अरण्डी (कास्टर) की उन्नत खेती कर ज्यादा आमदनी और मुनाफा लें

अरण्डी की खेती कृषि उद्योग में सबसे लोकप्रिय पौधों में से एक है। आम तौर पर यह पौधे जंगल में बढ़ता है, लेकिन अपने व्यापार के मूल्य पर विचार करते हुए कृषि उद्योग वाणिज्यिक अरण्डी खेती में अपने हाथों का विस्तार कर रहा है। अरण्डी की खेती राजस्थान में मुख्यतयः जालौर, सिरोही, पाली, जोधपुर, बाड़मेर, गंगानगर एवं बीकानेर जिलों में की जाती है। उसके तेल की अत्यधिक मांग की वजह से अरण्डी के बाजार भाव में तेजी से वृद्धि हुई है और इसी वजह से इसकी खेती का क्षेत्रफल राजस्थान में तेजी से बढ़ रहा है। राजस्थान के अलावा गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, उड़ीसा एवं हरियाणा में अरण्डी की खेती की जाती है। अरण्डी का तेल मुख्यता औद्योगिक उत्पादन जैसे ऑयल पेंट, वार्निस, डिस्टेम्पर, कपड़ा रंगने का रंग, साबुन, प्लास्टिक, ग्रीस, छापने की स्याही, लिनोलियम, घर्षण तेल, पोलिश, मरहम, हाइड्रोलिक ऑयल, चिपकाने वाले पदार्थ, कब्ज हरण औषधियां व श्रंगार उत्पादनों (लिपस्टिक एवं नेल पॉलिश) को बनाने में काम आता है। अरण्डी के तेल का हाइड्रोजनीकरण करके कोल्ड वेक्स बनाया जाता है जो बिजली के तारों में इंसुलेटर के रूप में काम आता है। इन्हीं विशेषताओं की वजह से पश्चिमी देशों में इसकी भारी मांग हैं।

भारत विश्व में सर्वाधिक अरण्डी उत्पादन करने वाला देश हैं। अरण्डी के तेल व अन्य उत्पादनों के लिए वर्ष 2010-2017 में 8000 करोड़ रुपयों से ज्यादा की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई। भारत के आलावा चीन, ब्राजील व इजराइल देशों में अरण्डी की खेती की जाती है।
अरण्डी का पौधा दुनिया का सबसे जहरीला पौधा होता है। फिर भी, कई चिकित्सा लाभों के कारण, खेती की जाती है। यह प्लांट का उपयोग सजावटी उद्देश्यों के लिए किया जाता है। पौधे में बड़े और हड़ताली पत्ते, कांटे (जो कि स्टार के आकार के होते हैं) और लाल बीज कैप्सूल होते हैं। इसकी खेती कम लागत में भी कर सकते है। अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय बाजार इसकी काफी मांग है।

कास्टर का पौधा तेजी से बढ़ता है और क्योंकि यह उष्णकटिबंधीय स्थानो पर भी उगाया जाता है। इसे गर्मी और गर्म तापमान बढ़ने की आवश्यकता होती है, इसकी खेती का तापमान 77 – 86 एफ (25 – 30 डिग्री सेल्सियस) है जो अच्छी मात्रा में प्रकाश के साथ होता है।

अरण्डी (कास्टर) की उन्नत खेती करने का तरीका-Advanced farming method of Castor Cultivation in Hindi

जलवायु

इसकी खेती सभी प्रकार की जलवायु में की जा सकती है। परंतु मुख्यतया सूखे और गर्म क्षेत्रों में जहां वर्षा 500 से 750 मी.मि. तक होती है, वहां आसानी से की जा सकती है। यह लंबे समय तक सूखे के साथ- साथ अधिक वर्षा को भी सहन कर सकती है। मगर ज्यादा वर्षा होने पर फसल में बढ़वार ज्यादा हो जाती है, जिससे कि रोगों का प्रकोप अधिक होता है और उत्पादन में गिरावट आती है। यह फसल पाले से ज्यादा प्रभावित होती है।

मिट्टी-

अरण्डी का पौधा किसी भी प्रकार मिट्टी में अच्छी तरह से उगाया जा सकता है। बशर्ते वे काफी गहरे और अच्छी तरह से सूखा हो। लेकिन अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होती है। भराव वाले क्षेत्र एवं क्षारीय भूमि अरण्डी की खेती के लिए उपयुक्त नहीं हैं। जल निकास अच्छा नहीं हो तो जड़ विगलन एवं उकठा रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।

कास्टर के लिए सबसे उपयुक्त मिट्टी गहरे, मध्यम उपजाऊ होते हैं, थोड़ा अम्लीय स्थितियों, अच्छी तरह से सूखा, रेतीले लोम के साथ उगाया जा सकता है। जबकि कास्टर लगभग 6 के पीएच के साथ गहरी रेतीले लोम मिट्टी पसंद करता है, इसे 5-8 के पीएच रेंज के साथ मिट्टी पर खेती की जा सकती है। चयनित क्षेत्र में मानसून की वर्षा के साथ उगने वाले खरपतवारों को दो-तीन गहरी जुताईया कर नष्ट कर दे। अंतिम जुताई के पहले 7 टन गोबर की खाद, 300 किलोग्राम जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिला दे और फिर पाटा लगाकर अरण्डी की बुवाई हेतु लाइने निकाले। जिन खेतो में दीमक की समस्या हो वहां पर मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत पाउडर को 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला दे। इसके बाद बुवाई करें।

खेत की तैयारी

अरण्डी के पौधे अच्छी वृद्धि के लिए पौधों को 45 सेमी गहराई तक ढीली उप-मिट्टी के साथ एक अच्छी तरह से पक्कीकृत बीज बिस्तर की आवश्यकता होती है। वार्षिक किस्मों के लिए युवा पौधे नाज़ुक होते हैं क्योंकि बीज के टुकड़े मुक्त होते हैं। अच्छा खरपतवार नियंत्रण पूर्व और बाद में उभरने के लिए आवश्यक है।

बुवाई

अरण्डी की बुवाई आमतौर पर मई के आरंभिक भाग और जून के आरंभ में, या सितंबर के अंत और अक्टूबर के आरंभ में बरसात के मौसम के अंत में बरसात के मौसम की शुरुआत में लगाया जाता है। बीज 60 सेंटी मीटर से 60 प्रति छेद 2-4 बीज लगाए जाते हैं।

किस्में

जी सी एच-4 (1988)

इस संकर किस्म की मुख्य शाखा की ऊंचाई 120 से 170 सेंटीमीटर होती है। इसमें 50 से 60 दिन में फूल आ जाते हैं। दाना भूरा तथा दानें का रंग लाल होता है तथा फल पर अपेक्षाकृत कम कांटे होते हैं। तेल की मात्रा पैदावार बारानी क्षेत्र में 9 से 10 क्विंटल तथा सिंचित क्षेत्र में 20 से 23 क्विंटल होती है लेकिन ऊपर 12 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है, मुख्य शाखा 90 से 100 दिन में पकना प्रारंभ हो जाती है, परंतु पकाव अवधि 210 से 240 दिन है। यह किस्म उखटा एवं जड़ विगलन रोगरोधी हैं।

जी सी एच-5 (1997)

यह संकर किस्म हैं जो सिंचित क्षेत्र में बुवाई के लिए उपयुक्त है। इस किस्म के तने का रंग मटमैला लाला तथा फल पर अपेक्षाकृत कम कांटे होते हैं। तने तथा पत्तियों की नीचे की सतह पर मोमनुमा परत पाई जाती है। पौधों की ऊंचाई लगभग 200 से 230 सेमी तथा इस किस्म के 100 बीजों का भार लगभग 30 से 32 ग्राम होता है। सिंचित क्षेत्र में उपज 30 से 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। बीज में तेल की मात्रा 49.6 प्रतिशत होती है। यह संकर किस्म उखटा रोगरोधी है।

आर एच सी-1 (2002)

यह संकर किस्म हैं जो सिंचित तथा असिंचित क्षेत्र में बुवाई के लिए उपयुक्त है। इस किस्म के तने का रंग मटमैला लाल, फल कांटेदार, पर पत्तियों के दोनों तरफ मोमनुमा परत पाई जाती हैं। तने पर मुख्य असीमाक्ष तक 13 से 17 गाँठे होती है। बीज का रंग हल्का चॉकलेटी आकार मध्यम एवं 100 बीजों का वजन 26 से 28 ग्राम तक होता है। सिंचित क्षेत्र में उत्पादन 32 से 36 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।यह संकर किस्म उखटा रोगरोधी है तथा इस में हरे तेले का प्रकोप भी कम पाया जाता है।

डी.सी.एस.-9/ज्योति

इस उन्नत किस्म के तने का रंग गहरा लाल, फल कांटेदार, तने एवं पत्ती की निचली सतह पर मोमनुमा परत पाई जाती हैं। तने पर मुख्य असीमाक्ष सिकरे तक 14 से 15 गांठे होती हैं।

जी.सी.एच.-7 (2006)

इस संकर किस्म के तने का रंग मटमैला लाल तथा कम कांटेदार होते हैं। तने शाखाओं पत्तों तथा फल पर मोमनुमा परत पाई जाती है। असीमाक्ष में 58 से 60 दिन की अवधि में फूल आ जाते हैं। सौ बीजों का वजन 34 से 36 ग्राम तथा सिंचित अवस्था में औसत उत्पादन 32-36 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती बुवाई का समय

बीज दर एवं बीज उपचार

बीज की मात्रा बीज के आकार एवं कतारों की दूरी पर निर्भर करती है। एक स्थान पर एक ही बीज की चोबाई करें। ऐसा करने से असिंचित परिस्थितियों में 15 से 20 किलो एवं सिंचित परिस्थितियों में 7 से 9 किलो बीज की आवश्यकता होती है। बीज उपचार हेतु बीजों दर से उपचारित करने के बाद जीवाणु कल्चर से बीजोपचार (100 ग्राम/किग्रा. बीज) कर बुवाई करें।

बुवाई की विधि

बुवाई के लिए तैयार खेत में देशी हल या कल्टीवेटर द्वारा वांछित दूरी पर गहरी कतारें बनाएं। सिंचित क्षेत्र में कतार से कतार की दूरी 4 से 5 मीटर एवं पौधों से पौधों के बीच की दूरी 2 फीट रखें। कतारे बनाते समय डीएपी एवं यूरिया की वंचित मात्रा भी उर दें। बीज भूमि भूमि में 4 से 5 सेंटीमीटर से अधिक गहरा नहीं बोना चाहिए।

सिंचाई

वर्षा काल समाप्त होने के बाद सामान्यतयाः 50 से 70 दिनों तक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। इसके बाद गर्मी में 12 से 15 दिनों में व सर्दी में 18 से 22 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। इस तरह सिंचाई करने से कुल 8-10 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। जब फसल बढ़वार से खेत पूरी तरह ढक जाता है, तो पतियों की छाया की वजह से भूमि में नमी लंबे समय तक बनी रहती हैं। ऐसी स्थिति आने के बाद और अनियंत्रित सिंचाई न करें अन्यथा उखटा या जड़ विगलन के प्रकोप की संभावना बढ़ जाती है।

अरण्डी में अंतराशस्य (इंटरक्रॉपिंग)

अरण्डी की फसल में मूंग, मोठ को अंतराशस्य के रूप में लगाकर अतिरिक्त आमदनी प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए अरण्डी को 120 सेमी (4 फुट) पर लाइनों में बुवाई करें। और अरण्डी को दो लाइनों के बीच एक लाइन मूंग, मोठ की जल्दी पकने वाली किस्म की बुवाई कर दे। अंतराशस्य के लिए दोनों फसलों की एक साथ बुवाई करें। अंतराशस्य के रूप में देशी अरण्डी को मिर्च फसल के लिए बनाई गई क्यारियों की मेड़ों पर लगाकर मिर्च को पाले से बचाया जा सकता है। ऐसा करने से मिर्च की फसल पर अरण्डी एक छाते के रूप में काम करती है जो ऊपर आने वाली ठंडी हवाओं से मिर्च की रक्षा करती है।

निराई गुड़ाई

प्रारंभिक अवस्था में अरण्डी की फसल पर खरपतवारों का अधिक प्रभाव नहीं होता है। जब तक पौधा 60 से.मी. का न हो जाए और पौधे अपने बीच की दूरी को ढक न ले तब तक समय- समय पर निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। पहली निराई-गुड़ाई 19-20 दिन बाद दूसरी 30 से 35 दिन बाद करने से फसल पूरी तरह खरपतवार मुक्त हो जाती है।

अरण्डी की फसल में रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण हेतु 1 किलोग्राम पेंड़ीमिथिलीन प्रति हेक्टेयर को 600 लीटर पानी में घोलकर कट नोजल द्वारा अरण्डी उगने से पहले (बुवाई के दूसरे-तीसरे दिन) छिड़काव करें।
गुड़ाई के लिए बैल चलित त्रिफाली, रोपड़ी या पावर टिलर को भी काम में लिया जा सकता है। अरण्डी की कतारों के बीच की दूरी 4 फीट तक होती है। अतः ट्रैक्टर चलित कल्टीवेटर के हलो को भी आवश्यकतानुसार निर्धारित जगह पर कसकर, दो से तीन बार गुड़ाई की जा सकती है।

अरण्डी में रोग प्रबंधन

उखटा व जड़ विगलन अरण्डी के प्रमुख रोग है। यह रोग जीवाणु से फैलते हैं, जो या तो जमीन में पहले से ही मौजूद होते हैं या बीज के माध्यम से फैलते हैं। उकठा रोग के प्रकोप से पौधे का तना एक तरफ से सूखता है और धीरे-धीरे पूरा पौधा सूख जाता है।
उकठा रोग की रोकथाम के लिए ट्राइकोडर्मा विरिड 10 ग्राम पाउडर प्रति किलोग्राम बीज से बीज उपचार तथा ट्राइकोडर्मा विरिड पाउडर 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर को गोबर की खाद के साथ मिलाकर बुवाई पूर्व भूमि में देना प्रभावी पाया गया है। उखटा रोग रोधी किस्में जैसे जी.सी.एच.-7, जी.सी.एच.-5 व आर.एच.सी.-1 की बुवाई करें। फसल चक्र अपनावे एवं भराव वाले क्षेत्रों में अरण्डी की बुवाई न करें। जड़ गलन रोग के प्रकोप से जड़ गल जाती हैं और पौधा मुरझा जाता है। इसके बचाव के लिए कार्बेंडाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करे।

अरण्डी में नाशी कीट प्रबंधन

सेमीलूपर लट अगस्त-सितंबर माह में पत्तियों के हरे भाग को खाती हैं और शिराओं को छोड़ देती है। 10 से 15 दिन के अंदर लार्वा 8 से 10 सें.मी. लंबा हो जाता है। पूर्ण विकसित सेमीलूपर को छेड़ने से यह लार्वा सांप की तरह फन उठाता हैं। अगर इसका नियंत्रण नहीं किया जाए तो 10 से 15 दिन के अंदर संपूर्ण फसल को नष्ट कर देता है। सेमीलूपर के प्रभावी नियंत्रण हेतु 1 लीटर क्यूनालफॉस 25 ई.सी. दवा को 600 लीटर पानी में घोलकर सेमीलूपर लट की छोटी अवस्था पर ही छिड़काव कर नष्ट कर दे।

हरा तेला, सफेद मक्खी एवं लाल मकड़ी भी अरण्डी के पत्तों के नीचे की सतह पर रहकर रस चूसते रहते हैं। इनके आक्रमण से पत्तियों के किनारे सूखकर अंदर की तरफ मुड़ जाते हैं और पौधे की बढ़वार रुक जाती है। लीफ माइनर पत्तियों के अंदर सांप के रेंगने जैसे निशान बना देता हैं।

फल छेदक लट का नियंत्रण

अरण्डी के सिकरों पर फल छेदक लट का प्रकोप भी कभी-कभी दिखाई देता है। यह लट फलों व तने के अंदर छेद कर घुस जाती है और बीजों को खाती रहती है। यह लट विस्ठा व लार से फल/गाठों पर जाला बना देती है। इसका आक्रमण सितंबर माह में प्रारंभ होता है और नवंबर तक चलता है।

लाल मकड़ी का नियंत्रण

लाल मकड़ी के नियंत्रण के लिए इथीयोन 50 ई.सी. या डाइकोफाल 18.5 ई.सी. एक मि.ली. पानी में घोलकर छिड़काव करें। ज्यादा पौध संख्या रखने, अनियंत्रित सिंचाई करने, व अत्यधिक यूरिया छिड़काव से कीट प्रकोप बढ़ता है।

कटाई

जब सिकरों का रंग हल्का पीला या भूरा हो जाए तथा उनके दो से तीन फल पूरी तरह सूख जाए तब कटाई कर लें। सिकरों के पूरे सूखने का इंतजार नहीं करना चाहिए अन्यथा फल चटकने से या कटाई करते समय गाँठें झड़ जाने से उपज में हानि होती हैं। पहली तुड़ाई करीब 90-100 दिन में तथा बाद में हर 1 सप्ताह बाद तुड़ाई करें।

गहाई

तुड़ाई के बाद सिकरों को खलिहान में सुखा दें और अच्छी तरह सूखे सिकरों से गाँठें अलग कर ढ़ेरी बना दें। सभी तुड़ाइयों से प्राप्त गाठों की एक साथ थ्रेशर में गहाई करवा दे। थ्रेसर पर गहाई करते समय पूर्ण सावधानी बरतें तथा लटकने वाले कपड़े जैसे मफलर, अंगोछा इत्यादि नहीं पहने। बीजों को उचित आकार की छलनी से छान कर ग्रेडिंग कर दे और दो से 3 घंटे धूप में सुखाकर 8 से 10 नमी के साथ बोरियों में भरकर गोदाम में रख दें और उचित भाव आने पर बेच दे।
गहाई से निकलने वाले कचरे को गोबर के साथ थोड़ा-थोड़ा मिलाकर कंपोस्ट खाद बनाने के काम में लें।
अरण्डी के सिकरे खली रहने की समस्या संबंधित भ्रांति अरण्डी एक ऐसा पौधा है जिसके एक ही सिकरे पर नर तथा मादा दोनों तरह के पुष्प पर पाए जाते हैं। नर पुष्पों में अंडाशय नहीं होता है, केवल पुंकेसर होते हैं, जिनमें से परागकण निकलते हैं, जो मादा पुष्पपों को गर्भित करते हैं। यह परागकण बहुत ही सूक्ष्म होते हैं, जो हवा में 500 से 600 मीटर तक उड़ते रहते हैं। नर पुष्प हल्के पीले सफेद रंग के होते हैं जो साधारणतया सिकरे में नीचे की तरफ लगे होते हैं। मादा पुष्प हरे गहरे लाल रंग के होते हैं, जो सिकरे के ऊपरी भाग में पाए जाते हैं। नर पुष्प परागकण पैदा करने के बाद सूख कर गिर जाते हैं और उस जगह सिकरा खाली हो जाता है। यह एक सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया है जिससे भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है।

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