ग्रीनहाउस (पॉली हाउस) में सूत्रकृमि बीमारियों से बचाव कैसें करें

भारत देश में कृषि उत्पादन प्रायः सूखे से प्रभावित होता रहता है। लेकिन हमारे देश में सब्जियों की खेती की प्रक्रिया आम तौर पर पारंपरिक तकनीक और प्रथाओं के साथ क्षेत्रीय और मौसमी जरूरतों तक सीमित होती है। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन से कृषि उत्पादन पर प्रभाव स्पष्ट रुप से देखे जा रहे हैं तथा विगत वर्षों में जलवायु परिवर्तन के परिदृश्य में वर्षा की विषम परिस्थितियों जैसे- वर्षा का विलम्ब से प्रारम्भ होना। बीच में लम्बे समय तक सूखे की स्थिति का होना। वर्षा का जल्दी समाप्त होना।

फसल की विभिन्न अवस्थाओं पर भारी वर्षा व बाढ़ की स्थिति तथा लम्बे समय के बाद मानसून के अंत में अच्छी वर्षा का होना इत्यादि। ऐसी दशा में किसान के लिए सामान्य मौसम में खुले वातावरण में फसलें उगाना मुश्किल होता जा रहा है तथा प्रति हैक्टेयर फसलों की पैदावार भी घटती जा रही है। इस जलवायु परिवर्तन व घटती पैदावार के चलते यह आवश्यक है कि किसान नई तकनीकें या विधियाँ अपनाये जिससे बदलते मौसम का असर फसलों की उत्पादकता पर कम हो।

इस परिस्थिति को देखते हुए संरक्षित वातावरण में खेती ही एक ऐसी तकनीक है। वर्ष भर में फल एवं सब्जियों उत्पादों कि उपलब्धता और विशेष रूप ऑफ सीजन के दौरान फल एवं सब्जियों कि खेती उत्पादकों कि एक ऐसी तकनीक है जिसमें पौधों के आस-पास सूक्ष्म जलवायु क्षेत्र फसल कि आवश्यकता के अनुसार नियंत्रित किया जाता है। जिसमें फसलोत्पादन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया जा सकता है तथा पैदावार व गुणवत्ता मे वृद्धि की जा सकती है। इस प्रकार की तकनीक एवं उच्च उत्पादकता के साथ-साथ कम क्षेत्र में अधिक उत्पादन करने में सक्षम है। इस तकनीक में प्रति इकाई क्षेत्रफल उत्पादन 4-5 तो अधिक मिलता ही है साथ ही बेमौसमी फल व सब्जियाँ जैसे- खीरा एवं तरबूज खरबूज एवं शिमला मिर्च टमाटर आदि। फूलों में जरबेरा, कॉर्नेशन, गुलाब आदि सालभर उगाई जा सकती हैं। संक्रमित मृदा बीज व पौधों का प्रयोग।

पॉलीहाउस में सूत्रकृमि बीमारियों से बचाव कैसें करें-nematodes in protected cultivation in hindi
पॉली हाउस में सूत्रकृमि से प्रभावित फसले-

मिर्च, बैगन, टमाटर, खीरा, गुलाब, शिमला मिर्च, लिलियम और स्ट्राबेरी फसले जो प्रायः सूत्रकृमि रोग से प्रभावि हो जाती है। जैस-संक्रमित नर्सरी का प्रयोग, एक ही कुल की फसल लेना,संक्रमित मृदा में प्रयोग किए गये औजारों व मशीनों द्वारा, उर्वरकों का अधिक प्रयोग करने से फसलों के साथ-साथ सूत्रकृमि भी बढ़ते हैं। सूत्रकृमि द्वारा उत्पन रोग के लक्षण, पौधे की जड़ों पर मोटी गाँठें बन जाती हैं। नियमित सिंचाई करने पर भी पौधा मुरझा जाता है। पौधा आसानी से उखड़ जाता है तथा पौधो की वृ़द्ध नहीं होती है।

सूत्रकृमि रोग तथा प्रबंधन-

पॉलीहाउस की तहत फल एवं सब्जियों से अधिक आय के लिये सूत्रकृमि बीमारियों का नियमित रूप से निदान और प्रबंधन बहुत ही आवश्यक है।

अप्रैल-जुलाई तक पाली हाउस एवं ग्रीन हाउस को खाली रखें।

  •  जून-जुलाई के महीनों में जमीन को हल्का पानी देकर प्लास्टिक शीट से ढकें।
  •  मिट्टी की जाँच, पॉली हाउस के निर्माण से पूर्व सूत्रकृमि हेतु मिट्टी की जाँच करायें।
  •  पॉली हाउस के निर्माण के समय उसके चारों ओर की दीवार कम से कम 1. 2 फीट ऊँची होनी चाहिए ताकि बाहर का व्यर्थ पानी व पानी के साथ सूत्रकृमि बाहर से अंदर नही जा सके।
  •  पॉली हाउस का मुख्य द्वार सीमेंट से पक्का बनायें।
  •  पॉली हाउस में उपयोग आने वाले सभी यंत्रों व औजारौं को अलग रखना चाहिए तथा उनका प्रयोग पॉली हाउस से बाहर नही करें।
  •  नर्सरी तैयार करने के लिए निर्जमीकृत माध्यमों जैसे कोकोपिटए फोमए ब्लॉकए रॉक वुल आदि का प्रयोग करें।
  •  जहाँ तक सम्भव हो प्लास्टिक ट्रे में ही नर्सरी तैयार करें।
  •  पॉलीहॉउस एवं ग्रीन हाउस को खरपतवार एवं पिछली फसल के अवशेषों से हमेशा खाली रखें।
  •  नीम की खली 200 ग्रा. प्रति वर्ग मीटर तथा ट्राकोडर्मा 50 ग्रा. प्रति वर्ग मीटर फसल की रोपाई से एक सप्ताह पहले मिट्टी के ऊपरी भाग में अच्छी तरह मिलाकर हल्का पानी दें।
Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *