उन्नतशील जीरा की खेती कर अधिक कमाई करें

जीरा खेती भारत के कई राज्यों में की जाती है। जो कम समय में पकने वाली मसाले की एक फसल है। जिससे कर के अधिक आमदनी ले सकते है। जीरे की खेती के लिये हल्की एवं टोमट उपजाऊ मिट्टी अधिक अच्छी मानी जाती है। जिससे जीरे की खेती आसानी से की जा सकती है।

आर एस 1 – यह एक जल्दी पकने वाली किस्म है। इसका बीज कुछ बड़ा रोयेदार होता है। यह देशी किस्म की अपेक्षा अधिक रोग रोधी तथा 20-25 प्रतिशत अधिक उपज देती है। यह किस्म 80-90 दिनों में पककर 6-10 क्टि. प्रति हेक् उपज देती है।

गुजरात जीरा -2 (जी.सी.-2) -यह किस्म 100 दिन में पककर 7 क्वि. प्रति हेक्. उपज देती है।
आर.जेड-209 – इस किस्म के दोने सुडोल, बडे, व गहरे भूरे रंग के होते है। यह फसल 120-125 दिन में पककर 6-7 क्टि. प्रति हेक् उपज देती है। इस किस्म में छाछ्या रोग का प्रकोप आ.जेड.-19 की तुलना में कम लगता है।

आर जेड 19 -(1988) इस किस्म के दोने सुडौल, आकर्षक तथा गहरे भूरे रंग के होते है। यह 125 दिन में पक जाती है एवं स्थानीय किस्मों तथा आर एस 1 की तुलना में उखटा, छाछ्या व झुलसा रोग से कम प्रभावित होती है। इस किस्म का उपज 10.5 क्टि. प्रति हेक्. तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

उन्नतशील जीरा की खेती कैसे करें – cumin cultivation in Hindi // jeera ki kheti kaise kare

भूमि की तैयारी –

बुवाई से पूर्व यह आवश्यक है कि खेत की तैयारी ठीक तरह से की जाये इसके लिये खेत की अच्छी तरह से जोत कर उसकी मिट्टी भुरभरी बना लिया जाये तथा खेत से खरपतवारों को निकाल कर साफ कर देना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक – jeera ki kheti ke liye khad

खरीफ की फसल में 10-15 टन प्रति हेक्. गोबर की खाद डाली गई है हो तो जीरे की फसल के लिये अतिरिक्त खाद की आवश्यकता नहीं है यदि ऐसा नहीं किया गया हो तो 10-15 टन प्रति हेक्. के हिसाब से जुताई से पहले गोबर की खाद खेत में बिखरे कर भूमि में मिला देना चाहिए।

इसके अतिरिक्त जीरे की फसल में 30 कि.ग्रा. नत्रजन एवं 20 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हेक् की दर से उर्वरक भी दें। फास्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई से पूर्व आखिरी जुताई के समय भूमि में मिला देना चाहिए एवं नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के 30-35 दिन के बाद एवं शेष आधी 15 कि.ग्रा. नत्रजन बुवाई के 60 दिन बाद सिंचाई के साथ दे।

बीज एवं बीजोपचार एवं बुवाई –

एक हेक्. क्षेत्र के लिये 12-18 किलो ग्रा. बीज पर्याप्त रहता है। बुवाई से पूर्व जीरे के बीज को 2 ग्रा. कार्बेन्डाजिम की बराबर मात्रा मिलाकर प्रति कि.ग्रा. बीज के हिसाब से उपचारित कर बोना चाहिए तथा जीरे की बीज की बुवाई 15 से 30 नवम्बर के बीज कर देनी चाहिए।

सिंचाई – Irrigation of cumin in Hindi


बुवाई के तुंरत बाद एक हल्की सिंचाई करनी चाहिए। सिंचाई के समय ध्यान रहे की पानी का बहाव तेज न हो अन्यथा तेज बहाव से बीज अस्त व्यस्त हो जायेगे। दूसरी सिंचाई बुवाई एक सप्ताह पूरा होने पर जब बीज फूलने लगें तब करें। इसके भूमि की बनावट तथा मौसम के अनुसार 2-3 सिंचाई पर्याप्त होती है तथा दाने बनते समय अन्तिम सिंचाई करे। परंतु पकती हुई फसल में सिंचाई न करें।

छंटाई व निराई-गुड़ाई –

जीरे की अच्छी फसल के लिये दो निराई-गुड़ाई आवश्कता होती है। प्रथम निराई गुडाई बुवाई के 30-35 दिन के बाद व दूसरी 55-60 दिन के बाद करनी चाहिए। पहली निराई-गुड़ाई के समय अनावश्यक पौधों की छटाई कर पौधे से पौधे की दूरी 5 से.मी. रख दें।

प्रमुख कीट एवं व्याधियां –

मोयला – मोयला के आक्रमण से फसल को काफी नुकसान होती है। यह कीट पौधे के कोमल भाग से रस चूस कर हानि पहुंचाते है तथा इसका प्रकोप प्रायः फसल में फूल आने के समय प्रारंभ होता है।

नियंत्रण हेतु –

डामिथोएट 30 ई.सी या मैलाथियांन 50 ई.सी. 1 मिली. ली. प्रति ली. पानी के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। आवश्कतानुसार 10 से 15 दिन के बाद छिड़काव को दोहरायें। रस चूसक कीटों का नियंत्रण हेतु कार्बोसल्फान 20 ई.सी. 1.25 ली प्रति हेक्. की दर से 20 दिन के अंतराल पर दो छिड़काव करें।

छाछ्या –

इस रोग का प्रकोप होन पर पौधों की पत्तियां पर सफेद चूर्ण दिखाई देने लगता है। रोग की रोकथाम न की जाये तो पौधों पर पाउडर की मात्रा बढ़ जाती है। यदि रोग का प्रकोप जल्द हो गया हो तो बीज नहीं बनते है। नियंत्रण हेतु गंधक के चूर्ण 25 कि.ग्रा. प्रति हेक्. की दर से भुरकाव करें या घुलनशील गंधक चूर्ण 2.5 किलो प्रति हेक्. की दर से छिड़के अथवा कैराथेयांन 48 एल.सी. एक मिली लीटर पानी की दर से घोल कर छिड़काव कर देना चाहिए।

झुलसा (ब्लाइट) –

फसल में फूल आना शुरू होने के बाद अगर आकाश में बादल छाये रहें तो इस रोग का लगना निश्चित जो जाता है। रोग के प्रकोप से पौधों से सिर झुके हुये नजर आने लगते है। तो रोग में पौधों की पत्तियों एवं तनों पर गहरे भूरे रंग की धब्बे पड़ जाते है। यह रोग इतनी तेजी से फैलता है कि रोग के लक्षण दिखाई देते ही नियंत्रण हेतु बुवाई 30-35 दिन बाद फसल पर 2 ग्रा. थियोफेनेट मिथाईन या मैकोंजेब को प्रति ली. पानी की घोलकर छिड़कें।

झुलसा रोग नियंत्रण हेतु ट्राईकोडर्मा विरीडी जैविक फूंदनाशक दवा की 4 ग्राम मात्रा प्रति किलो के बीज की दर से बीजोपचार करके बुवाई करे और बुवाई के 35 दिन पश्चात् प्रोपेकोनेजोल एक मि.ली. प्रति ली. पानी की घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

उखटा (विल्ट) –

इस रोग का प्रकोप पौधो की किसी भी अवस्था में हो सकता है लेकिन पौधों की छोटी अवस्था में प्रकोप अधिक होता है रोग से प्रभावित पौधे हरे के हरे मुरझा जाते है। इस रोग के नियंत्रण हेतु कार्बेंडाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें। रोग रहित फसल से प्राप्त बीज को ही बोयें। रोग ग्रसित खेत में जीरा न बोयें। कम से कम तीन वर्ष का फसल चक्र जैसे – ग्वार, जीरा ग्वार , गेहूं, ग्वार, सरसों अपनाये इत्यादि।

भण्डारण –

भण्डारण करते समय दानों में नमी की मात्रा 8.5 से 9 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। बोरियां को दीवाल से 50-60 से.मी. की दूरी पर लकड़ी की पट्टियों पर रखें व चूहों व अन्य कीटों के नुकसान से बचायें। संग्रहित जीरो को समय-समय पर धूप में रखें। उपज की गुणवत्ता के माप दण्डों के अनुसार यह आवश्यक है कि कटाई के बाद भी सभी क्रियाओं में गुणवत्ता बनाये रखने के लिये पूर्ण सावधानी बरते।

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