क्या होता है फसल चक्र और इसके फायदे

फसल चक्र और इसके फायदे

“फसल चक्र अपना कर किसान भाई अपनी मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ा सकता तथा पौधे कीट बीमारियों से निजात पा सकते है”

फसल चक्र या सस्य चक्र (क्राप रोटेशन) विभिन्न फसलों को किसी निश्चित क्षेत्र पर, एक निश्चित क्रम से किसी निश्चित समय में बोने को फसल चक्र कहते है। इसका उद्देश्य पौधों के भोज्य तत्वों का सदुपयोग तथा भूमि की भौतिक, रासायनिक तथा जैविक दशाओं में संतुलन स्थापित करना है। इस विधि के अन्तर्गत एक विशेष खेत में नियमित सांचे व श्रेणी के अन्दर उगने वाली वार्षिक और द्विवार्षिक फसलों की जातियों और कुलों को आपस में बदल दिया जाता है। ऐसा करने से खरपतवार बीमारियां व कीटों का चक्र टूट जाता हैं। मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है तथा मृदा में कार्बनिक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती हैं। लगातार एक ही जगह एक ही फसल को उगाने से पादप बीमारियों एवं कीट पंतगों को बढ़ावा मिलता है जिसके कारण फसल नष्ट हो जाती है। फसल चक्र अपनाकर हम इस समस्या पर बिना किसी रासायन का प्रयोग किये ही काबू पा सकते है।
फसल चक्र से लाभ:

1. पोषक तत्वों का समान व्यय-फसलों की जडें गहराई तथा फैलाव में विभिन्न प्रकार की होती हैं, अतः गहरी तथा उथली जड़ वाली फसलों के क्रमशः बोने से पोषक तत्वों का व्यय विभिन्न गहराइयों पर समान होता है, जैसे गेहूं, कपास।

 
2. पोषक तत्वों का संतुलन-विभिन्न पौधे नाइट्रोजन, फाॅस्फोरस, पोटाश तथा अन्य पोषक तत्व भिन्न भिन्न मात्राओं में लेते हैं। सस्यचक्र द्वारा इनका पारस्परिक संतुलन बना रहता है। एक ही फसल निरंतर बोने से अधिक प्रयुक्त होने वाले पोषक तत्वों की भूमि में शून्यता हो जाती है।
3. हानिकारक कीटाणुं रोग तथा घासपात की रोकथाम एक फसल अथवा उसी जाति की अन्य फसलें, लगातार बोने से उनके हानिकारक कीड़े, रोग तथा साथ उगने वाली खरपतवार उस खेत में बनी रहती है।
4. श्रम, आय तथा व्यय का संतुलन, एक बार किसी फसल के लिए अच्छी तैयारी करने पर दूसरी फसल बिना विशेष तैयारी के ली जा सकती है और अधिक खाद चाहने वाली फसल को पर्याप्त मात्रा में खाद को देकर, शेष खाद पर अन्य फसलें लाभ के साथ ली जा सकती है, जैसे- आलू, के पश्चात् प्याज या कद्दूवर्गीय आदि।
5. भूमि में कार्बनिक पदार्थों की पूर्ति निराई-गुड़ाई चाहने वाली फसलें- आलू, प्याज आदि बोने से भूमि में जैव पदार्थों की कमी हो जाती है। इनकी पूर्ति दलहन वर्ग की फसलांे तथा हरी खाद के प्रयोग से हो जाती है।
6. अल्पकालीन फसलें बोना- मुख्य फसलों के बीच अल्कालीन फसलें बोयी जा सकती है, जैसे मूली, पालक, चुकन्दर, मूंग-1, आदि।
7. भूमि में नाइट्रोजन की पूर्ति-दलहन वर्ग की फसलों को जैसे सनई, ढैंचा, मूंग इत्यादि भूमि में तीन या चार वर्ष में एक बार जोत देने से न केवल कार्बनिक पदार्थ ही मिलते हैं अपितु नाइट्रोजन भी मिलता है, क्योंकि इनकी जड़ की छोटी-छोटी गांठों में नाइट्रोजन स्थापित करने वाले जीवाणुं होते हैं।
8. घासपात (खरपतवार) की सफाई-निराई-गुड़ाई चाहने वाली फसलों के बोने से खरपतवार का सफाया अपने आप हो जाता है।
9. कटाव से बचत उचित फसल चक्र से वर्षा के जल से भूमि का कटाव रूक जाता है तथा खाद्य पदार्थ बहने से बच जाते है।
10. समय का सदुपयोग इससे कृषि कार्य उत्तम ढंग से होता है। खेत एवं किसान व्यर्थ खाली नहीं रहते है।
11. भूमि के विषैले पदार्थों से बचाव फसलें जड़ों से कुछ विषैला पदार्थ भूमि में छोड़ती हैं। एक ही फसल बोने से भूमि में विषैले पदार्थ अधिक मात्रा में एकत्रित होने के कारण हानि पहुंचाते है।
12. अधिक उपज- उपर्युक्त कारणों से फसल की उपज प्रायः अधिक हो जाती है।
फसल चक्र के सिद्धान्त

फसल चक्र निर्धारण से पूर्व किसान को अपनी भूमि की किस्म फसल, किस्म दैनिक आवश्यकताऐं, लागत का स्वरूप तथा भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाये रखने के उद्देश्य को ध्यान में रखना चाहिए। अतः फसल चक्र अपनाते समय निम्न सिद्धान्तों का अनुसरण करना चाहिए।
1. दलहनी फसलों के बाद खाद्यान्न फसलें बोयी जायें।, दलहनी फसलों की जड़ों में ग्रंथियां पायी जाती है जिनमें राइजोबियम जीवाणुं पाये जाते है। हीमोग्लोबिन की उपस्थिति से ये वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती है।
उदाहारण के लिए चना मक्का, अरहर गेहूं, मेथी कपास, मूंग गेहूं, लोबिया ज्वार आदि। इस हेतु रबी खरीफ या जायद में से किसी भी ऋतु में दलहनी फसल अवश्य लेना चाहिए।
2. गहरी जड़ वाली फसल के बाद उथली जड़ वाली फसल लगानी चाहिए इसके विपरीत ऐसा करने से मिट्टी की विभिन्न परतों में पोषक तत्वों, पानी एवं लवणों का समुचित उपयोग हो जाता है। जैसे कपास मेथी, अरहर गेहूं, चना धान आदि।
3. अधिक पानी चाहने वाली फसल के बाद कम पाीन चाहने वाली फसल मृदा में पानी एवं वायु का घनिष्ट सम्बन्ध होता है और किसी एक की मात्रा कम होने पर इसी अनुपात में दूसरे अवयव की मात्रा बढ़ जाती है। खेत में लगातार अधिक पानी चाहने वाली फसलें उगाते रहने से मृदा जल स्तर ऊपर आ जायेगा। पौधों की जड़ों का विकास प्रभावित होता है एवं अन्य प्रतिकूल प्रभाव पड़ते है। अतः फसल चक्र में कम सिंचाई चाहने वाली फसल एवं अधिक सिंचाई चाहने वाली फसल को एक क्रम में उगाना चाहिए। जैसे गन्ना जौ, धान चना या मटर आदि।
4. अधिक पोषक तत्व चाहने वाली फसल के बाद कम पोषक तत्व चाहने वाली अधिक पोषक तत्व चाहने वाली फसलें लगातार बोने से उर्वरा की शक्ति का हा्रस हो जाता है एवं खेती की लागत बढ़ती चली जाती है। अतः अधिक वाली से कम पोषक तत्व चाहने वाली फसलें भी उगायें। जैसे आलू लोबिया, गन्ना गेहूं, आलू कददूवर्गीय ।
5. अधिक कर्षण क्रियायें परिष्करण या निराई-गुड़ाई चाहने वाली फसल के बाद कम कर्षण क्रियायें चाहने वाली फसल उगाना इस प्रकार के फसल चक्र से मृदा की संरचना ठीक बनी रहती है एवं लागत में भी कमी आती है। निराई-गुड़ाई में उपयोग किये संसाधनों का दूसरों फसलों में उपयोग कर अधिक उत्पादन लिया जा सकता है जैसे मक्का चना, आलू प्याज, गन्ना मूंग।
6. दो तीन वर्ष के फसल चक्र में खेत को एक बार खाली या पड़ती छोड़ा जाये फसल चक्र में भूमि को पड़ती छोड़ने से भूमि का उर्वरता में हो रहे लगातार हा्रस से बचा जा सकता है तथा अधिक पोषक तत्व चाहने वाली फसल से पूर्व खेत को एक बार खाली अवश्य छोड़ना चाहिए। जैसे मक्का, गेहूं, मूंग, ज्वार, चना पडती गेहूं 3 वर्षीय फसल चक्र।
7. दूर-दूर पक्तियों में बोयी जाने वाली फसल के बाद घनी बोयी जाने वाली फसल उगानी चाहिए। वर्षा के दिनों में सघन एवं भूमि को आच्छादित करने वाली फसल लगाने से मृदा क्षरण कम होता है जबकि दूर-दूर पंक्तियों में बोयी गयी फसल से मिट्टी का कटाव अधिक होता है। अतः ऐसी फसलों का हेरफेर होना चाहिए जिससे मृदा कटाव एवं उर्वरता हा्रस को रोका जा सके। जैसे- सोयाबीन गेंहूं।
8. दो-तीन वर्ष के फसल चक्र में खरीफ में हरी खाद वाली फसल ली जायें इस प्रकार के फसल चक्र से भूमि की उर्वरा शक्ति बनी रहती है जो कि भूमि ये वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती है। हरी खाद के द्वारा भूमि में 40-50 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर स्थिर होती है। इसके लिए सनई, ढैंचा, मूंग, उर्द आदि फसलों का उपयोग किया जा सकता है।
9. फसल चक्र में साग- सब्जी वाली फसल का समसावेष होना चाहिए ऐसा आवश्यकता की पूर्ति होती रहती है। अतः इसके लिए खरीफ-रबी या जायद की फसलों में से एक फसल सब्जी वाली होनी चाहिए। जैसे – आलू, प्याज, बैंगन, टमाटर आदि।
10. फसल चक्र में तिलहनी फसल का समावेष होना चाहिए घर की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुये ऐसा फसल चक्र तैयार करना चाहिए जिसमंे एक फसल तेल वाली हो। जैसे सरसों, मूंगफली, तिल आदि।

11. एक ही प्रकार की बीमारियों से प्रभावित होने वाली फसलों को लगातार एक ही खेत में नहीं उगाना चाहिए फसलों का चक्र बढ़ जाता है। जिससे फसलों की हानि नहीं उठानी पड़ती है। अच्छे फसल चक्र अपनाने से फसलों को कई बीमारियों से बचाया जा सकता है जैसे कि चना एवं अरहर में उक्टा रोग की सही रोकथाम किसी खेत में 1-2 वर्ष के अन्तराल में लगाने से की जा सकती है।
12. फसल चक्र ऐसा होना चाहिए कि वर्ष भर उपलब्ध संसाधनों का समुचित उपयोग होता रहे फसल चक्र निर्धारण के समय यह ध्यान रखना चाहिए कि किसान के पास उपलब्ध संसाधनों जैसे भूमि श्रम पूंजी सिंचाई इत्यादि का वर्ष भर सदुपयोग होता रहे एवं किसान की आवश्यकताओं की पूर्ति फसल चक्र में समावेशित फसलों के द्वारा होती रहे।

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