही तुरंत उतारनी चाहिए।

पौधे के वृद्धि का उपयोग कैसे करें –

बीज रहित किस्मों में जिब्बरेलिक एसिड का प्रयोग करने से दानो का आकर दो गुना होता है। पूसा सीडलेस किस्म में पुरे फूल आने पर 45 पी.पी.एम 450 मि.ग्रा. प्रति 10 ली. पानी में ब्यूटी सीडलेस बने आधा फूल खिलने पर 45 पी.पी.एम एवं परलेट किस्म में भी आधे फूल खिलने पर 30 पी.पी.एम का प्रयोग करना चाहिए। जिब्बरेलिक एसिड के घोल का या तो छिडकाव किया जाता है या फिर गुच्छों को आधे मिनट तक इस घोल में डुबाया जाता है। यदि गुच्छों को 500 पी.पी.एम. मि.ली प्रति 10 लीटर पानी में इथेफोन में डुबाया जाये तो फलों में अम्लता की कमी आती है। फल जल्दी पकते हैं एवं रंगीन किस्मों में दानों पर रंग में सुधार आता है।

फल तुड़ाई एवं उत्पादन-

अंगूर तोड़ने के पश्चात् पकते नहीं हैं। अतः जब खाने योग्य हो जाये अथवा बाजार में बेचना हो तो उसी समय तोड़ना चाहिए। शर्करा में वृद्धि एवं तथा अम्लता में कमी होना फल पकने के लक्षण हैं। फलों की तुडाई प्रातः काल या सायंकाल में करनी चाहिए। पैकिंग के पूर्व गुच्छों से टूटे एवं गले सड़े दानों को निकाल दें। अंगूर के अच्छे रख-रखाव वाले बाग से तीन वर्ष पश्चात् फल मिलना शुरू हो जाते है।

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