सौंफ की खेती मुनाफे का फसल

भारत वर्ष में सौंफ की खेती कई राज्यों में की जाती है। जो मासले के एक प्रमुख फसल है। इसका उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। यह ठंड ऋतु में बोयी जाती है। लेकिन सौंफ खासतौर पर फूल आने के समय पाले से प्रभावित होती है। इसलिये इसका विषेश ध्यान रखना चाहिए। शुष्क एवं सामान्य ठंडा मौसम विशेषकर जनवरी से मार्च तक इसकी उपज व गुणवत्ता के लिये बहुत ही लाभदायक रहता है। फूल आते समय लम्बे समय तक अधिक बादल या अधिक नमी से बीमारियों का प्रकोप को बढावा मिलता है।

सौंफ की लाभदायक खेती | सौंफ़ की उन्नत खेती करने का तरीका | Sounf ki Labhdayak Kheti |

भूमि एवं खेत की तैयारी कैसे करे –

सौंफ की खेती बलुई मिट्टी को छोड़कर प्रायः सभी प्रकार की भूमि में, जिसमें जीवांश पर्याप्त मात्रा में हो, की जा सकती है लेकिन अच्छी पैदावार के लिये जल निकास की पर्याप्त सुविधा वाली चूनायुक्त, टोमट व काली मिट्टी इसकी पैदावार के लिये उपयुक्त होती है। भारी एवं चिकनी मिट्टी की अपेक्षा दोमट मिट्टी अधिक अच्छी रहती है।

अच्छी तरह से जुताई करके 15-20 सेटीमीटर गहराई तक खेत की मिट्टी को मुलायम करके भुरभरी बना लेना चाहिए। खेती की तैयारी के समय पर्याप्त नमी न हो तो पलेवा देकर खेत की तैयारी करनी चाहिए।

खाद एवं उवर्रक – (Fennel cultivation Farming Information in Hindi)

मिट्टी में पर्याप्त जैविक पदार्थ को होना आवश्यक है। यदि इसकी उपयुक्त मात्रा भूमि में न हो तो 10-15 टन प्रति हेक्. अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद खेत की तैयारी से पहले डाल देना चाहिए।

इसके अतिरिक्त 90 कि.ग्रा. नत्रजन एवं 40 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हेक्. के हिसाब से देना चाहिए। 30 कि.ग्रा. नत्रजन एवं फास्फोरस की सम्पूर्ण मात्रा बुवाई के समय छिड़काव करना चाहिए। शेष नत्रजन को दो भागों में बांट कर 30 कि.लो. ग्रा. बुवाई के 45 दिन एवं शेष 30 कि.ग्रा. नत्रजन फूल आने के समय फसल की सिंचाई के साथ दें।

बीज की मात्रा व बुवाई –

सौंफ के लिये 8-10 कि.ग्रा. स्वस्थ बीज प्रति हेक्. बुवाई हेतु पर्याप्त होता है। बुवाई अधिकतर छिटकवां विधि से की जाती है तथा निर्धारित बीज की मात्रा, एक समान छिड़क कर हल्की दताली चलाकर या हाथ से मिट्टी में मिला देते है। लेकिन सौंफ की बुवाई रोपण विधि द्वारा सीधे कतारों में भी की जाती है। सीधी बुवाई के लिये 8 से 10 कि.ग्रा. बीज रोपण विधि से 3-4 कि.ग्रा. बीज प्रति हेक्. की आवश्यकता होती है। पौधों को पौधशाला से सावधानी पूर्वक उठाये जिससे जड़ों को नुकसान नहीं हो। रोपण दोपहर बाद या गर्मी कम हो तब करें तथा रोपण के बाद तुरंत सिंचाई करें। सीधी बुवाई में, बुवाई के समय 7-8 दिन बाद दूसरी हल्की सिंचाई करे जिससे अंकुरण पूर्ण हो जाये।

बीजोपचार –

बीजोपचार हेतु बुवाई के पूर्व बीज को कार्बेण्डेजिम 2 ग्रा. प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करे।

बुवाई के समय –

इसकी बुवाई का उपयुक्त समय मध्य सितम्बर है।

सिंचाई –

सौंफ को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है। बुवाई के समय खेत में नमी कम हो तो बुवाई के तीन चार दिन बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए। जिससे बीज उग जाये। सिंचाई करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि पानी का बहाव तेज न हो अन्यथा बीज बह कर किनारों पर इकट्ठे हो जायेंगा। दूसरी सिंचाई बुवाई के 12-15 दिन बाद करनी चाहिए। जिससे बीजों का अंकुरण पूर्ण हो जाये। इसके बाद सर्दियों में 15-20 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए। फूल आने के बाद फसल को पानी की कमी नहीं होनी चाहिए।

निराई-गुड़ाई –

सौंफ के पौधे जब 8-10 से.मी. के हो जाये तब गुड़ाई करके खरपतवार निकाल दे। गुड़ाई करते समय जहां पौधे अधिक हो वहां से कमजोर पौधों को निकालकर पौधे से पौधे की दूरी 20 से.मी. कर दे। जिससे बढ़वार अच्छी हो। इसके बाद समय-समय पर आवश्कतानुसार खरपतवार निकालते रहें। खरपतवार नियंत्रण हेतु 1.0 कि.ग्रा. पेंडामिथेलिन सक्रिय तत्व 3.33 ली. प्रति हेक् 4.5 मिली ली प्रति ली. पानी तथा 750 ली. पानी में घोककर बुवाई के 1-2 दिन बाद छिड़काव करके भी खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है।

मुख्य कीट एवं व्याधियां –

मोयला, पर्णजीवी एवं मकड़ी –

मोयला कीट कोमल भाग से रस चूसता है तथा फसल को काफी नुकसान पहुंचाता है। थ्रिप्स कीट बहुत छोटे आकार का होता है तथा कोमल एवं नई पत्तियों से हरा पदार्थ खुरचकर खाता है। जिससे पत्तियों पर धब्बे दिखाई देने लगते है तथा पत्ते पीले होकर सूख जाते है। मकड़ी छोटे आकार का कीट है जो पत्तियों पर घूमता रहता है व रस चूसता है जिससे पौधा पीला पड़ जाता है।
नियंत्रण हेतु – डाईमिथॉइट 30 ई.सी. या मैलाथियॉन 50 ई.सी एक मिली.ली. प्रति ली. पानी के हिसाब से छिड़काव 15-20 दिन बाद दोहरायें।

छाछ्या (पाउडरी मिल्ड्यू) –

इस रोग के लगने पर शुरू में पत्तियां एवं टहनियों पर सफेद चूर्ण दिखाई देता है, जो बाद में सम्पूर्ण पौधे पर फैल जाता है। इसके नियंत्रण हेतु 20-25 कि.ग्रा. प्रति हेक्. की दर से गंधक के चूर्ण का भुरकाव करना चाहिए। आवश्कतानुसार 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

जड़ व तना गलन –

इस रोग के प्रकोप से तना नीचे से मुलायम हो जाता है व जड़ गल जाती है। जड़ो पर छोटे बड़े काले रंग के स्कलेरोशिया दिखाई देता है। नियंत्रण हेतु बुवाई से पूर्व बीज को कार्बेण्डेजिम 2 ग्रा. प्रति किलो को बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करनी चाहिए या कैप्टान 2 ग्रा. प्रति ली. पानी के हिसाब से भूमि में उचारित करनी चाहिए।

कटाई –

सौंफ के दाने गुच्छों में आते हैं व एक ही पौधे के सब गुच्छे एक साथ नहीं पकते हैं अतः कटाई एक साथ नहीं हो सकती है जैसे ही दानों का रंग हरे से पीला होने लगे गुच्छों को तोड़ लेना चाहिए। सौंफ की उत्तम पैदावार के लिये फसल को अधिक पकाकर पीला नहीं पड़ने देना चाहिए। सुखाते समय बार-बार पलटते रहना चाहिए तथा फंफूद लगने की संभावा रहती है। जब दानों का आकार पूर्ण विकसित हो तभी इनकी कटाई करनी चाहिए।

उपज –

सौंफ की अच्छी तरह से खेती की जाये तो 10-15 क्टि. प्रति हेक्. तक पूर्ण विकसित एवं हरे दाने वाली सौंफ की उपज प्राप्त की जा सकती है। साधारणता 5-7.5 प्रति हेक्. महीन किस्म की सौंफ आसानी से पैदा की जा सकती है।

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