अजवाइन की खेती कैसे करें जिससे हो ज्यादा मुनाफा

अजवाइन की खेती विश्व तथा भारत में मासले के फसल के रूप में लेते है। इसका वनस्पति नाम टेकिस्पर्मम मम्मी के नाम से जानते है। अंग्रेजी में इसे बिशप्स सीड के नाम से जाना जाता है। इसके बीजों में वाष्पशील तेल पाया जाता है। अजवाइन में खनिज पदार्थ तत्वों का अच्छा स्रोत है। इसमें प्रोटीन, वसा, रेशा, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, कैल्शियम, लोहा आदि होता है।

अजवाइन की खेती करने का तरीका और फायदे – Celery (Ajwain) Ki Kheti Kaise Kare

औषधीय गुण –

अजवाइन को औषधीय के रूप में लेते है जैसे – पेट दर्द, पेचिस, बदहजमी, हैजा, कफ, ऐठन, सर्दी जुखाम, कान दर्द, चर्म रोग, दमा आदि रोगों में लिया जाता है। अजवाइन का उपयोग दंद मंजन, टूथपेस्ट, और इसके अल्वा बिस्कुट, फल सब्जी संरक्षण के प्रयोग में लाया जाता है।

किस्मे-
प्रताप अजवाइन –

अजवाइन फसल की यह नव विकसित किस्म विभिन्न वर्षा एवं स्थानों पर औसतन 850 से 900 कि.लो ग्रा. प्रति हैक्. बीज की उपज देती है। जो स्थानीय किस्मों से लगभग 20 प्रतिशत अधिक है। इस किस्म में तेल की मात्रा 3.89 प्रतिशत होता है। यह किस्में लगभग 15 दिन पहले पक कर तैयार हो जाती है।

भूमि की तैयारी –

टुमट या बलुई टुमट मिट्टी अच्छी रहती है। भूमि को 4-5 जुताई करके भुरभुरा कर छोटी-छोटी क्यारियां बना लें।

बुवाई –

बुवाई का उपयुक्त समय अगस्त से सितम्बर है। प्रति हेक्. 2.5 से 5 किलो ग्रा. बीज छिटकवां विधि से अथवा 15-20 से.मी. दूर कतारों में बुवाई करें। कतारों से बुवाई की गई फसल के पौधे से पौधे की दूरी 20 से.मी. रखें। छिटकवां विधि में बीजों की क्यारियें में छिटक कर मिट्टी पर हल्की रैक चला देवे, जिससे बीजों पर हल्की सी परत मिट्टी की आ जाये। अधिक मिट्टी होने पर अंकुरण अच्छा नहीं होता है।

निराई -गुड़ाई –

खरपतवारों को न पनपने दे तथा आवश्कतानुसार निराई-गुड़ाई करते रहें। अजवाइन फसल में खरपतवार नियंत्रण करने हेतु बुवाई के तुरंत बाद 750 मिली लीटर पेन्डीमिथेलीन प्रति हेक् के हिसाब से छिड़काव करें।

पौध संरक्षण –

संभाग में फसल में मोयला कीट व छाछ्या रोग का प्रकोप पाया गया है।

मोयला के बचाव के लिये मैलाथियांन 5 प्रतिशत चूर्ण 25 कि.ग्रा. प्रति हेक्. भुरकाव करें अथवा मैलाथियान 50 ई.सी. अथवा डाईमेथोएट 30 ई.सी. एक ली. प्रति हेक्. की दर से घोल बनकाकर प्रयोग करें।

छाछ्या –

लक्षण दिखाई देते ही कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू पी. या केलेक्सीन 2 ग्रा. प्रति ली. पानी मिलाकर छिडकें। आवश्यकतानुसार 15 दिन बाद इसे फिर दोहरायें।
उखटा – फसल चक्र अपनाकर इस रोग से बचा जा सकता है।
कटाई – जनवरी माह तक फसल पक जाती है। तब इसकी कटाई कर लें।
उपज – अच्छी तरह खेती करने प्रति हेक्. 7-8 कि्. बीज की उपज प्राप्त हो सकती हैं।

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