गिन्नी घास की बुवाई कर साल भर तक हरा चारा ले सकते है

पशु चारे के लिए किसान बरसीम और ज्वार जैसी फसलों की बुवाई करते हैं लेकिन इससे किसान कुछ महीनों तक चारा उग पाता है। गिनी घास की बुवाई कर कई वर्षों तक चारा ले सकते हैं। जिससे पशुओं को पौष्टिक चारा मिलता रहे। अगर पशुपालक के पास सिंचाई की व्यवस्था है तो इससे साल भर हरा चारा पाया जा सकता हैए जबकि शुष्क अवस्था में बारिश में चारा मिलता है। इस फसल को देश के सभी भागों में उगाया जा सकता है।

green fodder guinea grass in Hindi // Gini ghass ki kheti

गिन्नी घास का वानस्पतिक नाम मेगार्थिसस मैक्सिमस है। यह पशुओं के चारे और आचार बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है। यह 3-4 मीटर लंबी सदाबहार घास है। इसके पत्तों के सिरे तीखे और लंबे होते हैं

मिट्टी-

यह मिट्टी की विभिन्न प्रकार की किस्मों जिसमें नमी और उपजाऊ शक्ति ज्यादा हो उगाई जा सकती है। यह फसल ज्यादा गहरी और अच्छे जल निकास वाली मिट्टी में अच्छी पैदावार देती है। भारी चिकनी और पानी रोकने वाली मिट्टी में इस फसल की खेती करने से परहेज करें। इस फसल के विकास के लिए हल्की सिंचाई अच्छी रहती है।
किस्में – बुंदेल गिनी-1ए, बुंदेल गिनी-2ए, बुंदेल गिनी-4ए, मकौनी ए, हामिल, पीजीजी.609ए आदि है। इस किस्म के बीज गहरे मोटे होते हैं। इस फसल की कटाई मुख्य रूप से मई – नवंबर के महीने में फूल आने से पहले की जाती है। इस किस्म के हरे चारे की औसतन पैदावार 675 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसकी 5-7 बार कटाई की जाती है।
हरे चारे की औसतन पैदावार 750-800 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसकी 5-7 बार कटाई की जा सकती है।

जमीन की तैयारी-

गिन्नी घास के रोपण के लिए अच्छी तरह से तैयार मिट्टी की आवश्यकता होती है। हल से जोताई करके जमीन को अच्छी तरह से समतल कर लेना चाहिए। फिर दो बार तवियों से जोताई करें और सुहागे से दो बार तिरछा खेत को समतल करें।

बिजाई- बिजाई का समय बीजों को मध्य मार्च से मध्य मई के महीने में बीज बोया जाता है।

फासला- फसल के विकास और अच्छी वृद्धि के लिए फासला 50 गुणा 30 से.मी और 90 गुणा 45 से.मी रखे।
बीज की गहराई- इसकी बिजाई हाथ से छींटे द्वारा की जाती है।
बिजाई का ढंग- इसकी बिजाई के लिए केरा ढंग का प्रयोग किया जाता है। छींटे द्वारा भी इसकी बिजाई की जाती है।
बीज की मात्रा- अच्छी उपज के लिए 6 से 8 किलो बीज प्रति एकड़ प्रयोग करें।
बीज का उपचार- अच्छे अंकुरन के लिए बिजाई से पहले सल्फयूरिक एसिड से 10 मिनट के लिए बीजों का उपचार करें। रासायनिक उपचार के बाद बिजाई के लिए बीजों का प्रयोग करें।

देख.रेख और रोपण-

बीज बोने से पहले मिट्टी अच्छी तरह से तैयार कर लें। उचित लंबाई और चैड़ाई के बैड पर बीज को बोना चाहिए। बीज को 1-2 से.मी गहराई में बोयें। बिजाई के बाद नमी बनाए रखने के लिए पतले कपड़े से बैड को ढक दें।

बिजाई से 35-45 दिन बाद बीज अंकुरित होकर 3-4 पत्तियों के साथ खेत में रोपण के लिए तैयार हो जाते हैं। रोपण मॉनसून के आने से पहले या उस वक्त जब आपके पास सिंचाई के साधन मौजूद हांए किया जाना चाहिए। रोपाई से 24 घंटे पहले बैडों को पानी देना जरूरी है ताकि रोपाई करते समय पौधों को आसानी से उखाड़ा जा सके।
खेत की तैयारी के समय जैविक खाद 20-.25 टन प्रति एकड़ में डालें। बिजाई के 20 दिन बाद नाइट्रोजन 20 किलो ययूरिया 44 किलोद्ध प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन की दूसरी मात्रा 10 किलो यूरिया 23 किलो बिजाई के 35 दिनों के बाद प्रति एकड़ में डालें।

प्रत्येक कटाई के बाद नाइट्रोजन 30 किलो य 66 किलो यूरिया प्रति एकड़ में डालें।

खरपतवार नियंत्रण-

रोकथाम के लिए नियमित समय के अंतराल पर खेत को नदीन मुक्त करना चाहिए। नदीनों की रोकथाम के लिए एट्राटाफ 50 डब्लयु पी यएट्राजीन 500 ग्राम 200 लीटर पानी में डाल कर स्प्रे करें। मिट्टी के तापमान को कम करने और नदीनों की रोकथाम के लिए मलचिंग भी अच्छा उपाय है।

सिंचाई-

गर्मियों में थोड़ी थोड़ी देर बाद सिंचाई की आवश्यकता होती है। बिजाई के 10 दिनों के अंतराल पर सितंबर-नवंबर महीने में सिंचाई करें। पहली सिंचाई बिजाई के तुरंत बाद करें। दूसरी सिंचाई पहली सिंचाई के 4-6 दिनों के बाद करें। बरसात के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती लेकिन जीवन बचाव सिंचाई की आवश्यकता होती है। खेतों में ज्यादा पानी ना लगाएं क्योंकि गिन्नी घास की फसल ज्यादा पानी को सहनयोग्य नहीं है।

हानिकारक कीट और रोकथाम- घास का टिड्डा घास का टिड्डा ताजे पत्तों को अपने खाने के रूप में प्रयोग करता है जिससे सारा पौधा नष्ट हो जाता है।

रोकथाम – इसका हमला दिखने पर कार्बरिल 50 डब्लयु पी 400 ग्राम प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

पत्तों पर धब्बे-

बीमारियां और रोकथाम पत्तों पर धब्बे यह रोग पौधे की पत्तियों को प्रभावित करता है और उन पर धब्बे बना देता है जो कि बाद में काले रंग के हो जाते हैं।
रोकथाम यदि खेत में इस बीमारी का हमला दिखे तो कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 300 ग्राम या मैनकोजेब 250 ग्राम को प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर 3 से 4 बार 15 दिनों के अंतराल पर स्प्रे करें।

गोंदिया रोग –

यह फफूंदी रोग क्लैविसे पसप्यूरिया से होता है जो कि फसल के मुख्य भाग को प्रभावित करता है। रोकथाम रू इस रोग से बचाने के लिए फंगसनाशी उपचार आवश्यक है।

काले धब्बे का रोग – यह रोग मुख्य रूप से अनाज और चारे वाली फसलों का नुकसान करता है। पौधे के पत्तों पर काले दानेदार धब्बे बन जाते हैं।

रोकथाम – काले धब्बे के रोग की रोकथाम के लिए फंगसनाशी का प्रयोग करना लाभदायक होता है।

मुरझाना – यह रोग जड़ों में पानी जाने से रोकता है जिससे कि परिणामस्वरूप पत्ते पीले पड़ जाते हैं।

रोकथाम –

इस बीमारी की रोकथाम के लिए थायोफनेट मिथाइल 10 ग्राम और यूरिया 50 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर घोल तैयार कर लें और पौधे के नजदीक डालें।
फसल की कटाई- कटाई फसल 60-62 दिन पर कटाई के लिए तैयार हो जाती है सिंचित दशा में प्रति 50 दिन के बाद फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है और इस तरह 100 से 150 टन प्रति हेक्टेयर हरा चारा उपलब्ध होता है। अलग-अलग अंतराल पर 5.- बार कटाई की जाती है। पहली कटाई 55 दिनों के बाद दूसरी कटाई 25-30 दिनों के अंतराल की जाती है। कटाई जमीन के नजदीक से करनी चाहिए इससे फसल की उपज में वृद्धि होती है।

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