उन्नतशील खरबूजा की खेती कैसे करें अच्छे आमदनी के लिये

भारत में नदियों के किनारे खरबूजें की खेती की जाती है। उचित जल निकास वाली रेतीली टोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें । इसके बाद 2-3 बार हैरो या कल्टीवेटर चलाएं तथा इसको सब्जियों के उपयोग में भी लेते है। खरबूजा विटामिन ए और विटामिन सी का अच्छा स्त्रोत है। इसमें 90 प्रतिशत पानी और 9 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट होते हैं। भारत में खरबूजों को उत्पादन विभिन्न राज्यों में किया जाता है जैसे – उत्तर प्रदेश, पंजाब, तामिलनाडू, महांराष्ट्र, आदि है।

 

खरबूजा की खेती कैसे करें – beneficial farming of melon in Hindi

मिट्टी-

इसके लिये उच्च तापमान और शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है इसकी सफल खेती के लिये 44-22 डि.से. तापमान अच्छा माना जाता है यदि मिट्टी में अधिक नमी रहेगी तो फलों की मिठास कम हो जाती है। अच्छे जल निकास वाली दोमट मिट्टी में उगाने पर यह अच्छे परिणाम देती है। घटिया निकास वाली मिट्टी खरबूजे की खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती। फसली चक्र अपनायें क्योंकि एक ही खेत में एक ही फसल उगाने से मिट्टी के पोषक तत्वों उपज में कमी और बीमारियों का हमला भी ज्यादा होता है। मिट्टी की पी एच 6.7 के बीच होनी चाहिए। खारी मिट्टी मात्रा वाली मिट्टी इसकी खेती के अच्छा नहीं माना जाता है।

किस्में –

पंजाब सनहरी – इसके फल का आकार गोल, जालीदार, छिल्का और रंग हल्का भूरा होता है। इसका औसतन भार 700-800 ग्राम होता है। यह हरा मधु किस्म के 12 दिन पहले पक जाती हैं इसका आकार मोटा और रंग संतरी होता है। यह फल की मक्खी के हमले को सहनेयोग्य है। इसकी औसतन पैदावार 65 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

हारा मधु –

इसके फल का आकार गोल और बड़ा होता है। फल का औसतन भार 1 किलोग्राम होता है। छिल्का हल्के पीले रंग का होता है। स्वाद में बहुत मीठा होता है। बीज आकार में छोटे होते हैं। यह सफेद रोग को सहनेयोग्य होता है। इसकी औसतन पैदावार 50 क्विंटल प्रति एकड़ होता है। देरी से पकने वाली किस्म है।

दुर्गापुर मधु –

इसके फल गोलाकार होता है तथा छिलका हरे रंग का होता है इस पर हरे रंग की धारियां होती है फल का गूदा हलके रंग का होता है जो खान में अत्यंत मीठा और स्वादिष्ट होता है।

पंजाब हाईब्रिड –

यह जल्दी पकने वाली किस्म है। इसका फल जालीदार छिल्के वाला हरे रंग का होता है। इसका आकार मोटा और रंग संतरी होता है। खाने में रसीला और मजेदार होता है। यह फल वाली मक्खी के हमले का मुकाबला करने वाली किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 65 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

पूसा मधु –

इसके फल गोल व दोनो सिरों से कुछ चपटा होता है इसका छिलका चिकनी पीले रंग का और हरी धारियां वाला होता है गुदा हल्का नारंगी रंग का रसदार अच्छी गंध वाला मीठा होता जिससे कुल घुलनशील शर्करा का मात्रा 13-15 तक होता है। यह 90 से 95 दिनों में तैयार होने वाली किस्म है यह 120-125 कि्. तक उपज देती है।

एम.एच-51 –

इसकी औसतन पैदावार 89 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसके फल गोल धारीदार और जालीदार होते हैं। इसमें सुक्रॉस की मात्रा 12 प्रतिशत होती है।

जमीन की तैयारी-

मिट्टी जब तक भूरभूरी न हो जाये तब तक जुताई करना चाहिहए। उत्तरी भारत में इसकी बिजाई फरवरी के मध्य में की जाती है। उत्तरी पूर्वी -पश्चिमी भारत में बिजाई नवंबर से जनवरी में की जाती है। खरबूजे को सीधा बीज के द्वारा बुवाई की जा सकता है। बिजाई के लिए मध्य फरवरी का समय सही माना जाता है। प्रयोग करने वाली किस्म के आधार पर 3-4 मीटर चौड़े बैड तैयार करें। बैड पर प्रत्येक क्यारी में दो बीज बोयें और क्यारियों में 60 से.मी. का फासला रखें।

बीज की गहराई-

बिजाई के लिए 1.2 से.मी गहरे बीज बोयें।

बिजाई का ढंग-

इसकी बिजाई गड्ढा खोदकर और दूसरे खेत में पनीरी लगाकर यह ढंग प्रयोग कर सकते हैं।

बीज-

बीज की मात्रा एक एकड़ में बिजाई के लिए 400 ग्राम बीजों की आवश्यकता होती है।

बीज का उपचार –

बिजाई से पहले कार्बेनडाजिम 2 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। रासायनिक उपचार के बाद ट्राइकोडरमा विराइड 4 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। बीजों को छांव में सुखाएं और तुरंत बिजाई कर दें।

खाद-

10-15 टन गली सड़ी की खाद प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन 50 किलोग्राम यूरिया 110 किलोग्राम फासफोरस 25 किलोग्राम फासफेट 155 किलोग्राम पोटाश 25 किलोग्राम पोटाश 40 किलोग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से डालें। फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन का तीसरा हिस्सा एक तिहाई बिजाई से पहले डालें। नाइट्रोजन की बची हुई मात्रा शुरूआती विकास के समय मिट्टी में अच्छी तरह मिलाकर डालें और पत्तों को छूने से परहेज करें। जब फसल 10-15 दिनों की हो जाये तो फसल के अच्छे विकास और पैदावार के लिए सूक्ष्म तत्व 2-3 ग्राम प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें। फूलों को झड़ने से रोकने और फसल का 10 प्रतिशत पैदावार बढ़ाने के लिए शुरूआती फूलों के दिनों में हयूमिक एसिड 3 मि.ली 5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 30 दिनों के फासले पर 1-2 बार स्प्रे करें।

खरपतवार नियंत्रण-

पौधे के विकास के शुरूआती समय के दौरान बैड को खरपतवार से मुक्त रखना जरूरी होता है। सही तरह से नदीनों की रोकथाम ना हो तो फल बोने से 15-20 दिनों में पैदावार 30 प्रतिशत तक कम हो जाती है। इस दौरान गोडाई करते रहना चाहिए। नदीन तेजी से बढ़ते हैं। इसलिए 2-3 गोडाई की जरूरत पड़ती है।
सिंचाई- गर्मियों के मौसम में हर सप्ताह सिंचाई करें। पकने के समय जरूरत पड़ने पर ही सिंचाई करें। खरबूजे के खेत में ज्यादा पानी ना लगाएं। सिंचाई करते समयए बेलों भागों विशेष कर फूलों और फलों पर पानी ला लगाएं। भारी मिट्टी में लगातार सिंचाई ना करें इससे वानस्पति भागों की अत्याधिक वृद्धि होगी। अच्छे स्वाद के लिए कटाई से 3-6 दिन पहले सिंचाई बंद कर दें या कम कर दें।

पौधे की देखभाल –

चेपा और थ्रिप्स यह कीड़े पौधे के पत्तों का रस चूस लेते हैं जिससे पत्ते पीले पड़ जाते हैं और लटक जाते हैं। ये कीड़े पत्तों को ऊपर की तरफ मोड़ देते हैं। यदि खेत में इसका हमला दिखे तो थाइमैथोक्सम 5 ग्राम को 15 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

पत्ते का सुरंगी कीड़ा-

यह पत्तों के सुरंगी कीड़े हैं जो कि पत्तों में लंबी सुरंगे बना देते हैं और पत्तों से अपना भोजन लेते हैं। यह प्रकाश संश्लेषण क्रिया और फलों के बनने को प्रभावित करते हैं। इसकी रोकथाम के लिए एबामैक्टिन 6 मि.ली को प्रति 15 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

फल की मक्खी-

यह बहुत नुकसानदायक कीड़ा है। मादा मक्खी फल की ऊपर वाली सतह पर अंडे देती है और बाद में वे कीड़े फल के गुद्दे को खाते हैं। जिस कारण फल गलना शुरू हो जाता है।

प्रभावित फल को खेत में से उखाड़कर नष्ट कर दें। यदि नुकसान नजर आये तो शुरूआती समय में नीम सीड करनाल एकसट्रैट 50 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
एंथ्राकनोस और रोकथाम- इसके कीट पौधे को अपने भोजन के रूप में प्रयोग करते हैं। गंभीर हमले के कारण पत्ते गिर जाते हैं और फल समय से पहले पक जाता है। यदि इसका हमला दिखे तो घुलनशील सल्फर 20 ग्राम को 10-15 लीटर पानी में मिलाकर 10-12 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार स्प्रे करें।

अचानक सूखा-

यह फसल की किसी भी अवस्था पर हमला कर सकता है। पौधा कमजोर हो जाता है और शुरूआती अवस्था में पौधा पीला हो जाता है। गंभीर हमले में पौधा पूरी तरह सूख जाता है।
खेत में पानी ना खड़ा होने दें। प्रभावित भागों को खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर दें। ट्राइकोडरमा विराइड 1 किलो को 50 किलो सड़ी गोबर की खाद के साथ मिलाकर डालें। यदि इसका हमला दिखे तो मैनकोजेब प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

पत्तों के निचले धब्बे-

पत्तों का ऊपरी भाग पीले रंग का हो जाता है। बाद में पीलापन बढ़ जाता है और पत्तों को केंद्रीय भाग भूरे रंग का हो जाता है। पत्तों के अंदर की ओर सफेद सलेटी हल्के नीले रंग की फंगस पड़ जाती है। बादलवाइए बारिश और नमी के हालातों में यह बीमारी ज्यादा फैलती है। यदि इसका हमला खेत में दिखे तो मैटालैक्सिल 8 प्रतिशत प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

फसल की कटाई-

जब फल पीले रंग के हो जायें। दूसरी किस्मों की कटाई मंडी की दूरी के अनुसार की जाती है। यदि मंडी की दूरी ज्यादा हो तो जब फल हरे रंग का हो तब ही कटाई कर देनी चाहिए। यदि मंडी नजदीक हो तो फल आधा पकने पर ही कटाई करनी चाहिए। खरबूजों को कटाई के बाद 15 दिनों के लिए 2 से 5 डि.से. तापमान और 95 प्रतिशत पर रखा जाता है इसके बाद जब यह पूरा पक जाता है।

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