वैकुंठ चतुर्दशी त्योहार का महत्व और पौराणिक कथा

भगवान को अति प्रिय है कार्तिक का माह। इस माह में आने वाली वैकुण्ठ चतुर्दशी बहुत प्रभावशाली मानी जाती है। क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु जी और शिवी जी की पूजा एक साथ की जाती है। कई नामों से जानी जाती है वैकुण्ठ चतुर्दशी जैसे वैकुण्ठ चौदस आदि। जो भी इंसान इस दिन पूरे विश्वास से इस त्योहार को मानाता है उसकी सारी मनोकामना पूरी होती है। आइये जानते हैं इस व्रत और त्यौहार के महत्व और इससे मिलने वाले लाभ के बारे में।

क्या महत्व है वैकुंठ चतुर्दशी का हमारे शास्त्रों में

जैसे की हमने आपको बताया है शिव और विष्णु जी की एक साथ इस त्यौहार में पूजा की जाती है। यह दिन हिंदुओं का पवित्र दिन भी माना जाता है। और भारत के प्रमुख हिस्सों जैसे उज्जैन, गया, वाराणसी में काशि विश्वनाथऔर ऋषिकेश में खास तौर से विशेष पूजा अराधना की जाती है। इस दिन पूजा करने से इंसान को कई पुण्य मिलते हैं।

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वाराणसी में काशि विश्वनाथ में है पूजा का महत्व

भगवान शिव की नगरी काशी में विश्वनाथ के रूप में महादेव के ज्योतिर्लिंग की पूजा अराधना का विशेष महत्व होता है। इस पर्व के दिन ​काल के महाकाल के त्रिशूल की पूजा की जाती है। जिसके पीछे का तथ्य है कि ये काशी नगरी भंयकर प्रलय काल में भी नष्ट नहीं होगी। क्यांकि ये शिव जी के त्रिशूल पर टिकी हुई है। वैकुंठ चतुर्दशी के दिन ये नगरी वैकुंठ बन जाती है। इसलिए ये दिन खास होता है।

इस दिन इस मंदिर में शिवजी के सामने विष्णु जी की मूर्ति को रखकर उनकी पूजा की जाती है। यही नहीं तुलसी जी को भी यहां पर रखा जाता है।

किस समय की करें पूजा

सुबह के समय में वैंकुठ चतुर्दशी वाले दिन ही ​शिव की पूजा करनी चाहिए। और मध्य रात्रि में भगवना विष्णु की पूजा करनी चाहिए। पूजा पूरे परिवार के साथ करने से इस दिन विशेष फल मिलता है। इसलिए ये पूजा बहुत ही अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।

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जरूरी है वैकुंठ चतुर्दशी की कथा को सुनना (vaikunth chaturdashi ki pauranik katha in hindi)

कथा बड़ी रोचक है। वेदों में इस कथा के बारे में कहा गया है कि करोड़ों वर्ष पूर्व जब विष्णु जी शिव जी की पूजा कर रहे थे तब उन्होंने 1000 कमलों को भगवान शिव को चढ़ाने का संकल्प ले लिया। और विष्णु जी एक—एक कर कमल के फूलों को शिवलिंग पर चढ़ाने लगे। इतने में भगवान शिव ने विष्णु जी की परीक्षा लेने के लिए एक कमल के फूल को छुपा लिया। जब विष्णु जी ने देखा की एक कमल कम है तब उन्होंने अपने संकल्प को पूरा करने के लिए अपनी एक आंख को शिवलिंग पर चढ़ा दिया। तब तुंरत भगवान शिव जी प्रकट हो गए और प्रसन्न होकर वापस विष्णु जी को उनकी आंख दे दी। यही वजह है कि श्री हरी विष्णु को कमल नयन भी कहा जाता है। तब से इस दिन को वैकुंण्ठ चौदस या चतुर्दशी के आदि कई नामों से जाना जाता है। इस पूजा से प्रसन्न भगवन शिव ने विष्णु जी को सुदर्शन चक्र भेंट किया। जो भी इंसान इस व्रत या त्यौहार को विधि से मनाता है वो इस लोक में सुख भोगता है और बाद में मोक्ष के बाद सीधे उसे वैकुंण्ठ की प्राप्ति होती है।

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