किसान भाई भिंडी के प्रमुख हानिकारक कीटों का प्रबंधन कैसे करें

भिंडी फसल की सुरक्षा कीड़े और बीमारियों से-How to protect okra crop from diseases in Hindi

1. पर्ण फुदका –

पहचान – इसके अर्भक पीलापन लिये हुये हरे रंग के, पंख रहित एवं अनोख ढंग से तिरछा चलते है। इस कीट के वयस्क तिकोने आकार के, पीलापन लिये हुये हरे रंग के एवं अगले पंखों के पिछले भाग पर काला धब्बा होता है।

क्षति का प्रकार –

इस कीट के अर्भक एवं वयस्क दोनों ही पत्ती की निचली सतह से कोशिका का रस चूसते है। जिससे पत्तियां पीली होकर अन्दर की ओर मुड़ जाती हैं इनके तीव्र प्रकोप की अवस्था में पत्तियां गहरे लाल ईट के रंग की, कुरकुरी तथा सिकुड़ जाती है।

प्रबंधन –

ऽ भिंडी की फसल में नत्रजन युक्त उर्वरकों की उचित मात्रा ही देनी चाहिए। अधिक मात्रा में देने से फसल की बढ़वार ज्यादा तो होती है परन्तु कीटों का विकास व प्रजनन तेज होता है जिससे कीटों का प्रकोप ज्यादा होगा।
ऽ प्राकृतिक शत्रु जैसे क्राइसोपा व परभक्षी मकड़ी की संख्या ज्यादा हो तो कीटनाशकों का प्रयोग न करें।
ऽ क्षति का स्तर का आकलन करके यदि आवश्यकता हो तो नीम के 5 प्रतिशत घोल का छिड़काव 15 दिन के अन्तराल से करें।
ऽ यदि प्रकोप ज्यादा हो जाये तो इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. की 1 मि.ली. मात्रा 1 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव कर सकते है।

2 प्ररोह एवं फल बेधक –

पहचान – वयस्क कीट मध्यम आकार का पतंगा होता है। इसका सिर एवं वक्ष पीले रंग का होता है। अगले पंख पीलापन लिये हुए सफेद रंग का होता है तथा पंखों के बीच में एक तिकोने आकार की धारी होती है। पिछले पंख सफेद रंग के होते है। इसकी इल्लियां भूरी सफेद रंग की होती है जिनका सिर एवं अग्रवक्ष काले रंग का होता है। इल्लियां के पृष्ठ भाग पर छोंटे छोटे कड़े बाल और बीच-बीच में काले तथा नारंगी धब्बों वाली रेखायें होती है। इसीलिये इन्हें धब्बों या चित्तीदार इल्ली कहते है।
क्षति के प्रकार – इस कीट की इल्लियां कलियों फूलों एवं पौधों की कोमल टहनियों को क्षति पहुंचाती है। जब पौधों दो तीन सप्ताह के होते है तभी इल्लियां पौधों के प्ररोहों में छेद करके उनमें प्रवेश कर जाती है, फलस्वरूप पौधों के प्ररोह मुरझा कर लटक जाते है। जब पौधों पर कलियां, फूल व फल जाते है। इसकी क्षति से कलियां नहीं खिलती एवं फूल झड़ने लगते है। फल छोटे, दूषित एवं खाने के अयोग्य हो जाते है।

प्रबंधन –

ऽ इस कीट के आक्रमण की प्रारंभिक अवस्था में ही प्रभावित प्ररोहों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए।
ऽ जमीन पर गिरी हुई कलियों एवं प्रभावित फलों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए।
ऽ खेत में उपस्थित अन्य परपोषी पौधों व खरपतवारों को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए।
ऽ फसल समाप्त होने पर खेत में उपस्थित भिंडी के पौधों को नष्ट कर देना चाहिए।
ऽ क्षति स्तर व कीट की आक्रमकता को जनाने के लिये फीरोमोन प्रपंच लगाना चाहिए।
ऽ इस कीट के परजीवी, ट्राइकोग्रामा कीट को 1.0 लाख प्रति हेक्.़ की दर से प्रति सप्ताह के अन्तराल पर 4-5 बार खेत में छोड़ने चाहिए।
ऽ अत्यधिक प्रकोप की अवस्था में साईपरमेथरिन का छिड़काव करना चाहिए।

3. सफेद मक्खी –

पहचान – इसके अंडे एक पतले, छोटे व सफेद रंग के होते है। वयस्क पंखदार एवं पीले रंग के होते है। पंख चमकीले सफेद रंग के होते है।

क्षति के प्रकार –

इस कीट के वयस्क एवं इल्ली दोनो ही पत्तियों का रस चूसकर फसल को हानि पहुंचाते है। परिणाम स्वरूप पौधों की वृद्धि रूक जाती है, पौधे छोटे रह जाते है तथा उनमें फूलों एवं फलों की संख्या बहुत कम हो जाती है। इसके साथ ही यह कीट पौधों में पीला शिरा मौजैक रोग को भी फैलता है।

प्रबंधन –

ऽ भिंडी की खेत में पीला चिपकने वाला प्रपंच व डेल्टा प्रपंच का लगाना लाभदायक होता है।
ऽ नीम सत् के 5 प्रतिशत घोल का 15 दिन अंतराल से छिड़कवाल कर सकते है।
ऽ यदि इस कीट का प्रकोप अधिक हो जाये तो इमिडाक्लोप्रिड की 1 मिली लीटर मात्रा 1 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए।

4. चेपा –

पहचान – ये कीट बहुत ही मुलायम व छोटे आकार के होते है। ये प्रायः सफेद हरे रंग के होते है। वयस्क अवस्था में दो प्रकार के होते है। (क) पंखदार एवं (ख) पंखहीन। इनके शरीर के पिछले सिरे पर दो मधु नलिकांये होती है।

क्षति के प्रकार –

इस कीट के अर्भक व वयस्क दोनों ही पत्तियों व टहनियों का रस चूसकर क्षति पहुंचाते है। ये कीट मधु जैसा पदार्थ भी स्रावित करते हैं जिससे बाद में पत्तियों व टहनियों पर काला फफूंद लग जाता है। इसके कारण पौधों की प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बाधित होती है।

 

प्रबंधन

ऽ नत्रजन युक्त रसायनिक उर्वरकों का आवश्यकता से अधिक मात्रा में प्रयोग नहीं करना चाहिए।
ऽ इस कीट के परभक्षी मित्र कीट जैसे- काक्सीनेल्ला सेप्टमपंक्टाटा, क्राइसोपा व सिरफिड मक्खी इत्यादि की संख्या अधिक होने पर कीटनाशकों का प्रयोग न करें साथ ही इनको बढ़ावा देना चाहिए।
ऽ भिंडी के खेत में पीले चिपकने वाले व डेल्टा प्रपंच को लगाना चाहिए।
ऽ निंबौली सत् के 5 प्रतिशत घोल का 15 दिन के अन्तराल से 2-3 बार छिड़काव कर सकते हैं।
ऽ प्रकोप से अधिक होने पर रसायनिक कीटनाशक जैसे इमिडाक्लोप्रिड की 1 मिली लीटर मात्रा 1 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

 

5. लाल मकड़ी माइट –

पहचान – इसके अर्भक काफी छोट आकार के व गुलाबी रंग के होते है। वयस्क मकड़ी अण्डाकार व लाल भूरे रंग की होती है तथा इनके चार जोड़ी पैर होते है। यह मकड़ी पत्तियों की निचली सतह पर जाला बनाकर रहती है।

क्षति के प्रकार –

इसके अर्भक व वयस्क दोनों ही क्षति पहुंचाते है। ये पत्तियों की निचली सतह पर जाला बनाकर रहती है और पत्तियों की कोशिकाओं का रस चूसते रहते है। जिससे की धीरे-धीरे पत्तियां पीली पड़ जाती है और सूख जाती है। पत्तियों में जाला बन जाने के कारण की वजह से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया रूक जाती है जिससे पौधे की वृद्धि भी रूक जाती है। क्षतिग्रस्त पौधों पर फल अपेक्षाकृत छोटे व कम आते है।

प्रबंधन-

ऽ नीम निंबौली सत् के 5 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए।
ऽ सल्फर धूल का 25 किलो.ग्राम प्रति हेक्. की दर से खेत में छिड़काव कर सकते है।
ऽ ओमाइट 57 ई.सी. या डायकोफाल 18 ई.सी का 0.02 प्रतिशत के दर से छिड़कवा करें।
ऽ जिन क्षेत्रों में इस कीट का प्रकोप लगातार व भारी मात्रा में होता है। उन क्षेत्रो में गर्मियों की फसल के स्थान वर्षा ऋतु की फसल उगानी चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *