जैविक मूली की बुवाई कर अच्छी कमाई करें

मूली भारत वर्ष में पैदा की जाती है। मूली भी गाजर की तरह जमीन के अन्दर पैदा की जाती है। मूली को स्लाद के रूप में और पत्तो को खाने योग्य लाया जाता है। मूल के बीज से तेल निकाला जाता है। ताजी मूली कई गुणों से भरपूर होती है। मूली अनेक खनिज पदार्थों की खान है। यह मनुष्य के अमृत समान है। मूली खाने से रक्त संचार भी ठीक से काम करता है साथ ही त्वचा के दाग-धब्बो को दूर करता है। इससे खाने से हाजमा सही होता है तथा शरीर में मौजूद विषक्त पदार्थ को बहार निकालता है। विटामिन ए मौजूद होने के कारण मूली आंखो के लिये बहुत फायदेमंद होता है। नियमित मूली खाने से वृद्धाअवस्था तक आंखों की रोशनी बनी रहती है।

जैविक मूली की खेती का तरीका – organic radish cultivation in Hindi

किस्में : (Types of Radish for Cultivation in Hindi)

जापानी व्हाईट- जडें सफेद, लम्बी, बेलनाकार, 60 दिनों में तैयार, औसत उपज 190-250 कि्ंवटल प्रति हेक्.।
चाईनिज पिंक – जडें गुलाबी, बेलनाकार, सफेद गूदा, लाल मुख्य धरी वाले लम्बे पत्ते 45 दिन में तैयार, औसत उपज 190-225 कि्ंवटल प्रति हेक्।
व्हाईट आइसीकल – अग्र भाग छोटा, जडें़ लम्बी नुकीली, छिलका सफेद, पतला व कोमल, गूदा सफेद, करारा और रसवाला, अच्छी अगेती किस्म, 30 दिन में तैयार, औसत उपज 50-60 कि्ंटल प्रति हेक्।
पूसा हिमानी – जडें 30 से 35 से.मी. लम्बी, मोटी, नुकीली सफेद, हरे शिखर वाली, गूदा शूद्ध सफेद, करारा मीठी गंध वाला परंतु थोड़ा तीखा, 55-60 दिन में तैयार, औसत उपज 225-250 कि्ंवटल प्रति हेक्.।
अन्तर 30 गुणा 7.5 से.मी.

खाद एवं उर्वरक (mooli ki kheti karne ka tarika)

मूली की अच्छी पैदावार के लिये 80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस तथा पोटाश 40 कि.ग्रा. की आवश्यकता पड़ती है। उपरोक्त तत्वों की पूर्ति के लिये 80-100 कि्. नादेप कम्पोस्ट खाद अथवा 150-200 कि्. सड़ी गोबर की खाद के साथ 2 कि.ग्रा. प्रति हेक्. की दर से जैव उर्वरक को अंतिम जुताई के समय खेत में मिला देना चाहिए। निराई-गुड़ाई व मिट्टी चढ़ाने (बुवाई के 30-35 दिन के बाद) समय 2 कि.ग्रा. जैव उर्वरक, एवं 2 कि.ग्रा. गुड़ को 150-200 कि.ग्रा. अच्छी सड़ी कम्पोस्ट खाद के साथ छाया में सात से दस दिन तक सड़ाकर सिंचाई के समय खेत में बुरक दें। सूक्ष्म तत्वों की पूर्ति के लिये सिंचाई के पानी के साथ 3 बार जीवामृत का उपयोग करें।

अन्य सस्य क्रियायें –

दो बार हाथों द्वारा निराई-गुड़ाई करें, पहली फसल की 3-4 पत्तों वाली अवस्था पर तथा दूसरी निराई-गुड़ाई इससे 3-4 सप्ताह बाद करें।

बीजोत्पादन –

यूरोपियन किस्मों को कटराई घाटी व किन्नौर में अप्रैल तथा एशियन किस्मों को सोलन और कटराई क्षेंत्र में मध्य सितम्बर तथा घाटियों (निचले क्षेत्र) में अक्टूबर में लगाया जा सकता है।

बुवाई – radish sowing time in Hindi

बीज 30-35 से.मी. की दूरी पर बनी मेढों पर 8-10 से.मी. की दूरी पर लगाया जाता है। इसके लिये 6-8 कि.ग्रा. बीज प्रति हेक्. पर्याप्त है। बीज बोने के तुरंत बाद सिंचाई करें ताकि अंकुरण अच्छा हो। जलवायु के अनुकूल 8 से 10 दिनों बाद सिंचाई करते रहें। जड़ों को उखाड़कर जातीय गुणों के लिए छांटा जाता है। तथा इनके शिखर काट दिये जाते है। एशियन किस्मों के लिये इनकों भूमि से 3 से 5 से.मी. ऊपर रखकर एक तिहाई भाग को दबा दिया जाता है। यूरोपियन जातियों में ऐसी कटाई नहीं की जाती है। शिखर को भूमि धरातल से ऊपर ही रखकर रोपा जाता है। रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई करें। पंक्तियों और पौधे के मध्य 60 गुणा 30 से.मी. का अन्तर रखे एक हेक्. से प्राप्त जड़े 4-5 हेक्. भूमि में बीज उत्पादन के लिये पर्याप्त होते है।

पृथकीकरण –

फसल को अन्य जातियों से पृथक रखने के लिये 1000 से 1600 मी. के आस-पास तक अन्य प्रजाजिया न लगाएं, तुड़ाई व गहाई कठिन है तथा कई बाद करनी पड़ती है। पक्की फलियां एक ही बार तोड़ ली जाती है। इन्हे धूप में सुखाकर गहाई की जाती है।

बीज प्राप्ति – एशियन किस्में – 9-10 कि्. प्रति हेक्. यूरोपियन किस्में – 5-6 क्टि. प्रति हेक्.

कीट एवं रोग नियंत्रण

रोग लक्षण एवं उपचार

आल्टरनेरिया ब्लाईट – यह मूली की बीज फसल की खतरनाक बीमारी है। पत्तों, टहनियों तथा फलियों पर गहरे भूरे धब्बे चक्कर बनाते हुये उभर आते है।

उपचार –

बीज का उपचार ट्राईकोडर्मा (5 ग्रा. प्रति कि.ग्रा.) से करें।
पौधे पर 8-10 अन्तर पर कॉपर आक्सीक्लोराईड का छिड़काव करें।3
रोगमुक्त बीज प्रयोग करें।
सफेद रतुआ रोग – विभिन्न आकार के बिखरे हुए धब्बे पत्तों व तनों तथा फूलों वाली टहनियों पर पाये जाते है।
उपचार – बीज का उपचार ट्राईकोडर्मा 5 ग्रा. प्रति कि.ग्रा से करें।
पौधों पर 10-15 दिन के अंतराल पर कॉपर ऑक्सीक्लोराईड का छिड़काव करे।
सरकोस्पोरा ब्लाईट- पत्तों पर विभिन्न प्रकार के लम्बूतरे धब्बे उभर जाते है। किनारों से पत्ते मुड़ जाते है
उपचार – बीज का उपचार ट्राईकोडर्मा 5 ग्रा. प्रति कि.ग्रा से करें।
चूर्ण रोग – पौधों के सभी भागों पर सफेद हल्के रंग का चूर्ण आ जाता है।
उपचार – चूर्ण के लक्षण आने से पहले ही ट्राईकोडर्मा को 300 ग्रा. प्रति 100 ली. पानी मे घोल बनाकर छिड़काव करें। यदि आवश्यक हो तो 10-15 दिन बाद पुनः छिड़काव करें।
मौजेक रोग – पौधे तथा पत्ते हरे रंग के बिना मटमैले व धब्बों वाले तथा मोटी हरी धरियों वाले हो जाते है तथा मुड़ने लगते है। रोगी पत्ते मोटे और गुच्छेदार हो जाते है। पौधे की बढोत्तरी रूक जाती है फूल गिर जाते है और जड़े विकृत आकार की हो जाती है।

उपचार – रोग अवरोधी किस्में लगायें

रोग के संक्रमण को रोकने के लिये चारों तरफ ऊंचाई लेने वाली फसलें लगायें।
रोगवाहक कीट नियंत्रण के लिये तरल खाद एवं कीटनाशी जो गोबर, गौ-मूत्र तथा विभिन्न प्रकार के औषधीय एवं वृक्षों की पत्तियों से बनाये जाते है की 10 ली. मात्रा को 100 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें तथा 15 दिन के बाद पुनः छिड़काव करें

कीट व नियंत्रण-

तेला – शिशु तथा व्यस्क पत्तियों तथा फूलों से रस चूसते है जिसके कारण पत्ते मुड़ जाते है और पौधे अस्वस्थ लगते है।
नियंत्रण – तरल खाद एवं कीटनाशी जो गोबर, गौ-मूत्र तथा विभिन्न प्रकार के औषधीय पौधों में घोल बनाकर छिड़काव करें तथा 15 दिन के बाद पुनः छिड़काव करें।
मस्टर्ड सॉ फ्रलाई – यह पत्तों और फलियों को खाती हैं और बीज को हानि पहुंचाती है

नियंत्रण –

खेत तैयार करते समय मिट्टी में नीम खली 500 से 1000 कि.ग्रा. प्रति हेक्. मिलायें।
इस कीट के व्यस्क को दिखते ही तरल खाद एवं कीटनाशी जो गोबर, गौ-मूत्र तथा विभिन्न प्रकार के औषधीय पौधों एवं वृक्षों की पत्तियों से बनाये जाते है की 10 ली मात्रा को 100 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें तथा 15 दिन के बाद पुनः छिड़काव करें।

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