ईसबगोल औषधीय फसल की खेती कर आमदनी ज्यादा करें

ईसबगोल की औषधीय फसल है इसकी खेती कई राज्यों में की जाती है। इस औषधीय पौधे से आप विदेशी मुद्रा आर्जित कर सकते है। यह एक वर्षीय पौधा है । इसकी लम्बाई लगभग 30-50 सेंमी. तक होता है। इसके बीज के ऊपरी छिलके वाले हिस्सा को भूसी कहते है जो दवा के प्रयोग लाया जाता है। इसके बीजो में 17-19 प्रतिशत तक प्रोटीन पाया जाता है। इसका उपयोग जैस – पेट की बीमारियों, कब्जियत, अल्सर, बवासीर, दस्त, आॅव, पेसिच तथा दस्त में कारगर सिद्ध होता है। इसके अलवा इसका उपयोग खाद्य प्रसंस्करण बनाने में लाया जाता है जैसे- आइसक्रीम, उद्योग, रंग रोगन तथा चिपकाने वाले पदार्थ बनाने में इसका प्रयोग किया जाता है। इसके पौधो का अर्क प्रयोग होठों के फटने, फोडे़ -फंुसियों, शरीर के भागों व विषाक्त घावों के उपचार में किया जाता है।

 

ईसबगोल की खेती कैसे करें – advanced cultivation of isabgol in Hindi

उन्नत किस्में – isabgol ki kheti kare

  • हरियाणा ईसबगोल – इसकी औसत बीज की लगभग 7-9 क्.ि प्रति हेक्. होती है।
  • गुजरात ईसबगोल-1 गुजरात ईसबगोल-2, गुजरात ईसगोल-3
  • ईसबगोल -3 इस किस्म की उपज क्षमता लगभग 8-10 क्विंटल प्रति हेक् होती है।
  • जवाहर ईसबगोल -4 इसकी औसत बीज की उपज लगभग 7-9 क्ंि प्रति हेक् होता है।

खेत का चुनाव व तैयारी – isabgol ki kheti ki tayari

ईसबगोल के लिये हल्की रेतीली टोमट मिट्टी भूमि से भारी चिकनी भूमि तक विभिन्न प्रकार की भूमियां उपयुक्त रहती है। भूमि का पी.एच. मान 7.2-7.9 तक अच्छा रहता है। खेती की 2-3 बार जुताई करके छोटे आकार की समतल क्यारियां बना दें।

जैविक खाद एवं उर्वरक –

इस फसल के बुवाई से पहले खेत में 10 टन प्रति हेक्. सड़ी गोबर की खाद देना लाभदायक रहता है। नत्रजन की आधी मात्रा व फाॅस्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई के समय भूमि में ऊर कर दें। नत्रजन की शेष आधी मात्रा बुवाई के 50 दिन बाद सिंचाई के साथ दें।

बीज, बीजोपचार एवं बुवाई –

एक हेक्. क्षेत्र के लिये 4 कि.ग्रा. बीज पर्याप्त होता है। बुवाई से पूर्व बीजों को एप्रोन एस.डी. नामक दवा 5 ग्रा. प्रति किलो बीज से उपचारित करें। बुवाई के लिये उपयुक्त समय 10-20 नम्बर है तथा 30 से.मी. की दूरी पर कतारों से बुवाई करे। बीज के ऊपर मिट्टी की परत नहीं आनी चाहिए। बुवाई के बाद धीमी गति से सिंचाई करें ताकि बीज बहकर नहीं जाये। बुवाई के 20 दिन पश्चात कतारो से पौधो की छटाई करके पौधे से पौधे की दूरी लगभग 5 से.मी. रखे।

उर्वरक प्रबंधन –

ईसबगोल फसल यदि फसल चक्र से प्राप्त अवशेष उर्वरता ध्यान में रखकर उगाई जाये तो इसे यूरिया 30 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हेक्. देना लाभदायक होता है।
पौध संरक्षण- ईसबगोल फसल में यदि आल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग की रोकथाम हेतु बीजों को बुवाई से पूर्व 10 ग्रा. प्रति किलो की दर से ट्राकोडर्मा जैव उत्पाद से उपचारित करें। खेडी फसल में बुवाई के बाद 30-45 या 50 दिन बाद 3 छिड़काव काॅपर आॅक्सीक्लोराइड 50 डब्ल्यूपी को 2 ग्रा. प्रति ली पानी में घोल कर करें।

सिंचाई एवं निराई गुड़ाई –

फसल में कुल 4 सिचाईयां की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाइ्र्र बुवाई के तुरंत बाद धीमी गति से दें। इसके बाद 2-3 या 4 सिंचाई 25-50 या 75 दिन बाद करें। पहला निराई-गुड़ाई बुवाई के 30 दिन बाद तथा दूसरी बुवाई के 50 दिन बाद करना उचित रहता है।

फसल संरक्षण-

मृदुरोमिल रोग (डाउनी मिल्ड्यू) बीज को बुवाई से पूर्व एप्रोन 35 एस.डी. (5 ग्रा. दवा प्रति कि.ग्रा बीज) से उपचारित करने पर फसल में रोग का प्रकोप कम होता है। इसके बाद यदि फसल में रोग का प्रकोप हो तो मेटालेक्सिन (0.2 प्रतिशत घोल) का बुवाई से 25 दिन बाद व मेंकोजेब (0.3 प्रतिशत घोल) का बुवाई 40 दिन बाद फसल पर छिड़काव करें। इस फसल में ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। ज्यादा सिंचाई करने से फसल में मृदुरोमिल आसिता रोग की संभवना बढ़ जाती है।

झुलसा रोग (अल्टरनेरिया ब्लाइट) –

इस रोग की रोकथाम हेतु मेंकोजब (0.3 प्रतिशत घोल) का बुवाई के 55 दिन बाद फसल में छिड़काव करना चाहिए।

मोयला –

इसके रोकथाम हेतु मिथाईल आक्सी डिमेटाॅन 25 ई.सी. 0.05 प्रतिशत या डाईमिथोएट 30 ई.सी 0.03 प्रतिशत दवा का छिड़काव करना चाहिए। 1 हेक्. खेत के लिये लगभग 500 ली. पानी की आवश्यकता होती है। यदि नियंत्रण नहीं हो तो 10-12 दिन में पुनः छिड़काव करें।

फसल की कटाई व गहाई –

ईसबगोल की फसल फरवरी -मार्च तक पक जाती है। फसल को पकने में लगभग 115 दिन लगते है। पकने पर इसकी पत्तिया पीली, सिट्टे हल्के भूरे तथा बीज गहरे भूरे रंग के दिखाई देते है। इसके कटाई के दिन मौसम शुष्क होना चाहिए तथा कटाई सुबह 10 बजे करे ताकि पौधों में उपस्थित ओस का पानी सूख जाये तथा कटाई के बाद 7-8 दिन सूखने के लिये डाल दे तथा इसके बाद लकड़ी से पीटकर या गहाई के लिये थ्रेसर को भी काम मे लिया जा सकता है।

विपणन –

ईसबगोल की बीज कई राज्यों की मंडियो में बेचा जा सकता है स्थानीय व्यापारी इसकी खरीद सीधे किसानों से भी करते है।

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